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मध्यप्रदेश : एससी-एसटी एक्ट में संशोधन बीजेपी के लिए गले की फांस बना

कांग्रेस ने बीजेपी को बनाया निशाना, कहा- हकीम साहब ने पैंट खोल लिया अब सिलते नहीं बन रहा है, अब संभल नहीं रहा

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मध्यप्रदेश : एससी-एसटी एक्ट में संशोधन बीजेपी के लिए गले की फांस बना

एससी/एसटी एक्ट के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए सवर्ण और पिछड़े वर्ग के लोग.

खास बातें

  1. राज्य की 230 विधानसभा सीटों में से 148 पर सवर्ण-ओबीसी का सीधा प्रभाव
  2. सीएम शिवराज सहित मंत्रियों को लगातार करना पड़ रहा विरोध का सामना
  3. डैमेज कंट्रोल के लिए पदाधिकारियों से रणनीति बनाने कहा गया
भोपाल:

मध्यप्रदेश में अबकी बार 200 पार का नारा देने वाली बीजेपी के लिए एससी-एसटी एक्ट में संशोधन गले की फांस बन गया है. सवर्णों की नाराजगी शिवराज के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है क्योंकि प्रदेश में सवर्ण एवं पिछड़े सीधे तौर पर 148 सीटों को प्रभावित करते हैं. हालात संभालने मुख्यमंत्री निवास से लेकर बीजेपी मुख्यालय तक आला नेताओं की रोज बैठक चल रही हैं.
      
गुरुवार को भी सवर्ण समाज के लोग राजधानी भोपाल में मुख्यमंत्री निवास घेरने निकले, लेकिन पीडब्लूडी मंत्री रामपाल सिंह के घर से लाठियां खाकर वापस लौटना पड़ा. इससे पहले 18 सितंबर को सतना में जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ओबीसी सम्मेलन में पहुंचे थे तो सवर्णों ने उन्हें काले झंडे दिखाने की कोशिश की. पुलिस ने वहां भी जमकर लाठियां भांजी थीं. दो सितंबर को सीधी में शिवराज सिंह चौहान पर चप्पल फेंकी गई थी. काले झंडों, नारों से दो चार कांग्रेस-बीजेपी दोनों पार्टियों को आला नेताओं को होना पड़ा.

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भारत बंद के दौरान भी दोनों पार्टियों के खिलाफ सवर्ण-ओबीसी वर्ग का गुस्सा फूटा. नतीजे में बीजेपी-कांग्रेस दोनों दल मंथन में जुट गए हैं क्योंकि राज्य की 230 विधानसभा सीटों में सवर्ण-ओबीसी के सीधे प्रभाव वाली 148 सीटें हैं. वहीं आरक्षित वर्ग की कुल 82 सीटें हैं. साल 2013 में बीजेपी ने 148 में से 102 सीटें जीती थीं, यानी बहुमत से सिर्फ 14 कम. जाहिर है, ऐसे में बीजेपी के सामने यह सीटें बचाए रखने की चुनौती है, वह भी आरक्षित वर्ग को नाराज किए बिना.

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह इन प्रदर्शनों के पीछे कांग्रेस को जिम्मेदार मानते हुए कहते हैं कि कई ताकतें हैं जो नहीं चाहतीं कि दुबारा मोदी जी की सरकार बने. कांग्रेस उन ताकतों का टूल है. ऐसी घटनाएं लोकसभा विधानसभा चुनावों के वक्त दिखेंगी, पहली भी दिखी हैं.

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हालांकि सूत्रों के मुताबिक अंदरखाने पार्टी में फिक्र है जिसे देखते हुए, राज्य में ब्राह्मण कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा है. डैमेज कंट्रोल के लिए मंत्री, विधायक और पदाधिकारियों से रणनीति बनाने को कहा गया है. तीन से चार लोकसभा क्षेत्रों के क्लस्टर बनाकर तैयारी की जाएगी. इसकी मॉनिटरिंग के लिए अलग से समितियां बनाई जाएंगी. चुनाव तक हर 10 दिन में हितग्राही सम्मेलन आयोजित होंगे.

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इस मुद्दे पर कांग्रेस साफ तौर पर पहले कुछ बोलने से बची, लेकिन सतना में सवर्णों के साथ उसके जिला कार्यकारी अध्यक्ष राजभर सिंह नज़र आए तो पार्टी प्रवक्ता भूपेन्द्र गुप्ता अब कह रहे हैं कि हम उनकी समस्या जानते हैं, दूरी कैसे बना सकते हैं. बीजेपी की तुलना करते हुए उन्होंने कहा 'हकीम साहब ने पैंट खोल लिया अब सिलते नहीं बन रहा है, अब संभल नहीं रहा ... किसी ने बीजेपी को थोड़ी कहा था माई के लाल की तरह ललकारें. ललकारेंगे तो निश्चित रूप से चुनौती मिलेगी, वही हो रहा है.'

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बहरहाल दोनों पार्टियों के मंथन के बीच, सपाक्स और करणी सेना जैसे संगठन अपने विरोध में मुख्यमंत्री तक को सीधे घेर रही हैं. हालात ऐसे हैं कि कांग्रेस-बीजेपी दोनों दलों के कई नेताओं के घोषित दौरे तक कम हो गए हैं. सपाक्स ने चुनाव लड़ने का ऐलान भी कर दिया है जिससे मध्यप्रदेश में सत्ता का गणित मुश्किल होता जा रहा है.


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