Results 2019: ...तो इस वजह से बिहार में हुई महागठबंधन की दुर्गति

बिहार में शायद 1991 के बाद इस बार के लोकसभा चुनाव का परिणाम होगा जहां सत्तारूढ़ दल ने विपक्ष को मात्र एक सीट पर समेट दिया.

Results 2019: ...तो इस वजह से बिहार में हुई महागठबंधन की दुर्गति

Results 2019: महागठबंधन को इस बार बिहार में केवल एक सीट से संतोष करना पड़ा है

पटना: बिहार में शायद 1991 के बाद इस बार के लोकसभा चुनाव का परिणाम होगा जहां सत्तारूढ़ दल ने विपक्ष को मात्र एक सीट पर समेट दिया. 1991 के चुनाव में सामाजिक न्याय की हवा और लालू यादव के नेतृत्व के कारण कांग्रेस पार्टी एक मात्र बेगूसराय की सीट जीत पायी थी और भाजपा को चार सीटें अब के झारखंड में मिली थीं. लेकिन इस बार भी उसी कांग्रेस पार्टी को किशनगंज सीट से संतोष करना पड़ा. लेकिन इस बार के बाद सब इस पराजय का कारण जानने में लगे हैं लेकिन सरसरी नज़र से देखें तो इस परिणाम के कारण कुछ यूं हैं...

मामले से जुड़ी अहम जानकारियां :

  1. चुनाव के पूर्व ही बिहार में एनडीए और महागठबंधन के बीच वोट का फ़ासला बीस प्रतिशत का था जिसकी भरपाई करना नरेंद्र मोदी-नीतीश कुमार-रामविलास पासवान के त्रिदेव के सामने नामुमकिन था क्योंकि इन तीनों का वोट एक दूसरे को ट्रांसफर कराना आसान था. नीतीश ने तो 1996 से लेकर सभी चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़ा, केवल 2014 का लोकसभा चुनाव और 2015 का विधानसभा चुनाव उन्होंने भाजपा और पासवान के विरोध में लड़ा था.

  2. इसके अलावा महागठबंधन ने इस समीकरण की काट ढूंढने के लिए जिन चार दलों कांग्रेस, कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, जीतन राम मांझी की हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा और मुकेश निषाद की वीआईपी पार्टी से समझौता किया उनका आंशिक रूप से कई क्षेत्रों में वोट ट्रांसफर तो हुआ लेकिन वो चाहे  कुशवाहा मतदाता हों या मल्लाह जाति के मतदाता हों, या मांझी वोटर उनके एक बड़े तबके का झुकाव NDA की तरफ़ ज़्यादा दिखा जिसका परिणाम यह रहा कि अधिकांश क्षेत्रों में NDA उम्मीदवारों की जीत का अंतर दो लाख से ऊपर रहा.

  3. बिहार में महागठबंधन के दलों के बीच सीट बांटने का ज़िम्मा राष्ट्रीय जनता दल और उसके दो शीर्ष नेता लालू यादव और तेजस्वी यादव के कंधे पर था लेकिन उन्होंने सीटों के तालमेल और उम्मीदवारों के नामों की घोषणा में विलंब किया जिसके कारण NDA को, जिसमें एक साथ अपने दलों के बीच सीटों के नाम और उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की, उसका एक मनोवैज्ञानिक लाभ शुरू से लेकर अंत तक उन्हें मिला है.

  4. तेजस्वी यादव प्रचार के दौरान भी अपने सभी सहयोगियों के लिए चुनाव प्रचार में तो गए लेकिन जो संयुक्त सभा कर चुनाव में एकता का संदेश दे सकते थे उसमें उन्होंने काफ़ी विलंब किया. यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ भी वो तीसरे चरण के बाद समस्तीपुर में पहली बार संयुक्त सभा में शामिल हुए. तेजस्वी यादव के सहयोगियों का ही मानना है कि उनके आचरण में एक राजनीतिक परिपक्वता और गंभीरता का अभाव दिखा जिसका खामियाजा कई उम्मीदवारों को उठाना पड़ा.

  5. तेजस्वी यादव ने चुनाव प्रचार के दौरान जिन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया, जैसे भाजपा अगर आ गई तो संविधान ख़तरे में है, आरक्षण ख़त्म कर दिया जाएगा उसका बहुत प्रभाव मतदाताओं के ऊपर नहीं दिखा और बहुतों का मानना है कि उनके भाषण के दौरान लोगों का मनोरंजन तो बहुत होता था लेकिन उन्हें ही वोट क्यों दें उसके बहुत सारे कारण उनके भाषण में नहीं मिल पाते थे. जबकि नरेंद्र मोदी या नीतीश कुमार के भाषण में मतदाता को एक नहीं कई कारण मिलते थे कि आख़िर उन्हें ही वोट एक बार फिर क्यों न दिया जाए.

  6. बिहार में पिछले साल अररिया लोकसभा और जहानाबाद विधानसभा के उपचुनाव के परिणाम को पूरे बिहार में दोहरा देने का तेजस्वी यादव का अति आत्मविश्वास का न सिर्फ उनकी पार्टी के उम्मीदवारों बल्कि महागठबंधन के सभी उम्मीदवारों को इसका खामियाजा उठाना पड़ा, क्योंकि सभी लोकसभा क्षेत्रों में वोटर का गणित एक समान नहीं होता है और सामान्य लोक संवाद चुनाव में मुद्दा अलग होता है.

  7. तेजस्वी यादव की सोशल मीडिया पर लाइक और शेयर के भरोसे बिहार की राजनीति में झंडा गाड़ देने की रणनीति भी महागठबंधन की दुर्गति का एक कारण बना क्योंकि तेजस्वी अपने कार्यकर्ताओं और पार्टी के नेताओं से मिलने से ज़्यादा हर दिन अपने सोशल मीडिया टीम के भरोसे कुछ ट्वीट कर और हज़ारों की संख्या मैं उसका लाइक देखकर आश्वस्त हो जाते हैं कि बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री बनने का उनका सपना पूरा हो जाएगा.

  8. बालाकोट के एयर स्ट्राइक के बाद जिस प्रकार से धरातल पर राजनितिक डिसकोर्स बदला और जैसे प्रधानमंत्री ने टीवी और मीडिया के माध्यम से घर में घुसकर बदला ले लिया जैसे भाषण शुरू किये, उसकी कोई काट महागठबंधन के पास नहीं थी. आप कह सकते हैं महागठबंधन के नेताओं में चुनाव में क्या रणनीति होनी चाहिए उस पर गंभीरता से कभी बात ही नहीं हुई. समन्वय केवल इस बात तक सीमित था कि तेजस्वी कहां प्रचार करेंगे.

  9. राजद के वरिष्ठ नेताओं जैसे रघुवंश प्रसाद सिंह का मानना है कि अगड़ी जाति के लिए 10 प्रतिशत के आरक्षण के विरोध का भले ही RJD के सभी उम्मीदवारों को खामियाजा नहीं भुगतना पड़ा लेकिन अगड़ी जाति के उम्मीदवारों जैसे ख़ुद उन्हें भी इसका काफ़ी खामियाजा उठाना पड़ा क्योंकि उनकी अपनी जाति के लोग उन्हें इस विरोध के कारण वोट देने के लिए तैयार नहीं थे जिसका सीधा लाभ उनके सामने खड़े प्रतिद्वंद्वियों को मिल रहा था. रघुवंश प्रसाद सिंह का कहना है कि अगड़ी जाति के आरक्षण का वादा तो ख़ुद राष्ट्रीय जनता दल ने अपने कई घोषणा पत्रों में किया है.

  10. महागठबंधन की दुर्गति के पीछे सबसे बड़ा एक कारण तेजस्वी यादव का यह मानना रहा कि नीतीश कुमार के बिना वो बिहार की राजनीति में अपना झंडा गाड़ सकते हैं. यह एक ऐसा सच है जिसके कारण न केवल लोकसभा चुनाव में बल्कि अगर NDA इसी तरीक़े से विधानसभा चुनाव में भी लड़ी तो अगर विपक्ष द्वारा मेहनत से मुद्दे और माहौल नहीं बनाए गए तो एक बार फिर महागठबंधन की दुर्गति की कहानी दोहराई जाएगी.