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होली के रंग बशीर बद्र के संग

बशीर बद्र की सुख़नगोई का मुरीद कौन नहीं होगा…सीधे साधे उनके अल्फाज़ सीधे दिल में घर करते हैं.

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होली के रंग बशीर बद्र के संग

होली के रंग बशीर बद्र के संग

भोपाल: बशीर बद्र की सुख़नगोई का मुरीद कौन नहीं होगा…सीधे साधे उनके अल्फाज़ सीधे दिल में घर करते हैं. उर्दू शायरी में वो आवाम के शायर हैं.  होली के मौके पर बशीर साहब से रूबरू होने एनडीटीवी के साथ चलिये उनसे मिल आएं. अपने अज़ीम शायर से आपको रूबरू कराने के मौके की चाहत में, हमने भोपाल के ईदगाह हिल्स में बशीर साहब के घर का रूख कर ही लिया...इसी शेर के साथ 

लेहज़ा कि जैसे सुबह की खुश्बू अज़ान दे
जी चाहता है मैं तिरी आवाज़ चूम लूं


घर पहुंचे तो होली के रंगों से भीगे शेर से स्वागत किया राहत बद्र जी ने ..

कभी सात रंगों का फूल हूं, कभी धूप हूं कभी भूल हूं…मैं तमाम कपड़े बदल चुका तेरी मौसमों की बहार में... 
और कहा सबके लिये दुआ है... पूरा भारत जहां जहां इनके चाहने वाले हैं सब खुश रहें ... रंगों भरों ज़िंदगी हो 


होली के रंग बशीर साहब के बेटे तैयब ने भी हमारे साथ साझा किया. आईआईटी से पढ़े हैं... लेकिन हमारी आपकी तरह उस अदब के फैन हैं जिनका नाम है बशीर बद्र... तैयब बताते हैं 

" अब्बा को रंग बहुत पसंद हैं, धूप छांव पतझड़ बहुत पसंद हैं ...
इसलिये
कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ, वो गज़ल का लहजा नया नया ... ना कहा हुआ ना सुना हुआ 


बशीर बद्र एक उम्मीद का नाम हैं, घर में सन्नाटा जरूर है... लेकिन राहत जी शेर कहती हैं तो वो मिसरा पूरा करते हैं 
यूं बेसबब ना फिर करो, ना फिरा करो किसी शाम घर भी रहा करो ... और बताती हैं कि वो शायरी सुनकर सबसे ज्यादा खुश होते हैं.

बशीर साहब की खूबी है कि सादे अल्फाजों में वो अहसासों को पिरो देते हैं...दौर कोई भी हो, उनकी बातें याद रहती हैं... जो शिमला समझौते के वक्त पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी से कहा था 

दुश्मनी जमके करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदा ना हों


ज़िंदादिल बशीर साहब मुशायरे के मूड में तुरंत ढल जाते हैं, शेर सुनकर उनके बदले हाव-भाव आप राहत दी में चाहें तो महसूस कर लें... घर पर कभी मुशायरे की ऊर्जा वो खत्म होने नहीं देतीं ... प्यार उनके अल्फाजों से हमारे साथ बांटते हुए

सात संदूकों में भरकर दफ्न कर दू नफरतें, आज इंसा को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत ...
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ना जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए ..


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होली के दिन बशीर साहब बताते हैं कि वो कभी ‘बूढ़े’, ‘लाचार’,‘तन्हा’ या ‘अकेले’ नहीं ...हम सब तो उनके साथ हैं हीं, करोड़ों अल्फाज़ भी उनके आसपास खड़े हैं ... यक़ीन दिलाने
दहलीज पर खड़े वो लिखते रहेंगे ... कहते रहेंगे शायर की कलम SE खुशियां ... यक़ीन नहीं आता तो सुन बताता हूं... अपनी आवाज़ में उन्होंने ख़ुद कहा 

"ठीक हूं ... बिल्कुल "


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