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कई 'कांड' और 'स्मार्ट सिटी' के ख्वाब वाले मुजफ्फरपुर की किस्मत में विकास नहीं, 'फिर एक बार निषाद उम्मीदवार'?

बीजेपी की ओर से 2014 की तरह ही अजय निषाद मैदान-ए-जंग में हैं, वहीं महागठबंधन की ओर से यह सीट मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी के खाते में गई है और सियासी पिच पर बैटिंग करने आए हैं डॉ राजभूषण चौधरी निषाद.

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कई 'कांड' और 'स्मार्ट सिटी' के ख्वाब वाले मुजफ्फरपुर की किस्मत में विकास नहीं, 'फिर एक बार निषाद उम्मीदवार'?

मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार और वीआईपी उम्मीदवार दोनों निषाद समुदाय से आते हैं.

नई दिल्ली:

बीते कुछ सालों से बिहार का मुजफ्फरपुर समय-समय पर मीडिया की सुर्खियों में रहा है. वजह उपलब्धियों से ज्यादा नाकामियां और बदनामियां हैं. बिहार की सियासत को समझने के लिए भले ही देश और दुनिया पटना की ओर नजर टिका ले, मगर उत्तर बिहार की अघोषित राजधानी के तौर पर मशहूर मुजफ्फरपुर की सियासी अहमियत बिहार में पटना से कभी कम भी नहीं रही. कहा जाता है कि उत्तर बिहार की राजनीति की हवाओं का रुख मुजफ्फरपुर से ही होकर गुजरती है. लोकसभा चुनाव के लिए मुजफ्फरपुर सीट इसलिए भी खास है क्योंकि उत्तर बिहार की कई लोकसभा सीटों का केंद्र  मुजफ्फरपुर ही रहा है. लोकसभा चुनाव 2019 की बात करें तो बीजेपी ने एक बार अपने उसी योद्धा पर भरोसा जताया है, जिसने 2014 के चुनाव में मुजफ्फरपुर की सीट पर बीजेपी का खाता खुलवाया था. यानी बीजेपी की ओर से 2014 की तरह ही अजय निषाद मैदान-ए-जंग में हैं, वहीं महागठबंधन की ओर से यह सीट मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी के खाते में गई है और सियासी पिच पर बैटिंग करने आए हैं डॉ राजभूषण चौधरी निषाद. अगर दोनों ओर के उम्मीदवारों की जाति पर गौर करें तो इससे साफ नजर आता है कि मुजफ्फरपुर सीट पर निषाद बनाम निषाद की लड़ाई होगी. लेकिन अजय निषाद सामान्य उम्मीदवार नहीं हैं, बल्कि उनके पास राजनीतिक विरासत है, जो उन्हें अपने पिता कैप्टन जयनरायण निषाद से मिली है. कैप्टन जयनारायण निषाद का मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट पर काफी समय तक दबदबा रहा. यही वजह है कि बीजेपी ने उनके बेटे अजय निषाद पर भरोसा जताया है. 

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2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी की टिकट पर अजय निषाद ने जीत हासिल की थी और मुजफ्फरपुर में पहली बार बीजेपी का भगवा झंडा फहराया था. इस चुनाव में अजय निषाद की जीत के पीछे अधिकतर लोग मोदी लहर मानते रहे हैं. अजय निषाद ने 2014 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के अखिलेश सिंह को हराया था. वहीं जदयू की ओर से विजेंद्र चौधरी तीसरे स्थान पर रहे थे. 2014 के मोदी लहर में अजय निषाद का मुजफ्फरपुर में ऐसा सिक्क जमा कि उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी अखिलेश प्रसाद सिंह को करीब 2 लाख से ज्यादा के वोटों के अंतर से हराया और अजय निषाद 2014 में सांसद बनकर मुजफ्फरपुर का प्रतिनिधित्व करने संसद पहुंचे. हालांकि, इस बार भी अगर अजय निषाद की जीत होती है, तो इसके पीछे उनका काम नहीं, बल्कि मोदी लहर होगा. 

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अगर सांसद के रूप में रिपोर्ट कार्ज की बात करें तो 52 साल के अजय निषाद ने संसद में 21 बार बहस में हिस्सा लिया और 216 सवाल पूछे. मगर अजय निषाद ने संसद में एक भी प्राइवेट मेंबर बिल पेश नहीं किया. सांसद अजय निषाद द्वारा संसद में पूछे गये सवालों पर नजर दौड़ाए तो उन्होंने वित्त से संबंधित विषय पर 7 फीसदी, कृषि से संबंधित 9 फीसदी, रक्षा से संबंधित 2 फीसदी, रेलवे से संबंधित 6 फीसदी, शिक्षा से संबंधित 4 फीसदी, स्वास्थ्य से संबंधित 7 फीसदी, रोजगार पर 6 फीसदी, पर्यावरण पर 4 फीसदी, ऊर्जा पर 7 फीसदी, सामाजिक न्याय पर 6 फीसदी, कल्याण पर 11 फीसदी और अन्य से संबंधित विषयों पर 29 फीसदी सवाल किए. 

मुजफ्फरपुल लोकसभा सीट में कुल 6 विधानसभा सीटें हैं. गायघाट (राजद), बोचहां (निर्दलीय), कुढऩी (भाजपा), औराई (राजद), सकरा (राजद), मुजफ्फरपुर (भाजपा). यानी 6 विधानसभा सीटों में से 3 पर राजद, दो पर भाजपा और एक पर निर्दलीय विधायक का कब्जा है. मुजफ्फरपुर में ऐसे कई इलाके हैं, जहां विकास की पहुंच नहीं बन पाई है. औराई में इस साल बिजली पहुंची है, जबकि यहां से अजय निषाद से पहले उनके पिता कैप्टन जयनारायण निषाद कई बार सांसद रह चुके थे. 

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दरअसल, मुजफ्फरपुर में निषाद वोटरों का वर्चस्व है. यही वजह है कि मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट पर पिछले कई चुनाव से निषाद समुदाय से ही उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं. इस बार भी मुकाबला दिलचस्प है, क्योंकि यहां इस बार निषाद बनाम निषाद की ही लड़ाई है. अजय निषाद और डॉ राजभूषण चौधरी निषाद में सीधी टक्कर की उम्मीद है. इस बार इसलिए भी यह सियासी मुकाबला दिलचस्प हो जाता है क्योंकि निषाद वोटरों के सामने भी दोनों में से किसी एक को चुनने की दुविधा होगी. प्रखर समाजवादी नेता जार्ज फर्नाडिस की कर्मभूमि रहे मुजफ्फरपुर में लोकसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला दो निषादों के बीच है.  इस सीट पर 17.3 लाख मतदाता हैं जिसमें मुजफ्फरपुर लोकसभा क्षेत्र में करीब 3 लाख निषाद वोटर हैं. वहीं, सवर्ण मतदाता साढ़े तीन लाख, यादव पौने दो लाख, मुस्लिम दो लाख और वैश्य सवा दो लाख हैं. इनके अलावा यहां अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों की भी अच्छी खासी संख्या है.

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हकीकत से कोसों दूर विकास की बयार:
चुनावी नारों और वादों से इतर रोजमर्रा की परेशानियों से जूझ रहे स्थानीय लोगों का कहना है कि स्मार्ट सिटी का ख्वाब दिखाया जा रहा है जबकि धरातल पर जर्जर सड़क और जाम से बावस्ता होना पड़ रहा. फोर लेन रोड का काम अधूरा है. बागमती परियोजना भी मझधार में अटकी है. बच्चों के खेल-कूद के लिए अच्छी व्यवस्था नहीं है. शाही लीची के प्रसंस्करण की बात बयानों तक सिमटी है. लहठी उद्योग जयपुरिया लहठी के सामने दम तोड़ने लगा है. शिक्षा व्यवस्था की स्थिति खराब है और शहर के कई स्कूलों की जमीन अतिक्रमण एवं अवैध कब्जे से जूझ रही है. हागठबंधन के उम्मीदवार का तो नाम ही नहीं सुना और राजग के कैंडिडेट एवं वर्तमान सांसद का कोई काम ही नहीं सुना. झापहा के संतोष यादव कहते हैं कि इस बार यादव वोटरों का एकमुश्त वोट किसी एक पार्टी को मिलने से रहा. 

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स्मार्ट सिटी मुजफ्फरपुर: 
अजय निषाद मुजफ्फरपुर को स्मार्ट सिटी के क्लब में शामिल कराने में सफल रहे, मगर मुजफ्फरपुर की तस्वीर वैसी की वैसी ही रही. मुजफ्फरपुर में विकास के नाम पर कुछ पुल, मॉल जरूर बन गए हैं, मगर स्मार्ट तो कहीं से भी नहीं दिखता. सिकंदरपुर मन को वाटर पार्क बनाने की कवायद अब भी ठंडे बस्ते में ही है. सड़कों की हालत आज भी वही है. शहर के बाहर भी नजर दौड़ाएं तो औराई का चचरी पुल अब भी विकास का राह निहारता दिखता है. 

पताही हवाई अड्डा ठंडे बस्ते में: 
मुजफ्फरपुर के पताही हवाई अड्डे से हवाई यात्रा अब भी सपना ही है.  हर चुनाव में यह चर्चा में आता है, मगर चुनाव खत्म होते ही इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है.  इस हवाई अड्‌डा से लोग नई दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु समेत विभिन्न महानगरों की उड़ान भरेंगे, यह सपना वर्षों से दिखाया जा रहा है, मगर हकीकत अभी कोसों दूर है.  वर्षों पुराने इस वादे को पूरा करने के लिए आज तक कोई ठोस पहल नहीं की जा सकी है. हालांकि, एक दो बार कोशिश जरूर की गई, मगर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की वजह से कभी यह राजनैतिक मुद्दा नहीं बन पाया. पीएम मोदी जब पताही गए तो लोगों को उम्मीद जगी कि शायद पीएम मोदी इसे लेकर कोई ऐलान करें, मगर मुजफ्फरपुर के लोगों को एक बार फिर से हवाई सफर से उम्मीद टूट गई. 

क्यों जरूरी है हवाई अड्डा:
दरअसल, अगर पताही हवाई अड्डा से उड़ान शुरू हो जाए, तो मुजफ्फरपुर समेत उत्तर बिहार के कई जिलों का न सिर्फ विकास तेजी से होगा, बल्कि उड़ान से निवेश के द्वार भी खुल जाएंगी. दरअसल, मुजफ्फरपुर सूती कपड़ों का बहुत बड़ा मार्केट है. यही वजह है कि यहां बिहार के अलग-अलग राज्यों के अलावा, नेपाल के भी व्यापारी यहां आते हैं. बेला औद्योगिक क्षेत्र के विकास नहीं कर पाने की भी एक वजह यह भी है. इसके अलावा, उत्तर बिहार में टूरिज्म के कई स्थल हैं, मगर  यातायात की बेहतर सुविधा न होने की वजह से विदेशी सैलानी भी वैशाली उस संख्या में नहीं आ पाते, जितना इसका महत्व है. 

बेला का विकास नहीं:
बेला औद्योगिक क्षेत्र का विकास बीते कुछ सालों से राम भरोसे ही है. बेला को जिस गति से डेवलप किया जाना था, उस गति से उसका विकास नहीं हो पाया. बेला को अगर प्रॉपर तरीके से विकसित किया जाए, तो मुजफ्फरपुर में रोजगार का एक बेहतर विकल्प होता. मुजफ्फरपुर में क्राइम का ग्राफ इतना अधिक है, खासकर बेला इलाके में उसकी वजह से काफी व्यापारी यहां नहीं आना चाहते हैं. रंगदारी, वसूली की वजह से कई कंपनियां यहां आने से कतराती है. निवेश का जो बेहतर माहौल होना चाहिए, उसे बनाने में भी प्रशासन के साथ-साथ राजनेता नाकामयाब रहे हैं. 

नवरुणा अपहरण कांड:
मुजफ्फरपुर का बहुचर्चित नवरुणा अपहरण कांड सियासत के पन्नों में शायद दब चुका है. 12 साल की बच्ची नवरुणा का अपहरण मुजफ्फरपुर के घिरनी पोखर स्थित घर से 18 सितंबर 2012 की रात हो गया था. इस मामले में स्थानीय प्रशासन से लेकर सीबीआई तक विफल नजर आई है. मुजफ्फरपुर का का चर्चित नवरुणा कांड काफी उलझ चुका है, जिसकी गुत्थी सुलझने के अभी कोई संकेत नहीं है. पहले स्थानीय पुलिस प्रशासन, और फिर सीआईडी और 2015 में सीबीआई ने मामले की जांच को अपने हाथ में लिया. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच पर सीबीआई को फटकार भी लगाई मगर अब भी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. हैरान करने वाली बात है कि नवरुणा कांड भले ही उत्तर बिहार का सबसे चर्चित कांड रहा हो, मगर हकीकत यह है कि राष्ट्रीय मीडिया ने इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई. परिणाम यह हुआ कि अब भी दूसरे राज्यों के लोग इस कांड से अनजान नजर आते हैं. सांसद अजय निषाद पर भी मुजफ्फरपुर के कई लोगों ने इस मामले में उदासीनता के आरोप लगाए. अजय निषाद ने इस मुद्दे को जोर-शोर से नहीं उठाया और न ही संसद के पटल पर कभी इस मामले को प्रमुखता से रखा. 

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बालिका गृह कांड:
मुजफ्फरपुर की छवि को राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा नुकसान शेल्टर हाउस मामले ने किया. शहर के बीचो-बीच एक एनजीओ के नाम पर हैवानियत का घिनौना खेल हो रहा था, और सालों तक किसी को कानों-कान खबर तक नहीं लगी. शेल्टर हाउस मामले में नेताओं पर भी इसलिए सवाल उठाए जाने चाहिए क्योंकि इस सीट पर न सिर्फ बीजेपी के सांसद हैं, बल्कि बीजेपी के विधायक भी हैं. यानी सांसद और विधायक भी बीजेपी के बावजूद इसके इस पर बड़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति कभी नहीं दिखी. बालिका गृह कांड में बच्चियों के साथ दुर्रव्यवहार किये जाते रहे, जिसका मुख्य आरोपी ब्रजेश अभी सलाखों के पीछे है और यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी है. सुप्रीम कोर्ट  तो इस मामले में नीतीश सरकार को भी फटकार लगा चुका है.  

निषाद परिवार का दबदबा:
2009 लोकसबा चुनाव- इस चुनाव में कैप्टन जयनारायण निषाद  जदयू की टिकट पर चुनाव लड़े थे और उन्होंने लोजपा के भगवान लाल सहनी को हराया था. 
2004 लोकसभा चुनाव- इस चुनाव में जॉर्ज फर्नांडिस की जीत हुई थी. जॉर्ज साहब जदयू के टिकट पर लड़े थे. इनके सामने राजद की ओर से भगवान लाल सहनी, जिन्हें हार का सामना करना पड़ा था. 
1999 लोकसभा चुनाव- इस चुनाव में कैप्टन जयनरायाण निषाद ने राजद के महेंद्र सहनी को हराया था. 
1998 लोकसभा चुनाव- कैप्टन जय नारायण निषाद राजद के टिकट पर चुनाव लड़े थे और जीत भी हासिल की थी. 
1996 लोकसभा चुनाव - कैप्टन जय नाराणय निषाद (जनता दल) पहली बार लोकसभा चुनाव जीते थे. 
 



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