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हजारों करोड़ खर्च होने के बावजूद हर 1000 में से 47 बच्चों की हो रही कुपोषण से मौत

एसआरएस की रिपोर्ट फिर से बता रही है कि मध्यप्रदेश में कुपोषण बच्चों के लिए ले चुका है काल का रूप

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हजारों करोड़ खर्च होने के बावजूद हर 1000 में से 47 बच्चों की हो रही कुपोषण से मौत

मध्यप्रदेश में भारी व्यय के बावजूद बच्चों में कुपोषण की समस्या नहीं सुुलझ रही है.

खास बातें

  1. कुपोषण दूर करने की केंद्र की योजनाएं जमीन पर दम तोड़ रही
  2. योजनाओं के संचालन में बेरुखी से ही कुपोषण खत्म नहीं हो रहा
  3. मंत्री का दावा- मेहनत से 6-7 महीने में कुपोषण को दूर कर देंगी
भोपाल:

मध्यप्रदेश में हजारों करोड़ खर्च होने के बाद भी कुपोषण हर 1000 में से 47 बच्चों को लील लेता है. ये आंकड़े हैं सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम यानी एसआरएस के 2019 के बुलेटिन से. अभी सुर्खियों में बिहार में बच्चों की मौत है दिमागी बुखार लेकिन क्या सच में सिर्फ एक वजह है, या पूरी व्यवस्था बच्चों के प्रति उदासीन है. पोषण आहार, ये स्कीम-वो स्कीम के नाम पर करोड़ों खर्चने का दावा है फिर भी क्यों बढ़ रहे हैं बाल मृत्यु दर के आंकड़े?
     
एसआरएस की रिपोर्ट फिर से बता रही है कि मध्यप्रदेश में कुपोषण बच्चों के लिए काल का रूप ले चुका है. राज्य नवजात बच्चों की कुपोषण के कारण मौत के मामले में पहली पायदान पर है, वो भी तब जब 2016 से 2018 तक कुपोषण मिटाने के नाम पर करीब 19 हजार करोड़ रुपए खर्च करने का दावा किया गया.

श्योपुर के कराहल में रहने वाले सहरिया जनजाति के लोग तो कुपोषण के लिए फोटो फीचर बन गए हैं. जिले में 1226 आंगनवाड़ी केंद्र हैं... कुछ डे केयर भी, सरकार हर महीने 40 लाख रुपये आंगनवाड़ी केन्द्रों को देने की बात कहती है. कराहल विजयपुर में तीन NRC सेंटर भी कुपोषित बच्चों के लिए चलाए जाते हैं... लेकिन हालात साल दर साल कमोबेश एक जैसे.


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श्योपुर में सहारिया, तो शहडोल में बैगा आदिवासी बच्चों की हालत एक जैसी है. पूरे संभाग में 45,000 बच्चे कुपोषित बताए जा रहे हैं. दो महीने पहले सजन बैगा के शरीर में मांस नहीं सिर्फ हड्डियां थीं, उसे भोपाल एम्स भेजा गया लेकिन बच्चा बचाया नहीं जा सका. मंदसौर में 1,22,259 बच्चों में कुपोषण के लक्षण पाए गए हैं. ज़िले के पोषण पुनर्वास केंद्र में 20 बच्चे फिलहाल एडमिट हैं जिनमें से अधिकतर अति कुपोषित हैं. पोषक आहार की कमी के चलते अधिकतर मजदूर या छोटे किसानों के बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं.
    
छतरपुर में गढ़ी मलहरा के सूरज अनुरागी की उम्र 3 साल, वज़न एक किलो 800 ग्राम. बाकी बच्चों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है. बीते साल मई 2019 तक 32 हजार से अधिक बच्चे कुपोषित थे. ये हालात तब हैं जब जिले में 2058 आंगनवाड़ी केन्द्रों में लगभग दो लाख बच्चे हैं.
   
कुपोषण दूर करने में केंद्र सरकार की योजनाएं जमीन पर दम तोड़ रही हैं, राज्य में आदिवासी बहुल धार के एनआरसी में सबसे ज्यादा 1300 कुपोषित बच्चे भर्ती हुए थे. सागर जिला कुपोषित बच्चों के मामले में तीसरे नंबर पर है. पिछले साल अप्रैल से सिम्तबर महीने में जिले के 11 एनआरसी सेंटरों पर 1118  कुपोषित बच्चे भर्ती हुए थे.  हैरानी की बात यह है कि प्रदेश में एक भी एनआरसी सेंटर ऐसा नहीं है, जहां सौ फीसदी कुपोषित बच्चे पोषित हुए हैं. सागर में शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ मधु जैन कहती हैं, कुपोषण का सबसे मुख्य कारण है पहले घंटे में मां का दूध नहीं मिल पाना, 6 महीने तक स्तनपान न कराना, पौष्टिक आहार मां को भी लेना पड़ता है लेकिन वो मिल नहीं पाता, इसलिए हमारे यहां कुपोषित बच्चे ज्यादा हैं.

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गले में लाल और काले धागे के साथ तावीज,  डूबी हुई आंखों के साथ पतले हाथ पैर, माया 11 महीने की है, फिलहाल साढ़े पांच किलो की हुई है, होना था दस के आसपास. झाड़-फूंक से वज़न बढ़ाने की कोशिश हुई, फिर बड़ी मुश्किल से मां आगर-मालवा के एनआरसी लेकर आई. दस बिस्तरों वाले एनआरसी में 16 अतिकुपोषित बच्चे भर्ती हैं, जिसमें 13 लड़कियां, 3 लड़के. समाज की मनोदशा है, बच्चियों के पोषण का आहार तो बेटों को खिला ही देते हैं, उनकी दवाएं भी. इन कुपोषित बच्चों की ज्यादातर कहानी, बेटे-बेटियों में भेद से शुरू होती है. अब प्रेम बाई ने आठवीं तक बड़ी बेटी को पढ़ाया उसकी शादी कर दी. आगर मालवा में ही ढाई साल की प्रियांशु का वजन महज साढ़े आठ किलो है जबकि होना चाहिए करीब 12 किलो, लेकिन मां ने एनआरसी में भर्ती नहीं कराया.
     
बच्चे आंगनवाड़ी नहीं आना चाहते, परिवार उनको अस्पताल में भर्ती नहीं कराता. इसकी एक वजह डिंडोरी में दिखी. कुपोषण खत्म करने यहां कोदो कुटकी पौष्टिक अनाज से बनी पट्टी दी जाती है. कई आंगनवाड़ी केंद्रों में इसमें फंफूद लग गई क्योंकि बच्चे इसे खाना नहीं चाहते, लेकिन स्व-सहायता समूह के लोग हर हफ्ते ये थमा जाते हैं.

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जानकार मानते हैं कि ऐसी बेरुखी से ही कुपोषण खत्म नहीं हो रहा है. बाल अधिकारों के लिए काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सचिन जैन कहते हैं जब हम शिशु मृत्य दर की बात करते हैं तो बहुत जरूरी है कि किशोरी बालिकाओं, गर्भवती महिलाओं को और बच्चों के मुद्दे को एक साथ देखा जाए. इन तीनों के मुद्दे को टुकड़े-टुकड़े में वर्गीकृत कर एकीकृत करना बहुत जरूरी है. हमारी प्लानिंग समुदाय केन्द्रित नहीं है. सरकार मानकर चलती है कि लोग केवल पैसा मांगना चाहते हैं. वास्तव में कई ऐसी पहल हो सकती हैं जिसमें बजट की जरूरत नहीं है, जैसे बच्चों को जन्म के तत्काल बाद स्तनपान नहीं मिल रहा, रोजगार कार्यक्रम में मातृत्व हक का हिस्सा जोड़ दिया जाए तो अतिरिक्त बजट की जरूरत नहीं है.
      
मध्यप्रदेश में महिला बाल विकास मंत्री इमरती देवी से जब आंकड़ों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने दावा किया कि ''अपनी मेहनत से वे 6-7 महीने में कुपोषण को दूर कर देंगी, इस कलंक को दूर कर देंगी. हमारा काम चालू होने को आया आचार संहिता लग गई, अब पूरे संभाग की मीटिंग ले रहे हैं. मैं खुद गरीब वर्ग से आई हूं गरीब बच्चों के हाल जानती हूं, छोटे छोटे लोग मेहनत मजदूरी को जाते हैं. बच्चियों की जल्दी शादी कर देते हैं. वे खुद ही तंदरुस्त नहीं होंगे तो बच्चा कैसे तंदरुस्त होगा. मैं पूरी मेहनत से काम करूंगी दिखा दूंगी 6-7 महीने में.''

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वहीं 15 साल राज कर चुकी बीजेपी 6 महीने में व्यथित है, उस लगता है कांग्रेस ठीक से काम नहीं कर रही. पूर्व सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग कहते हैं ''15 साल हमारी सरकार में हमने प्रयास किया. हमें पूरे 20 साल का देखना पड़ेगा. हमने कई योजनाएं बनाईं उन बच्चों के लिए, लेकिन 6 महीने में इस सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया, वो तबादलों-भ्रष्टाचार में लगी रही. इनके एजेंडे में गरीब थे नहीं. मंत्री इस बात की ज्यादा फिक्र करते हैं कि बंगले में कितने का नल लगे, मरम्मत होगी. जब ऐसी सरकार चलेगी तो ऐसी अव्यवस्था देखने को मिलेगी.''

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मध्यप्रदेश में सरकार तो बदल गई लेकिन एक स्तर के बाद 'कुपोषण के आंकड़ों में घोटाले' पर पहले वाली सरकार चुप्पी साधे रही, तो अब नई सरकार के लिए भी इसे स्वीकारना मुश्किल है. सबकी कोशिश बस आंकड़ा मैनजमेंट है.

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वैसे राज्य में फिलहाल सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1084948 बच्चे  मध्यम कुपोषित और 1,19,574 अति कुपोषित हैं. बच्चों के जीवन की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी संविधान सरकार को देता है. ऐसे में किसी भी बच्चे के कुपोषण और स्वास्थ्य के संकट को हल न कर पाने की जिम्मेदारी भी चुनी हुई सरकार की ही होगी. और हां जिंदगी-मौत के बीच सरकारी मोहलत नहीं होती.

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