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मध्यप्रदेश में VYAPAM की तरह एक और बड़ा घोटाला, केंद्र की टीम न आने से अटकी जांच

ई-टेंडरिंग घोटाला : टेंडर की प्रक्रिया ऑनलाइन, लेकिन बोली लगाने वाली कंपनियों को पहले ही सबसे कम बोली का पता चल जाता था

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मध्यप्रदेश में VYAPAM की तरह एक और बड़ा घोटाला,  केंद्र की टीम न आने से अटकी जांच

मध्यप्रदेश का भोपाल में स्थित राज्य आईटी सेंटर.

खास बातें

  1. ई-टेंडरिंग घोटाले का मामला सामने आए तीन माह बीत गए
  2. जांच कर रही आर्थिक अपराध शाखा के हाथ खाली
  3. केंद्र की इंडियन कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम नहीं आई भोपाल
भोपाल: मध्यप्रदेश में व्यापम के बाद एक और बड़े घोटाले का आरोप सरकार पर लगा है, यह है ई-टेंडरिंग घोटाला. लगभग तीन महीने पहले यह मामला खुला लेकिन इसकी जांच में जुटी आर्थिक अपराध शाखा के हाथ खाली हैं क्योंकि तीन खत भेजने के बावजूद ईओडब्लू को केंद्र सरकार के इंडियन कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम के भोपाल आने का इंतज़ार है.
         
घोटाला मोटे तौर पर ऐसे समझा जा सकता है कि कहने को तो टेंडर कि यह प्रक्रिया ऑनलाइन थी लेकिन इसमें बोली लगाने वाली कंपनियों को पहले ही सबसे कम बोली का पता चल जाता था. फौरी तौर पर ई-टेंडर प्रक्रिया में 3000 करोड़ के घोटाले की बात सामने आ रही है, लेकिन चूंकि यह प्रक्रिया 2014 से ही लागू है जिसके तहत तकरीबन तीन लाख करोड़ रुपये के टेंडर दिए जा चुके हैं.
    
23 जून को राजगढ़ के बांध से हज़ार गांवों में पेयजल सप्लाई करने की योजना का शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया, लेकिन उससे पहले यह बात पकड़ में आई कि ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल में छेड़छाड़ करके लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी यानी पीएचई विभाग के 3000 करोड़ रुपये के तीन टेंडरों के रेट बदले गए हैं. मामला सामने आते ही, मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के उस वक्त के एमडी मनीष रस्तोगी ने पीएचई के प्रमुख सचिव प्रमोद अग्रवाल को खत लिखा और तीनों टेंडर कैंसिल कर दिए गए.

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इस खुलासे के बाद 2014 से अब तक करीब तीन लाख करोड़ रुपये के ई-टेंडर संदेह के दायरे में आ गए हैं. आर्थिक अपराध शाखा ने मुख्य सचिव से मिले खत के बाद मामले की जांच शुरू कर दी है. सूत्रों की मानें तो इस मामले में कई आला अधिकारियों, ठेकदारों और पोर्टल चलाने वाली दो बड़ी कंपनियों पर भी जांच की आंच है.
 
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पहले समझते हैं मामला क्या है. पीएचई ने जलप्रदाय योजना के तीन टेंडर 26 दिसंबर को जारी किए थे. इनमें सतना के 138 करोड़ और राजगढ़ जिले के 656 और 282 करोड़ के टेंडर थे. दो मार्च को टेंडर टेस्ट के दौरान जलनिगम के टेंडर खोलने के लिए अधिकृत अधिकारी पीके गुरू के इनक्रिप्शन सर्टिफिकेट से डेमो टेंडर भरा गया. 25 मार्च को जब टेंडर लाइव हुआ तब इस इनक्रिप्शन सर्टिफिकेट के ज़रिए कथित तौर पर फर्ज़ीवाड़े को अंजाम दिया गया.

बोली लगाने वाली एक निजी कंपनी इन दो टेंडरों में दूसरे नंबर पर रही. उसने इस मामले में शिकायत की. शिकायत पर प्रमुख सचिव ने विभाग की लॉगिन से ई-टेंडर साइट को ओपन किया तो उसमें एक जगह लाल क्रॉस दिखाई दिया. विभाग के अधिकारियों ने पहले जवाब दिया कि यह लाल क्रॉस टेंडर साइट पर हमेशा आता है.

सूत्रों के मुताबिक विभाग के अधिकारियों का इस जवाब के बाद जांच बिठाई गई जिसमें में सामने आया कि ई-प्रोक्योरमेंट में कोई छेड़छाड़ करता है तो लाल क्रास का निशान आ जाता है. जांच में ई-टेंडर में टेम्परिंग कर रेट बदलने का तथ्य भी उजागर हुआ. बताते हैं कि इसके लिए एक नहीं कई डेमो आईडी का इस्तेमाल हुआ.

टेंडर नंबर 91 - सतना के बाण सागर नदी से 166 एमएलडी पानी 1019 गांवों में पहुंचाने के लिए 26 दिसंबर 2017 को ई-टेंडर जारी किया गया था. इस योजना में पांच बड़ी नामी कंपनियों ने टेंडर भरे.

टेंडर नंबर 93 - राजगढ़ जिले की काली सिंध नदी से 68 एमएलडी पानी 535 गांवों को सप्लाई करने का टेंडर 26 दिसंबर 2017 को जारी किया गया था. चार नामी कंपनियों ने टेंडर भरे.

टेंडर नंबर 94 - राजगढ़ जिले के नेवज नदी पर बने बांध से 26 एमएलडी पानी 400 गांवों को सप्लाई करने के लिए  26 दिसंबर 2017 को ई-टेंडर जारी किया गया था. इसमें सात कंपनियों ने हिस्सा लिया.

राज्य सरकार ने अलग-अलग विभागों के ठेकों में भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए 2014 में ई-टेंडर की व्यवस्था लागू की थी, जिसके लिए बेंगलुरु की निजी कंपनी से ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल बनवाया गया. तब से मध्यप्रदेश में हर विभाग इसके माध्यम से ई-टेंडर करता है.

कांग्रेस ने इस मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय को खत लिखकर भ्रष्ट्राचार रोकने की पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल उठाए. दो जुलाई को नेता प्रतिपक्ष की जांच की मांग पर पार्टी की आईटी सेल से जुड़े अजय दुबे ने 25 अगस्त को प्रधानमंत्री कार्यालय से सूचना के अधिकार के तहत इस मामले में कार्रवाई की जानकारी मांगी लेकिन उनसे कहा गया कि किसी तीसरे पक्ष को जानकारी नहीं दी जा सकती. वहीं सरकार का कहना है कि जांच चल रही है, किसी को बख्शा नहीं जाएगा.
          
मध्यप्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव ने कहा कि अपने चहेतों को ओबलाइज करने के लिए बड़ी हेराफेरी हुई. हम लगातार दिल्ली में प्रधानमंत्री को इसके बारे में कह रहे हैं, लेकिन कहते हैं जब पूरे तालाब में भांग घुली हो तो कौन जांच करेगा. इसमें बड़ा गठजोड़ है, जिसमें कई बड़े अधिकारी और मंत्री शामिल हैं. लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के राज्यमंत्री जालम सिंह पटेल ने कहा कि टेंडर की अलग एजेंसी है. सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं. एक महीने पहले मामला निकला था, निष्पक्ष जांच हो रही है.

इन तीन परियोजनाओं के लिए ठेके की रकम 2,322 करोड़ रुपये थी. सूत्रों के मुताबिक इसकी शुरुआत पीडब्लूडी के तीन टेंडरों से हुई लेकिन फिर पीडब्लूडी, जल संसाधन विभाग, एमपी सड़क विकास निगम के 9 और ई-टेंडर जांच के घेरे में आए. मध्यप्रदेश के चीफ सेक्रेटरी बीपी सिंह के आदेश के बाद सभी नौ टेंडर जांच के लिए इकोनॉमिक अफेंस विंग को सौंप दिए गए.

ईओडब्लू के एडीजी मधु कुमार ने कैमरे के सामने बात करने से इनकार कर दिया, लेकिन फोन पर सिर्फ इतना कहा कि 'केस जांच के गंभीर चरण में है. तकनीकी मामला होने की वजह से पहले हम इसे प्रारंभिक जांच के तौर पर ले रहे हैं. अभी एफआईआर दर्ज नहीं की है, लेकिन आगे और तथ्य आने पर जांच का दायरा बढ़ाया जाएगा.

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मामला सामने आने के बाद एमपीएसईडीसी के तत्कालीन एमडी मनीष रस्तोगी ने ई-टेंडरिंग से जुड़ी दो बड़ी निजी कंपनियों को भी 6 जून को नोटिस भेजा, लेकिन जून में ही उनका तबादला हो गया. उनका ही क्या, मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॅानिक डेवलपमेंट कॉरपोरेशन में पिछले डेढ़ साल में 6 एमडी बदले गए.

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फिलहाल ईओडब्लू ने भारत सरकार को इंडियन कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम को तीन खत भेजे हैं, लेकिन कम्प्यूटर की मिरर इमेज लेने वहां से कोई आया नहीं है. इंतज़ार फॉरेंसिक रिपोर्ट का भी है. बगैर सीईआरटी और फॉरेंसिक रिपोर्ट के ईओडब्लू के पैर जम गए हैं. मामला रसूखदार लोगों से जुड़ा है, इसलिए प्रारंभिक जांच को एफआईआर में बदलने में पुख्ता सबूतों की जरूरत है. अब यह वक्त चुनाव के पहले आएगा, या बाद में, ये बड़ा सवाल है.


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