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लोकसभा चुनाव 2019: कहीं फूट न जाए 'विपक्षी एकता' का गुब्बारा, ऐसे कैसे बीजेपी को हरा पाएगी कांग्रेस

लोकसभा चुनाव 2019 में भारतीय जनता पार्टी की नेतृत्व वाली एनडीए को सत्ता से उखाड़ फेंकने की कवायद में जुटी कांग्रेस को उस वक्त एक और बड़ा झटका लगा, बसपा ने कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला किया.

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लोकसभा चुनाव 2019: कहीं फूट न जाए 'विपक्षी एकता' का गुब्बारा, ऐसे कैसे बीजेपी को हरा पाएगी कांग्रेस

लोकसभा चुनाव 2019: मायावती और सोनिया गांधी (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

लोकसभा चुनाव 2019 में भारतीय जनता पार्टी की नेतृत्व वाली एनडीए को सत्ता से उखाड़ फेंकने की कवायद में जुटी कांग्रेस को उस वक्त एक और बड़ा झटका लगा, जब इस साल के अंत में होने वाले मध्य प्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में बसपा प्रमुख मायावती  ने कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया. 2019 लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन को मजबूत करने में जुटी कांग्रेस के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने न सिर्फ मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है, बल्कि कांग्रेस पर सीधा हमला भी बोला है. दरअसल, बुधवार को मायावती के कांग्रेस को लेकर जो तल्ख तेवर दिखे, उससे राजनीतिक पंडित यह अनुमान लगा रहे हैं कि तीन राज्यों में कांग्रेस की उम्मीदें तो ढेर हो ही गईं, बल्कि लोकसभा चुनाव 2019 में भी गठबंधन की स्थिति बनती नहीं दिख रही है. 

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लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस लोकसभा चुनाव में महागठबंधन की कवायद तो कर ही रही है, बल्कि यह भी वह चाहती थी कि तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मात देने के लिए बसपा से गठबंधन किये जाएं, मगर मायावती ने कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. हालांकि, यह बात भी सही है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में बसपा प्रमुख मायावती ने लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस के गठबंधन को लेकर सस्पेंस कायम रखा. उन्होंने लोकसभा चुनाव में न तो महागठंबधन से इनकार किया और न ही उन्होंने अकेले चुनाल लड़ने का ऐलान किया. यानी मायावती ने अभी भी 2019 लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के साथ महागठबंधन के दरवाजे को खोले रखा. मगर यह भी हकीकत है कि अगर तीनों राज्यों में कांग्रेस की हार होती है तो उसके लिए लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करना भी बड़ी चुनौती होगी.

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अगर लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देजनर बात करें तो न सिर्फ मायावती के साथ महागठबंधन पर सस्पेंस कायम है, बल्कि पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस की उम्मीदें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के तेवर पर टिकी है. हालांकि, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही ऐलान कर चुकी हैं कि वह बंगाल की सभी सीटों पर लोकसभा में अकेली चुनाल लड़ेंगी. कोलकाता में टीएमसी की वार्षिक शहीदी दिवस रैली में ममता बनर्जी ने कहा था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बंगाल रास्ता दिखाएगा. उन्होंने कहा कि हम 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल से सभी 42 सीटें जीतेंगे. हालांकि, कई बार ममता बनर्जी महागठबंधन यानी विपक्षी एकता को मजबूत करने की कोशिश करती भी दिखी हैं. 

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वहीं, दिल्ली में भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन के लिए इच्छूक नजर आ रहे हैं. मगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ सीटों को लेकर बात बनती नहीं दिख रही है. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी काफी समय से गठबंधन के प्रयासों में जुटे थे, मगर अजय माकन नहीं चाहते थे कि कांग्रेस और आप में गठबंधन हो. हालांकि, दिल्ली की सात लोकसभा सीटों पर सीट शेयरिंग को लेकर इन दोनों के बीच बात अटकी पड़ी है. राजनीतिक पंडितों की मानें तो जिस तरह से अरविंद केजरीवाल बीजेपी के बागी नेताओं को आम आदमी पार्टी की टिकट से लोकसभा चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दे चुके हैं, उससे यह लगता है कि सीटों को लेकर कभी कांग्रेस के साथ उनकी सहमति नहीं बन पाएगी. यही वजह है कि दिल्ली में भी अरविंद केजरीवाल की पार्टी के साथ विपक्षी एकता को मजबूती मिलती नहीं दिख रही है. कांग्रेस और आप के बीच गठबंधन की बात इसलिए भी जोरों पर रही है, क्योंकि कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह में विपक्षी एकता की झलक देखने को मिली थी. 

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इसके अलावा, पंजाब में भले ही इस वक्त कांग्रेस की सरकार है और वह बहुमत में हैं. मगर लोकसभा चुनाव के समीकरण कुछ और होते हैं. लेकिन कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि पंजाब में उनकी पार्टी किसी के साथ गठबंधन नहीं करेगी. पंजाब कांग्रेस ने बुधवार को पार्टी के शीर्ष नेताओं से कहा कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए प्रदेश में पार्टी को गठबंधन करने की आवश्यकता नहीं है और पार्टी अपने दम पर सभी 13 सीटों पर जीत हासिल करेगी. 

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मगर इन सबमें अहम मायावती के साथ लोकसभा चुनाव में गठबंधन को लेकर है. दरअसल, उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें हैं. अगर कांग्रेस और मायावती साथ आने के लिए तैयार होते हैं तो बीजेपी को उत्तर प्रदेश से काफी घाटा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस और अखिलेश यादव की पार्टी सपा के बीच महागठबंधन पर कोई पेंच फंसा नहीं है. खुद अखिलेश यादव भी कह चुके हैं कि भाजपा को हराने के लिए वह किसी से भी गठबंधन कर सकते हैं और वह खुद चाहते हैं कि बीजेपी को हराने के लिए विपक्षी एकता को मजबूत किया जाए. मगर अभी लोकसभा चुनाव में कई महीने बाकी हैं और राजनीति में कुछ भी संभव है. यही वजह है कि कांग्रेस के लिए अभी विपक्षी एकता को धरातल पर उतारने के लिए अभी काफी मेहनत करने की जरूरत है.

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