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चुनाव दर चुनाव, लेकिन भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों की फिक्र किसी को नहीं

विधानसभा के बाद लोकसभा चुनाव, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से दो दफे मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस के दिग्गज दिग्विजय सिंह हैं

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चुनाव दर चुनाव, लेकिन भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों की फिक्र किसी को नहीं

भोपाल गैस त्रासदी (फाइल फोटो)

भोपाल:

विधानसभा के बाद लोकसभा चुनाव, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से दो दफे मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस के दिग्गज दिग्विजय सिंह हैं, उनके सामने बीजेपी से हैं प्रज्ञा सिंह ठाकुर और दोनों के सामने हैं 34 साल बाद भी वैसे ही खड़े भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित, जिनके जख्मों पर इतने साल के बाद भी कोई सरकार मरहम नहीं लगा पाई है. पीड़ित मुआवज़ा समेत बुनियादी सुविधाओं के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं, बावजूद इसके किसी के घोषणापत्र में इन पीड़ितों का जिक्र तक नहीं.  भोपाल के गैस पीड़ितों को लगता है कि दर्द की उनकी तस्वीरों, लोगों को वक्त के साथ भुला दिया गया किसी राजनीतिक दल के घोषणापत्र, दृष्टिपत्र कहीं भी इन्हें जगह नहीं मिलती. फिर भी दिल में ज़ख्म लिये भोपाल गैस त्रासदी के ये पीड़ित ऐसे लाखों पोस्टकार्ड पिटिशन में अपना दर्द लिखते हैं.

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हसीना बी पुतली घर में रहती हैं, गैस त्रासदी ने परिवार के 3 लोगों को लील लिया. 3 मौतों की कीमत लगी 25000 रुपये, लोकसभा चुनाव हैं लेकिन इनकी उम्मीदें टूट चुकी हैं. भैय्या हम इंतज़ार करते रहे ये पार्टी आएगी तो सहायता देगी. हमें इंतज़ार में कितने साल हो गये बताएं आप कोई पार्टी ने हमारा साथ नहीं दिया. क्यों उठाएंगे हमारी आवाज़, गरीबों की आवाज़ कौन उठाता है. दो बेटे 10-12 साल के थे कोई उम्मीद नहीं थी ऊपरवाले से करें अगर है तो जब्बार भाई मेहनत कर रहे हैं उनकी मेहनत वसूल कर दे परवर दिगार. इब्राहिमपुरा में रहने वालीं 62 साल की हमीदा बी गैस हादसे को लेकर आज भी सहम जाती हैं. गैस त्रासदी के बाद उनके परिवार के एक-एक कर 41 लोग जान गंवा चुके हैं. खुद कई बीमारियों से जूझ रही हैं, कहती हैं 2 दिसंबर 1984 की आधी रात को जान बचाने के लिये जब निकलीं तो हर तरफ सिर्फ मौत का ही मंजर देखा. ससुराल, मायका सब खाली हो गया. कहती हैं किसी को वोट दें कोई ध्यान नहीं देता है. 

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34 साल हो गये भोपाल के 5 लाख 74000 को आजतक किसी सरकार ने किसी घोषणापत्र के अंदर एक लाइन नहीं लिखी ताकि गैस पीड़ितों को तसल्ली हो. इतनी सरकारें आ रही हैं जा रही हैं सरकार पर उम्मीद करो लेकिन वो कुछ नहीं करती ना सुनती. हमारे रोज़गार, पेंशन की बात करें सिर्फ वोट लेना है विदेश घूमना है.गैस रिसाव से रईसा बी ने दो बच्चों, पति को खो दिया  कहती हैं किसी राजनीतिक दल से कोई उम्मीद नहीं जो मिला कोर्ट से .लड़कर मिला चुनाव से कोई उम्मीद नहीं है, पहले भी कांग्रेस थी जब गैस रिसी बीजेपी आई हम करेंगे तो आने के साथ रोजगार छीन लिया 2200 महिलाओं का.

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इन पीड़ितों के हक़ के लिये सालों से लड़ रहे भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग के संयोजक अब्दुल जब्बार कहते हैं  हम लाखों पोस्टकॉर्ड पिटिशन भेज रहे हैं, दोनों पार्टियां कांग्रेस-बीजेपी का ध्यान इस ओर नहीं है जो बहुत शर्मनाक है. ये पूछा जाए प्रज्ञा ठाकुर से यूनियन कार्बाइड कहां है वो दिशा नहीं बता पाएंगी हमारे शिवराज चौहान को 26000 मेमोरेंडम हमने दिये वो कहां गये हमें मालूम नहीं.  हालांकि दोनों राजनीतिक दल कहते हैं, हम पीड़ितों को भूले नहीं है वैसे उनके हालात के लिये वो अपने नहीं दूसरे के राज को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. बीजेपी प्रवक्ता  राहुल कोठारी ने कहा लगातार उनसे हमारा संपर्क रहता है, उनके बीच में काम करते रहे हैं, कांग्रेस की सरकार जबसे आई है सिर्फ कागजों पर काम हो रहा है जो अस्पताल बनाया गया था भोपाल मेमोरियल वो बंद होने की कगार पर आ गया इससे खराब कुछ नहीं हो सकता.

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वहीं कांग्रेस प्रवक्ता मानक अग्रवाल का कहना है बीजेपी की सरकार ने 15 साल में कुछ ध्यान नहीं दिया इसलिये इस स्थिति से गुजरना पड़ रहा है. दिग्विजय सिंह तो उन इलाकों में जाते हैं प्रज्ञा को तो पता ही नहीं किसी गली में क्या हुआ था. पीड़ित कहते हैं, 14-15 फरवरी 1989 को केन्द्र सरकार और यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन के बीच हुआ समझौता पूरी तरह से धोखा था, जो रक़म मिली उससे हरेक गैस प्रभावित को पांचवें हिस्से से भी कम मिला.

समझौते में गैस रिसने से 3,000 लोगों की मौत और 1.02 लाख प्रभावित बताए गए थे. जबकि असलियत में 2-3 दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात को यूनियन कार्बाइड से रिसी मिथाइल आइसोसाइनाइट से अब तक 20,000 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं और लगभग 5.74 लाख लोग प्रभावित हुए हैं. हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 1919 के बाद हजारों लोगों को मौत के मुंह में धकेलने वाली 1984 की भोपाल गैस त्रासदी दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाओं में से एक है, लेकिन 34 साल बाद भी अगर पीड़ित दर दर की ठोकरें खा रहे हैं तो उसकी वजह भी सियासी है, सर्वदलीय है आखिर इस हादसे के गुनहगार को देश से भगाने वाले उस वक्त कुर्सी पर बैठे थे, तो उन्हें कोर्ट में बचाने वाले आज कुर्सी पर बैठे हैं.

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