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मध्यप्रदेश में हजारों आंगनवाड़ी केंद्रों में लगे ताले, किराया देने को पैसा नहीं

आर्थिक बदहाली से गुजर रही मध्यप्रदेश सरकार ने आंगनवाड़ियों को अक्टूबर 2018 से पैसा नहीं दिया

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मध्यप्रदेश में हजारों आंगनवाड़ी केंद्रों में लगे ताले, किराया देने को पैसा नहीं

मध्यप्रदेश में किराया न दिए जाने से आंगनवाड़ी केंद्रों में ताले लग गए हैं.

खास बातें

  1. राज्य में किराये के भवनों में चल रहीं 29383 आंगनवाड़ियां
  2. करीब 26000 केंद्रों को 8 महीने से किराया नहीं दिया गया
  3. कार्यकर्ताओं के 1124 और सहायिकाओं के 1327 पद खाली
भोपाल:

मध्यप्रदेश आर्थिक तौर पर बदहाली से गुज़र रहा है, हालात ऐसे हैं कि हज़ारों आंगनवाड़ी केन्द्रों में ताला जड़ दिया गया है क्योंकि किराये के पैसे नहीं हैं. सरकार ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को स्थायी करने का ऐलान किया लेकिन बजट के अभाव में उन्हें पूरा मानदेय तक नहीं मिल रहा है.

मंदसौर में वार्ड नंबर 40 के आंगनवाड़ी केंद्र दो पर शनिवार को ताला जड़ दिया गया. वजह मकान मालिक को 10 महीने से किराया नहीं मिला है, बच्चे धूप में बैठे रहे, बेबस आंगनवाड़ी संचालिका राखी चौहान ने पास के एक नीम के पेड़ के नीचे उन्हें मध्यान्न भोजन दिया. मकान मालिका ने लोगों से कह दिया कि आएं तो कह देना कि व्यवस्था हो जाए तो शाम तक आ जाना. राखी चौहान ने कहा कि अब मैं नीम के नीचे लेकर बैठी हूं, बच्चों को नाश्ता भोजन करवा के मैं बैठी रहूंगी.
     
आगर मालवा के वार्ड नंबर 3 में 40 बच्चे 8x8 के एक कमरे में हैं. बाहर पारा 45 डिग्री पर है. इस एक कमरे में सरकारी नियमों के मुताबिक इस कमरे में बच्चों को खेल खेल में पढ़ाई , वजन , माप , पोषण आहार, मध्याह्न भोजन, मंगल दिवस कार्यक्रम आदि गतिविधियां बिना रोक चलानी हैं. और हां यहां बच्चों के खिलौने, खाने के बर्तन, पानी की टंकी, शिक्षण सामग्री, पोषण आहार और दूसरा जरूरी सामान भी सहेजना है. बस चार महीने से पैसा नहीं आया. यहां की सेविका नजमा कहती हैं कि बच्चे यहां बैठे हैं, ज्यादा आते हैं तो यहां भी बिठा लेते हैं. शहरी क्षेत्र है कमरे महंगे मिलते हैं. यहां पर ऊपर से वक्त पर पैसे आते भी नहीं.
      
वार्ड नंबर 5, 218 में कविता सुनाते हुए व्यवस्था से संघर्ष है. मकान मालिक पहले वाली जगह किराया नहीं देने की वजह से खाली करवा चुका है. छह महीने से फिर किराया नहीं मिला. तीन सौ मीटर की ही दूरी पर दूसरा आंगनबाड़ी केन्द्र, बच्चे खीर पूरी की आस में पहुंचे हैं, संचालक को साढ़े सात सौ में किराये से कमरा तो मिल गया लेकिन जगह की कमी है सो एक थाली में तीन बच्चों को भोजन परोसना पड़ा. यहां केन्द्र संभालने वालीं रेहाना कहती हैं 750 रुपये सरकार देती है, 7-8 महीने से वो भी नहीं आ रहा. एक रूम में मध्यान्न भोजन का सामान, बर्तन, वजन, रजिस्टर, कोई अधिकारी आए उनको बिठाना पड़ता है, पंखा वगैरह सुविधाएं इतने कम पैसे में नहीं दे पाते.

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सागर जिले में कुल 2633 आंगनबाड़ी केन्द्र हैं, जिनमें 754 को अक्टूबर से अभी तक किराया नहीं मिला. मध्यप्रदेश में कुल 97139 आंगनवाड़ी केन्द्र हैं. हालात ये हैं कि मध्यप्रदेश में किराये के भवनों में चल रही 29383 आंगनवाड़ियों में से करीब 26000 को 8 महीने से किराया नहीं दिया गया है. 20247 केंद्र ऐसे है जहां शौचालय नहीं है. 93795 केंद्रों में शिशु गृह नहीं है. 46554 केंद्रों में रसोई घर, 15928 केंद्रों पर उपकरणों के भंडारण की जगह, 75700 केंद्रों पर बच्चों के बैठने की कुर्सियां उपलब्ध नहीं हैं.  64148 केंद्रों में बिजली कनेक्शन ही नहीं है. जबकि 69923 केंद्रों में पंखा और 66394 केंद्रों में उजाले के लिए बल्ब उपलब्ध नहीं हैं. शिशु की लंबाई मापने की चार हजार से ज्यादा मशीन अनुपयोगी है.

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के 1124 पद और सहायिकाओं के 1327 पद खाली पड़े हैं. ये हालात लगभग 15 ज़िलों में हैं. सरकार इन केन्द्रों पर सालाना लगभग 62 करोड़ रु खर्च करती है लेकिन अक्टूबर से पैसे नहीं भेजे गए. अप्रैल में वित्त विभाग ने 20 करोड़ रुपये दिए थे लेकिन अब बकाया लगभग 45 करोड़ रुपये हो गया है.
राज्य के लगभग 84.90 लाख बच्चे संपूर्ण बाल विकास कार्यक्रम में शामिल हैं. इसमें 66.36 लाख के लिए पोषण आहार का बजट मिलता है.
 

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फिलहाल इन केन्द्रों की बड़ी चिंता छत छिनने की है. महिला बाल विकास मंत्री इमरती देवी कह रही हैं कि वित्त विभाग से मंज़ूरी का इंतज़ार है. 62 करोड़ देने हैं...वित्त विभाग से 20 करोड़ आ गए वो हमने बांट दिए ... बाकी हमने वित्त  विभाग से कहा है, वो पैसे भेज दें ताकि हम बांट सकें.

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बीजेपी कह रही है सरकार की प्राथमिकता में बच्चे नहीं, हालांकि वह यह भूल रही है कि बजट अक्टूबर से नहीं मिला. पूर्व मंत्री और बीजेपी विधायक विश्वास सारंग ने कहा जिस सरकार में 4 महीने में आयकर के छापे पड़े, 15 करोड़ कैश पकड़े गए वहां बच्चों के लिए 20-25 करोड़ रुपये नहीं हैं. सीधा कारण है उन्हें नहीं पता किस वर्ग के बच्चे आंगनवाड़ी में पहुंचते हैं. चांदी के चम्मच में पैदा हुए लोगों के हाथ में जब सरकार आएगी तो वो उनका दर्द नहीं समझ पाएंगे.



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