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बेगूसराय : 'पूरब के लेनिनग्राद' में जातीय समीकरण ही जमीनी हकीकत

बिहार के बेगूसराय जिले को कभी 'पूरब का लेनिनग्राद' कहा जाता था. आज भी कई इलाकों में उसके समर्थक उस दौर को याद करते हैं जब बिहार में ऊंची जाति में गिने जाने वाले भूमिहारों ने वामपंथ का झंडा थामकर यहां के 'जमींदारों' के खिलाफ पहली बार मोर्चा खोल दिया था.

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बेगूसराय : 'पूरब के लेनिनग्राद' में जातीय समीकरण ही जमीनी हकीकत

फाइल फोटो

खास बातें

  1. भूमिहार जाति का प्रभाव
  2. गिरिराज और कन्हैया दोनों ही भूमिहार
  3. तनवीर हसन के उतरने से त्रिकोणीय हो सकती है लड़ाई
नई दिल्ली:
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जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार सीपीआई की टिकट से अब बिहार के बेगूसराय से लोकसभा में प्रत्याशी हैं. कन्हैया कुमार को उम्मीद थी कि खुद को सामाजिक क्रांति का सबसे बड़ा पैरोकार मानने वाले लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी उनको समर्थन करेगी. उनकी उम्मीदों को तोड़ते हुए आरजेडी ने तनवीर हसन को उतार दिया है. पिछली बार तनवीर 60 हजार वोटों से हार गए थे. आरजेडी नेताओं का कहना है कि पिछली बार तनवीर हसन को अच्छा-खासा समर्थन मिला था और स्थानीय कार्यकर्ताओं की भावनाओं का खयाल रखते हुए यह फैसला लिया गया है. वहीं जेडीयू नेता केसी त्यागी का कहना है कि आरजेडी नेताओं को लगता है कि कन्हैया कुमार से तेजस्वी को खतरा हो सकता है कि तेजस्वी नहीं चाहते हैं कि बिहार में उनके कद का कोई नेता हो जाए. इसलिए वे कन्हैया को हराना चाहते हैं. आपको बता दें कि बेगूसराय से बीजेपी ने केंद्रीय मंत्री और हिंदुत्व पर बयानों के लिए मशहूर गिरिराज सिंह को उतारा है. जातीय समीकरणों के हिसाब से देखें तो कन्हैया कुमार और गिरिराज सिंह दोनों ही भूमिहार जाति से आते हैं. इस जाति का बेगूसराय में अच्छा-खासा प्रभाव है. बिहार के बेगूसराय जिले को कभी 'पूरब का लेनिनग्राद' कहा जाता था. आज भी कई इलाकों में उसके समर्थक उस दौर को याद करते हैं जब बिहार में ऊंची जाति में गिने जाने वाले भूमिहारों ने वामपंथ का झंडा थामकर यहां के 'जमींदारों' के खिलाफ पहली बार मोर्चा खोल दिया था. खास बात यह थी कि जिनके खिलाफ यह मोर्चा खोला गया था वह भी भूमिहार थे, जिनका लाल मिर्च की खेती में एकाधिकार था. इस लड़ाई में जो नेता उभरे चंद्रशेखर सिंह, सीताराम मिश्रा, राजेंद्र प्रसाद सिंह ये सभी भूमिहार समुदाय से आते थे. धीरे-धीरे तेघड़ा और बछवारा विधानसभा सीटें वामपंथ का गढ़ बन गईं और कोई भी लहर इसको भेदने में नाकाम रही. 

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तेघड़ा विधानसभा सीट जिसे कभी 'छोटा मॉस्को' के नाम से भी जाना जाता था यहां पर 1962 से लेकर 2010 का वामपंथी पार्टियों का कब्जा रहा है. 2010 में बीजेपी ने यहां जीत दर्ज की थी. वहीं बछवारा सीट भी साल 2015 में आरजेडी के पास चली गई. वामपंथ के सबसे मजबूत गढ़ में सेंध 90 के दशक में ही लगनी शुरू हो गई थी. 1995 तक यहां की 7 में से 5 सीटें सीपीआई या सीपीएम के पास थीं. लेकिन बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का उदय, ऊंची जातियों के खिलाफ आंदोलन और बड़े पैमाने पर नरसंहार ने पूरे बिहार को जातिवाद की राजनीति में जकड़ लिया और बेगूसराय भी इससे अछूता नहीं रहा. 

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बिहार में भूमिहार कांग्रेस के साथ थे. लेकिन उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने लालू को समर्थन करने का फैसला कर लिया. इसके बाद भूमिहार ही नहीं गैर यादव ओबीसी ने नीतीश कुमार की समता पार्टी और बीजेपी की ओर रुख कर लिया. अब वामपंथी राजनीति के लिये दौर बदल गया है. कन्हैया कुमार जो कि खुद भूमिहार हैं और टेघड़ा (मिनी मॉस्को) से आते हैं, उनको अपनी ही जाति से वोट मिलेगा यह कुछ भी अब पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता है. यह भी अपने आप में एक सच्चाई है कि 'पूरब का लेनिनग्राद' होते हुए भी सीपीआई एक ही बार लोकसभा चुनाव (1967) जीत पाई है. साल 2004 से यहां से एनडीए का प्रत्याशी ही लगातार जीत रहा है. कुल मिलाकर यहां के जो समीकरण हैं उस हिसाब से अगर कांग्रेस और आरजेडी का समर्थन मिलता तो कन्हैया कुमार कुछ भूमिहारों के वोट लाने में कामयाब हो जाते तो वह निश्चित तौर पर गिरिराज की राह और कठिन हो जाती. फिलहाल त्रिकोणीय लड़ाई की उम्मीद की जा रही है.

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