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छत्तीसगढ़ : 'नक्सलियों की राजधानी' में 13 साल बाद बजी स्कूल की घंटी, सुरक्षा आज भी चुनौती; देखें- VIDEO

NDTV की टीम नक्सली हिंसा से बुरी तरह प्रभावित रहे जगरगुंडा इलाके से उम्मीदें जगाने वाली तस्वीरें लेकर लौटी

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छत्तीसगढ़ : 'नक्सलियों की राजधानी' में 13 साल बाद बजी स्कूल की घंटी, सुरक्षा आज भी चुनौती; देखें- VIDEO

छत्तीसगढ़ में नक्सल प्रभावित जगरगुंडा कस्बे का स्कूल 13 साल बाद फिर से खुल गया है.

खास बातें

  1. सलवा जुडुम शुरू होने के साथ बच्चों के भविष्य के रास्ते हो गए थे बंद
  2. सलवा जुडूम और नक्सलियों के बीच भीषण हिंसा ने तबाही मचाई
  3. सन 2005 से बंद जगरगुंडा का स्कूल शुरू हुआ, चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा
रायपुर:

अगर 13 सालों तक किसी खौफ में कोई स्कूल बन्द रहे तो सोचिए उस इलाके के लोगों पर क्या गुजरी होगी? छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके सुकमा जिले के जगरगुंडा में प्रशासन ने लंबे अंतराल से बंद पड़े स्कूल को फिर से शुरू किया है. उम्मीद का एक नया चिराग जलाने की कोशिश जरूर हुई है लेकिन चुनौतियां अब भी कम नहीं. हमारी टीम इस मुश्किल इलाके से उम्मीदें जगाने वाली तस्वीरें लेकर लौटी है.
      
घना जंगल... लेकिन पक्की सड़क, थोड़ी-थोड़ी दूरी पर सुरक्षाबलों की चाक-चौबंद टोली गश्त पर... यह रास्ता आपको सुकमा जिले के जगरगुंडा ले जाता है. रास्ते में जलाए गए वाहन... धमाके में उड़ाए गए पुल-पुलिया... नक्सली हिंसा के और भी कई निशान दिखाई देते हैं... इस सन्नाटे में स्कूल की घंटी 13 साल बाद बजी है. 13 साल बाद अच्छे भविष्य के लिए छात्र प्रार्थना कर रहे हैं.

सलवा जुडुम के शुरू होने के साथ आसपास के इलाकों के बच्चों के भविष्य के रास्ते बंद हो गए थे. नक्सलियों का खौफ ऐसा कि जगरगुंडा के स्कूल, आंगनवाड़ी, राशन की दुकानें सब कुछ 70 किलोमीटर दूर दोरनापाल में शिफ्ट करना पड़ा. सुकमा के कलेक्टर चंदन कुमार कहते हैं कि जगरगुंडा का स्कूल आश्रम सन 2006 के बाद से संचालित नहीं हो पा रहा था क्योंकि वहां नक्सलवाद की काफी ज्यादा समस्या थी. और वहां सलवा जुडूम के बाद सभी लोगों और संस्थाओं को रोड के किनारे लाना था, जो बच गए थे वे कैंप में रह रहे थे. वहां के लोगों को बहुत परेशानी हो रही थी, इसलिए राज्य शासन ने निर्णय लिया कि स्कूल वहां वापस जाएंगे.

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सन 2005 के बाद से ही जगरगुंडा में लोग अलग-अलग वजहों से पलायन करने लगे थे. किसी को नक्सलियों का डर तो किसी को पुलिस का खौफ. प्राइमरी और मिडिल स्कूल जैसे-तैसे चलता रहा, हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी की कक्षाएं बंद हो गईं. बच्चों को पढ़ाई के लिए दोरनापाल की 70 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती थी. जंगल, बारिश में रास्तों का बन्द होना और मुसीबतों से दो-चार होना बच्चों के लिए रोज की कहानी थी. अब यहां हायर सेकेंडरी स्कूल फिर से शुरू हो गया है, गणित, विज्ञान और कला जैसे विषय पढ़कर बच्चे नए सपने संजोने में लग गए हैं.

यहां पढ़ रहे छात्र आकाश बताते हैं कि 'दोरनापाल जाते समय कीचड़ में फंस जाते थे. बारिश आती थी तो स्कूल में लेट हो जाते थे. टीचर पूछते थे, इतने लेट क्यों हो गए? विज्ञान छूट जाता था दिमाग में नहीं घुसता था. अब विज्ञान, संस्कृत, अंग्रेजी सब पढूंगा और इंजीनियर बनूंगा.'

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स्कूल फिर से शुरू तो हो गया, लेकिन कई इंतजाम बाकी हैं. हायर सेकेंडरी स्कूल के साथ ही 200 बच्चों के होस्टल के आदेश भी हुए लेकिन अभी इसके साथ शिक्षकों की पर्याप्त व्यवस्था होना बाकी है. 50 छात्र हैं जिन पर 19 शिक्षक. हालांकि स्कूल में कमरों की कमी है. यहां पदस्थ व्याख्याता सोमरू राम उचाकी कहते हैं कि 'यहां हायर सेकेंडरी है. दो संकाय संचालित हैं. हर संकाय के लिए 6-6 क्लासों की आवश्यकता है. दोनों मिलाकर 12 क्लासें लगेंगी. इसके हिसाब से व्यवस्था नहीं है. प्रशासन कह रहा है आश्रम भी यहीं से संचालित करो. यह संभव नहीं हो रहा है. बिजली के लिए उद्घाटन से पहले बहुत जोश दिख रहा था, लेकिन अभी तक आई नहीं है.'

वहीं कृष्ण कुमार नाग कहते हैं, 'शाम हो जाती है, हम कैंपस के बाहर हैं तो हमारे शिक्षक बंधु असुविधा महसूस करते हैं.' प्रिंसिपल के स्कूल ज्वॉइन नहीं करने के सवाल पर वे बताते हैं कि 'सात जुलाई 2005 को बहुत बड़ी घटना हो गई थी. उस दिन सारे टीचर, बच्चों को पूरे दिन भर यहीं रख दिया गया था. शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार हुआ था. प्रिंसिपल सर के साथ मारपीट भी हुई थी, इसलिए वे यहां आना नहीं चाहते.'

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प्रशासन की तमाम कवायदों के बीच आज भी सुरक्षा बड़ा मुद्दा है. ठेकेदार, मजदूरों को सुरक्षा देते हुए स्कूल की बिल्डिंग तय वक्त में पूरी करना, गांव तक निर्माण सामग्री पहुंचाना एक चुनौती थी लेकिन स्कूल लगातार चलाना भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं. सुकमा एसपी शलभ सिन्हा कहते हैं, 'उस एरिया में सीआरपीएफ है, कोबरा है, डीआरजी, हमारा जिला सुरक्षा बल है. वे लगातार उस एरिया में पेट्रोलिंग, एरिया डोमिनेशन के जरिए इलाके को सुरक्षित करते हैं. अंदरूनी इलाके में जा रहे हैं, नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, उनकी गिरफ्तारी हुई है. काफी नक्सलियों ने आत्मसर्मपण किया. इससे लोगों में भरोसा बढ़ा है. लोग आसपास खेती कर रहे हैं, स्कूल का भी अच्छा फीडबैक है.'

    
पुलिस के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन लोग टूटे फूटे दरवाजों, जर्जर हो रही दीवारों फर्श पर उग आई घांस और खामोशी को महसूस करते हैं. यह उस इमारत का हाल है जिसमें कभी स्कूल, छात्रावास, पटवारी कार्यालय, स्वास्थ्य केंद्र और आंगनवाड़ी जैसी संस्थाएं संचालित होती थीं. लोगों में भरोसा जताने और नक्सलियों के खिलाफ मानसिक मनोबल बढ़ाने के लिए पुलिस और सीआरपीएफ की नाकेबंदी में कुछ लोगों के रहने का बंदोबस्त जरूर है. हालांकि कंटीली बाड़ के अंदर सुबह 6 से शाम 6 तक आना जाना होता है.

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सिन्हा कहते हैं 'वहां सीआरपीएफ का कैम्प है, हमारा स्थानीय थाना भी है. हमने यही निर्देशित किया है कि 24 घंटे निगाह रखी जाए. हमारे मोर्चे भी लगे हैं जिस पर संतरी सिक्योरिटी देते हैं. आसपास के इलाके को डोमिनेट करके रखा है. वह जारी रहेगा.'
      
जगरगुंडा ने गाहे बगाहे गहरे जख्म देखे हैं. लेकिन 2005 से पहले यह ठीक ठाक कस्बा था जहां स्कूल, क्लीनिक सब कुछ था. लेकिन सलवा जुडूम आंदोलन में जगरगुंडा तबाह हो गया. नक्‍सलियों और जुडूम के बीच खूनी मुठभेड़ में जगरगुंडा को दंतेवाड़ा और सुकमा से जोड़ने वाली सड़कें उड़ा दी गईं. सन 2005 में यह इलाका दुनिया से बिलकुल कट चुका था. बाद में जगरगुंडा में जुडूम के लोग रहने लगे. आज भी उन्हें बचाने के लिए सुरक्षा बल तैनात हैं.

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