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भारत बंद हिंसा : छह दलितों की मौत, छह दिन बाद भी आरोपी पहुंच से दूर

NDTV इंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट : मध्यप्रदेश में भिंड जिले के मेहगांव से शुरू हुआ था हिंसा का तांडव

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भारत बंद हिंसा : छह दलितों की मौत, छह दिन बाद भी आरोपी पहुंच से दूर

प्रतीकात्मक फोटो.

खास बातें

  1. छत पर से तीन सवर्णों ने चलाई थीं गोलियां
  2. 22 साल के प्रदीप और 15 साल के आकाश जाटव की मौत
  3. दो सवर्णों की भी हत्या हुई लेकिन कारण जातिगत द्वेष ही
भोपाल: दो अप्रैल को भारत बंद के दौरान देश भर में हुई हिंसा में 11 लोगों की मौत हुई. इसमें से सबसे ज्यादा 8 लोगों की मौत मध्यप्रदेश के चंबल संभाग में हुई. दो अप्रैल को देश भर में दलित सड़कों पर उतरे. उनको नाराजगी 1989 में बने कानून को कथित तौर पर कमजोर करने को लेकर थी. एनडीटीवी ने जब ग्राउंड जीरो के साथ एफआईआर की पड़ताल की तो पता लगा मरने वालों में 6 दलित थे और आरोपी सवर्ण. छह दिन बीत गए लेकिन आरोपी अब भी पुलिस की पकड़ से दूर हैं.  
        
हमारा सफर भिंड के मेहगांव से शुरू हुआ. दो अप्रैल को बंद के दौरान हिंसा का तांडव ग्वालियर से लगभग डेढ़ घंटे की दूरी पर बसे मेहगांव ने सबसे पहले दिखा जहां दो दलित लड़कों 22 साल के प्रदीप और 15 साल के आकाश जाटव को गोली लगी. प्रदीप ने ग्वालियर के आईटीआई से डिप्लोमा किया था और नौकरी की तलाश में था. प्रदर्शनकारियों के साथ वह मेहगांव में था जब उसे गोली मारी गई. प्रदीप की मां अंगूरी ने रुंधे गले से बताया कि उसने खुद फोन कर कहा उन लोगों ने मुझे गोली मार दी है, जल्दी आओ.

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FIR के मुताबिक सोनू, मोनू और बल्लू राठौर आरोपी हैं, सब सवर्ण जिन्होंने छत से गोलियां चलाईं. ये तीनों आकाश की मौत के भी आरोपी हैं. 15 साल का आकाश बाज़ार से सब्जी खरीदने गया था, घर आई उसे गोली लगने की खबर. पिता का साया बहुत पहले उठ गया था. मां आकाश को अफसर बनाना चाहती थीं. जब वो वापस लौटा गोली चलने लगी ... उसने बताया कि सोनू-मोनू ने गोली चलाई है "".. ये कहना था आकाश के मामा आसाराम का.
      
छह दिन बीत गए, तीन आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई, वे फरार हैं. उनकी सूचना देने पर 10,000 रुपये के इनाम का ऐलान किया गया है. प्रदीप और आकाश उन छह दलितों में से हैं जिनकी दो अप्रैल को मौत हुई. हर मृतक के परिजन का कहना है कि गोली सवर्णों ने चलाई.  

40 साल के दशरथ जाटव का शव, भिंड में रोन थाने के करीब तीन अप्रैल को खेत में मिला. प्रदर्शन के दौरान जब प्रदर्शनकारियों को कथित तौर पर खदेड़ा गया तो वह थाने में घुस गए. दशरथ अंदर नहीं आ पाए. परिवार का आरोप है कि सवर्णों ने उन्हें घसीटा फिर पीट-पीटकर मार डाला. दशरथ के भतीजे नीरज नरवारिया ने कहा वे रैली में गए थे, पथराव शुरू हो गया. वे चौकी में नहीं घुस पाए उन्हें ठाकुरों ने खींचकर मार डाला.     

सवाल ग्वालियर के थाटीपुरा में 22 साल के दीपक जाटव की मौत पर भी है. राजा चौहान ने जहां गोली चलाई उस गली में 22 साल के दीपक जाटव की चाय की टपरी थी. परिवार उसी की कमाई के आसरे था. पिता कहते हैं बेटे की लाश को घर तक लाने नहीं दिया, ये दर्द समझने आपको बस्ती गोदाम में घुसना होगा, बैठना होगा उस बाप के पास जिसने तीन गोलियों से छलनी अपने बेटे को विदा किया है...बिना मंजूरी क्या मंजूरी होगी, मोहल्ले में लाश नहीं आई ... हम क्या कर सकते हैं साहब. क्या कानून से लड़ सकते हैं, हम परिवार नहीं चला सकते, सरकार क्या चलाएंगे ... उन्होंने कहा मार डालो, मार डाला उन्होंने कहा जला दो जला दिया ,.. हमारा कोई नहीं है साहब ... एक पुलिस वाला हमसे बोला तुम्हारा बेटा राजा की गोली से नहीं मरा कोई 12 नंबर होती है उससे मरा ... हमें 12-13 गिनती तक नहीं आती साहब..

वैसे सवाल है, जब हमने पूछा तो पुलिस ने कहा उसे फॉरेंसिक का इंतजार है...फिर पिता को कैसे बताया गोली किससे चली? और तो और राजा चौहान के खिलाफ मामला भी गैर इरादतन हत्या का दर्ज हुआ है, क्या वहां राजा के अलावा भी किसी ने गोली चलाई है? ग्वालियर के एसएसपी डॉ आशीष ने कहा "जो साक्ष्य हैं तो अपराध पंजीबद्ध किया और अगर साक्ष्य आते हैं तो हम करेंगे. फॉरेंसिक एक्सपर्ट से चर्चा करके किसी आखिरी नतीजे पर पहुंच पाएंगे.

ग्वालियर के ही भीमपुरा में 40 साल के राकेश जाटव को गोली लगी, हर दिन कुम्हारपुरा मजदूरी करने जाते थे. बिटिया टिफिन बांधकर देती थी घर से 300 मीटर दूर उन्हें गोली लगी.

वैसे सिर्फ दलित ही नहीं हिंसा में दो सवर्णों की भी मौत हुई, कम से कम एक की पुलिस फायरिंग में. पर यहां भी मौत के पीछे जाति एक वजह दिख रही है.

40 साल के महावीर राजावत की मौत मच्छंड में हुई, बताया जा रहा है कि उन्हें खबर लगी कि प्रदर्शनकारियों ने उनके भाई की दुकान को आग लगा दी. महावीर जब बाजार पहुंचे तो उनकी पिटाई हो गई. उन्हें थाने के बाहर गोली मारी गई. मामले में दो पुलिस वाले भी आरोपी हैं. आरोपी दलित हैं. सूत्रों का कहना है कि जांच इस बात पर भी हो रही है कि क्या भीड़ ने आरोपियों को गोली चलाने के लिए उकसाया और क्या इसके पीछे जातिगत द्वेष था.

राजावत के पिता रंधोर सिंह का कहना है वे किसी से लड़ना नहीं चाहते  "हम क्या कर सकते हैं साहब, हमारे पास पैसा नहीं है... हम किसी से नहीं लड़ना चाहते, किसी से दुश्मनी नहीं है शायद वक्त खराब था.'
    
20 साल के राहुल पाठक की मौत मुरैना में हुई. हालांकि पुलिस इसे बंद के दौरान हिंसा से नहीं जोड़ रही. मामले में रामू गुर्जर सहित दो लोगों के खिलाफ एफआईआर हुई है पिता कहते हैं "बंद की आड़ में पुरानी दुश्मनी निकाली गई कुछ दिनों पहले क्रिकेट खेलने में झगड़ा हुआ था, उसे दंगे की आड़ में मारा ... हिंसा नहीं होती तो गोली नहीं मार पाते.''

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VIDEO : हिंसा के पीछे की कहानी

जिनके अपनों की मौत हुई उनके घाव भरने में वक्त लगेगा ... फिलहाल उन्हें गोली चलाने वालों से जवाब चाहिए. खुफिया विभाग कह रहा है कि दंगे फैलाने के लिए संगठनों को कई अफसरों, व्यापारियों ने मोटी रकम दी, लोगों को चिन्हित किया गया है. जांच जारी है. बहरहाल रिपोर्ट आने में वक्त लगेगा लेकिन एक बात तय है कि राज्य में जाति की खाई और गहरी हो गई है.


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