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विश्व पुस्तक मेला में भारतीय भाषाओं के प्रकाशकों की रुचि घटने के संकेत: अध्ययन

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विश्व पुस्तक मेला में भारतीय भाषाओं के प्रकाशकों की रुचि घटने के संकेत: अध्ययन
नई दिल्‍ली:

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हर वर्ष होने वाले विश्व पुस्तक मेला में हिन्दी उर्दू सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं के प्रकाशकों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है विश्व पुस्तक मेले के मीडिया स्टडीज ग्रुप की ओर से किये गये तुलनात्मक अध्ययन में यह बात सामने आयी है.

इस तरह कम हुई प्रकाशकों की संख्‍या
अध्ययन के अनुसार साल 2013 के विश्व पुस्तक मेले में कुल 1098 प्रकाशकों ने हिस्सा लिया था, वहीं 2017 में यह संख्या घटकर केवल 789 रह गयी. तुलनात्मक अध्ययन के मुताबिक हर साल इसमें लगातार गिरावट आ रही है. साल 2014 में कुल 1027 प्रकाशक शामिल हुये थे, जबकि 2016 में मेले में शामिल होने वाले प्रकाशकों की संख्या 850 पर सीमित हो गयी.

अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 के पुस्तक मेले की डायरेक्टरी नहीं मिलने के कारण 2015 के आंकड़े शामिल नहीं किये गये हैं. रिपोर्ट में अन्य स्रोतों से मिली जानकारी के मुताबिक 2015 में कुल प्रकाशकों की संख्या 2014 की तुलना में कम होने की बात कही गयी है.


हर साल स्‍थानिय भाषाओं के प्रकाशक भी हुए कम
रिपोर्ट के मुताबिक विश्व पुस्तक मेला में विभिन्न भारतीय भाषाओं के प्रकाशकों के मामले में गिरावट देखने को मिली. 2013 में लगे 1098 स्टॉलों में असमिया के तीन, बांग्ला के पांच, गुजराती के दो, हिन्दी के 323, कश्मीरी एक, मैथिली एक, मलयालम 12, मराठी दो, उड़िया एक, पंजाबी छह, तमिल पांच, तेलगू दो, उर्दू 44 और विदेशी प्रतिभागियों की कुल संख्या 30 रही.

1957 में की गई थी नेशनल बुक ट्रस्‍ट की स्‍थापना
भारत सरकार के उच्च शिक्षा विभाग के तहत 1957 में नेशनल बुक ट्रस्ट की स्थापना की गयी थी. इसके मुख्य उद्देश्य समाज में भारतीय भाषाओं का प्रोत्साहन एवं लोगों में विभिन्न भाषा के साहित्य के प्रति रचि जाग्रत करना था. ट्रस्ट ने इसके लिए विभिन्न स्तरों पर योजनायें चलायी थीं, जिसके तहत हर वर्ष विश्व पुस्तक मेले का आयोजन किया जाना भी शामिल है.

कुछ इस प्रकार  है 2017 में शामिल प्रकाशकों की संख्‍या
वर्ष 2017 में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में इस संख्या में काफी गिरावट दर्ज की गयी. मेले में 2017 के कुल 789 प्रकाशकों में बांग्ला के सात, अंग्रेजी के 448, गुजराती के एक, हिन्दी के 272, मलयालम के छह, मराठी के एक, ओडिया के एक, पंजाबी के एक, संस्कृत के तीन, सिंधी के तीन, तमिल के एक, तेलगू के एक, उर्दू के 16 प्रकाशक थे.

मीडिया स्टडी ग्रुप के चेयरमैन अनिल चमड़िया ने बताया कि इन चार वषरें के तुलनात्मक अध्ययन में पाया गया है कि इस वर्ष के मेले में असमिया के प्रकाशकों की उपस्थिति नगण्य रही. इसी प्रकार कश्मीरी, मैथिली के प्रकाशकों की संख्या में भी कोई सुधार दिखायी नहीं देता, जबकि तेलगू की उपस्थिति बहुत सीमित है और तमिल की संख्या पिछले मेले की तुलना में घटकर मात्र 25 प्रतिशत रह गयी है. ओड़िया की संख्या भी दो से एक रह गयी है.

सबसे ज्‍यादा कम हुई उर्दू के प्रकाशकों की संख्‍या
गौरतलब है कि जिन भाषाओं की उपस्थिति मेले में लगातार घट रही है उनमें उर्दू भी शामिल है. उर्दू के प्रकाशकों की उपस्थिति 2016 के मुकाबले और कम हो गयी है. वर्ष 2013 से तुलना करें तो उसकी उपस्थिति 70 प्रतिशत के आस पास कम दर्ज की गयी है.

विश्व पुस्तक मेला में भारतीय भाषाओं की उपस्थिति का जो रूझान दिखायी दिया उसमें सुधार लाने के लिए 2016 में प्रयास किये गये, लेकिन 2017 के पुस्तक मेले में इसका असर दिखायी नहीं देता. बल्कि इसमें और कमी देखी गयी और 2013 के बाद 2016 में कुल प्रकाशकों की संख्या में जो कमी देखी गयी थी वह कमी 2017 में और घट गयी.

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प्रकाशन का व्यवसाय भी संकट में
अध्ययन में देखा गया कि अंग्रेजी की तुलना में हिन्दी के प्रकाशकों की उपस्थिति आधी रह गयी और साफ पता चलता है कि हिन्दी की वास्तविक स्थिति के साथ संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज भारतीय भाषाओं की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है. इसके साथ ही पाठकों के अनुरूप प्रकाशकों के नहीं होने के कारण प्रकाशन का व्यवसाय भी संकट में घिरता नजर आ रहा है.

(एजेंसियों से इनपुट)



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