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मध्यप्रदेश के आदिवासी ग्रामीण काम की तलाश में पलायन करने को मजबूर

रोजगार के लिए राजस्थान, गुजरात सहित महाराष्ट्र का रुख कर रहे आदिवासी बहुल अलीराजपुर, झाबुआ आदि जिलों के ग्रामीण

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मध्यप्रदेश के आदिवासी ग्रामीण काम की तलाश में पलायन करने को मजबूर

झाबुआ जिले के आदिवासी रोजगार न मिलने से पलायन कर रहे हैं.

भोपाल:

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के तहत पश्चिमी मध्यप्रदेश के कई जिलों में हालात ठीक नहीं हैं. आदिवासी बहुल अलीराजपुर, झाबुआ जैसे जिलों में आदिवासी ग्रामीण मजदूरों का आरोप है कि न तो समय पर काम मिलता है और न ही मजदूरी. यही वजह है कि जिले के आदिवासी ग्रामीण काम की तलाश में पड़ोसी गुजरात में पलायन करने को मजबूर हैं.  

चुनाव हो गए, नई सरकार बन गई, लेकिन आदिवासी बहुल झाबुआ, अलीराजपुर के हालात जस के तस हैं. बस में लटके लोग, काम की तलाश में बस स्टैंड पर इंतज़ार, पड़ोसी राज्य गुजरात का सफर...ग्रामीण परिवार सहित मजदूरी के लिए राजस्थान, गुजरात सहित महाराष्ट्र की ओर रुख करते हैं. बस स्टैंड पर सुबह से ही पलायन करने वाले ग्रामीणों का तांता लगाना शुरू हो जाता है. गुजरात और राजस्थान की बसों में तो पैर रखने तक की जगह नहीं मिल पाती है. इस इलाके के ग्रामीण बड़ौदा, अहमदाबाद, राजकोट, सूरत, मोरवी सहित महाराष्ट्र और राजस्थान के बड़े शहरों में मजदूरी की तलाश में जाते हैं.
     
कुछ मजदूरों ने बताया कि मनरेगा में काम बंद पड़े हैं, कुछ सरपंच बताते हैं कि दो साल से सामग्री का भुगतान नहीं हुआ है. मजदूरी का भुगतान भी कई-कई महीनों बाद हो रहा है. भंवरपिपलिया गांव के मुकेश हों, या कल्याणपुरा के लालसिंह कटारा पंचायत से काम नहीं मिलता, काम मिला तो मज़दूरी मिलने का लंबा इंतज़ार. मुकेश परमार ने कहा हम गुजरात मजदूरी के लिए जा रहे हैं, मनरेगा में काम नहीं मिलता ..पंचायत और सरपंच के पास जाते हैं तो काम नहीं रहता कई दिन यहां पैसे भी कम मिलते हैं. गुजरात में ज्यादा मिलते हैं, इसलिए हम परिवार सहित गुजरात चले जाते हैं, यहां मजदूरी नहीं मिलती ना... वोट देने आए थे अब जा रहे हैं. वहीं लालसिंह कटारा ने कहा हम वोट डालने परिवार के साथ गांव आए थे, यहां पर मनरेगा में कोई काम नहीं मिलता सरपंच से बात की थी उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया इसके लिए बाहर पलायन पर जाना पड़ता है, वहां गुजरात में पैसे भी अच्छे हैं.
     
हालांकि प्रशासन का दावा है कि ज़िले में पर्याप्त काम है, समय पर मजदूरी भी दी जा रही है. ज़िला पंचायत सीईओ जमुना भिड़े ने कहा वर्तमान में लगभग 15400 काम चल रहे हैं उसमें हमारे 46 लाख मजदूरी दी है, मटेरियल पर मजदूरी मिलाकर 122 करोड़ का भुगतान किया है.
     
झाबुआ की जनसंख्या 10,25,048 है, जिसमें 4 लाख से अधिक लोग सालभर में पलायन करते हैं. मध्यप्रदेश में 91.07 मनरेगा श्रमिकों में 34 फीसद अनुसूचित जनजाति से हैं. क्षेत्र में आदिवासियों का पलायन, पानी की समस्या बड़ा मुद्दा है. बाघ प्रिंट का बड़ा सेंटर हैं, लेकिन कारीगरों की कमाई बहुत ज्यादा नहीं. क्षेत्र के अलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में डोलोमाइट के पत्थर बड़ी मात्रा में हैं. पत्थरों को पीसने के कारखाने भी मौजूद हैं, हालांकि इस खदानों से इलाके के लोगों को रोज़गार कम फ्लोरोसिस और सिलिकोसिस जैसी बीमारियां ज्यादा मिलीं.
    
मध्यप्रदेश में कुछ दिनों पहले मनरेगा में मजदूरों 174 रुपये से बढ़ाकर 176 की गई, फिर भी राज्य इस मामले में देश के सबसे कंजूस राज्यों में शुमार रहा, ग्रामीण विकास मंत्री कमलेश्वर पटेल ने कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खत भी लिखा था कि इसे कम से कम कृषि मजदूरी की दर यानी 231 रुपये किया जाए. पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास मंत्री कमलेश्वर पटेल ने कहा हम समझते हैं कि मप्र के मजदूरों के साथ बड़ा अन्याय है कि मजदूरी निर्धारित करते वक्त सिर्फ दो रुपये बढ़ाने का काम किया था जबकि दूसरे राज्यों में 250 से लेकर 270 रु तक मजदूरी है , प्रदेश के मजदूरों को इसका लाभ मिलना चाहिए. इस ओर नई सरकार को ध्यान देना चाहिए. बहुत सारी विसंगतियां रोजगार गारंटी में रहीं पिछली सरकार के वक्त ढंग से क्रियान्वन नहीं हुआ जिसकी वजह से हमारे गरीब मजदूरी रोजगार के तलाश में पलायन करते थे, जबकि यूपीए ने जब योजना लागू की थी बहुत सोच समझकर की थी एक तरफ गांव का विकास होगा दूसरी ओर पलायन रुकेगा ... हम समीक्षा कर रहे हैं.
    
मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार केन्द्र पर निशाना साध रही है, लेकिन एक हकीकत ये भी है कि आठ महीने से सरकार ने ग्राम पंचायतों को सामग्री का भुगतान नहीं किया. जिसकी वजह से वर्तमान में 9 जिलों की पंचायतों में 90 फीसदी काम बंद हो गए. सरकार कहती है पिछले वित्तीय वर्ष में नरेगा के तहत मजदूरी और सामग्री का अनुपात पंचायतों ने मेंटेन नहीं किया. सरकार भी मानती है कि मनरेगा में जमकर भ्रष्टाचार हुआ है. कमलेश्वर पटेल ने कहा थोड़ी विसंगतियां हो जाती हैं वक्त से पैसा नहीं आता जिसकी वजह से मजदूरी भुगतान भी 3-4 महीने लंबित था फिर काफी प्रयास से मजदूरी भुगतान तो हो गया लेकिन मटेरियल का भुगतान लंबित है. हम लोग प्रयासरत हैं, केन्द्र से जैसे ही राशि मिलेगी मेटेरियल और मजदूरी का जो पैसा बचा है उसका भुगतान भी हो जाएगा. इसमें पहले भ्रष्टाचार भी हुआ, दुरुपयोग भी हुआ ... प्रशासनिक कमजोरी से ऐसी स्थितियां बनी हैं.

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15 साल सत्ता में रही बीजेपी ने मजदूरों का पैसा तो नहीं बढ़ाया, 6 महीने पहले उसे 174 रुपये ठीक लगे अब कह रही है राज्य सरकार मजदूरी बढ़ा दे. बीजेपी प्रवक्ता धैर्यवर्धन शर्मा ने कहा गरीब श्रमिकों के नाम पर मनरेगा से जो पैसा आता था कांग्रेस के राज में खूब बंदरबांट हुई. बीजेपी की सरकार बनने के बाद सीधे खाते में पैसा जाने लगा. अनेक सुधारों का प्रयास केन्द्र कर रही है लेकिन प्रदेश सरकार को लगता है राशि कम है तो जनहित में उसका प्रावधान करना चाहिए. उसमें जितना आवश्यक था राशि का प्रावधान किया गया था. राज्य का निर्णय कांग्रेस को करना होगा. हम मांग करते हैं पड़ोसी राज्यों की तरह भुगतान हो.
     
कांग्रेस-बीजेपी आरोप लगाते रहे वहीं कुछ सरपंचों ने बताया मनरेगा में सामग्री का भुगतान लंबे वक्त से नहीं होने की वजह से उन्होंने कर्ज लेकर काम करा लिया और बाजार के कर्जदार हो गए.



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