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मध्यप्रदेश में 15 साल में 35 हजार करोड़ खर्च, पानी मिला सिर्फ छह फीसदी ग्रामीणों को!

राज्य के साढ़े तीन सौ से ज्यादा नगरीय निकाय क्षेत्रों में कहीं तीन दिन तो कहीं दो दिन छोड़कर पानी दिया जा रहा

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खास बातें

  1. मध्यप्रदेश के शहरों और गांवों में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची
  2. छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक पानी तलाशते और ढोते हुए गुजार रहे दिन
  3. लोग गंदा पानी छानकर इस्तेमाल करने को मजबूर
भोपाल:

मध्यप्रदेश इन दिनों भीषण जल संकट की चपेट में है. शहर और गांवों में पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची है. राज्य के साढ़े तीन सौ से ज्यादा नगरीय निकाय सुबह शाम पानी नहीं दे पा रहे. कुछ जगहों पर तीन तो कहीं दो दिन छोड़कर पानी दिया जा रहा है. यही हाल गांवों में है, जहां पानी लाने के लिए कुछ जगहों पर प्रदेश की सीमा पार करनी पड़ती है. तो कहीं सूखे कुंए में उतरकर पानी लाना पड़ता है. जानते हैं क्यों...क्योंकि सरकारी तिजोरी से पिछले 15 सालों में लगभग 35,000 करोड़ रुपये खर्च हुए लेकिन पानी मिला सिर्फ छह फीसदी ग्रामीण आबादी को ही.

सिर्फ 5 साल के आंकड़े जान लीजिए-
साल 2014-15 में 1901 करोड़ रुपये
साल 2015-16 में 3600 करोड़ रुपये
साल 2016-17 में 2721 करोड़ रुपये
साल 2017-18 में 1790 करोड़ रुपये
और 2018-19 में 2191 करोड़ रुपये

नल से पानी भेजने के लिए इतने पैसे खर्च हुए, बावजूद इसके आगर मालवा जिला मुख्यालय से महज 9 किलोमीटर की दूरी पर पालड़ा गांव में 6 साल का देवराज खेल के मैदान के बजाए घंटे भर संघर्ष करता है ताकि एक बाल्टी पानी भर ले जल्दी से घर पहुंचे, बर्तन खाली करे, फिर से नलके पर उसी संघर्ष के लिए चल दे ... यह कहानी रोज की है. इसी गांव में 70 साल की धापू बाई के चेहरे पर पसीने की लकीरें उम्र को छिपा रही हैं, मगर दो घंटे की कसरत के बाद जो खुशी है वो नहीं छिप रही. घर पर आराम करने की उम्र है, लेकिन इस तरह पानी के लिए जद्दोजहद ज़िंदगी का हिस्सा है.
    
पानी की इस लड़ाई में उम्र का कोई बंधन नहीं, बच्चे, बूढ़े और जवान, सबकी बराबर भागीदारी है. ढाई हजार आबादी वाले पालड़ा गांव में करीब दर्जन भर हैंडपम्प और ट्यूबवेल हैं जो कि  गर्मी शुरू होते ही सब दम तोड़ देते हैं. तीन साल पहले डेढ़ करोड़ रुपये से नल जल योजना का काम शुरू हुआ, लेकिन घरों में पानी आज तक नहीं पहुंचा.


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कटनी जिले में सांसद आदर्श ग्राम था देवरी, पानी के लिए सांसद जी ने दो टंकियां लगवाईं. फिर भी प्यास बुझाने लोग 3-4 किलोमीटर पैदल जाते हैं. यही हाल ज़िले के बरही तहसील में भी है, जहां हैंडपंप हैं वहां गंदा पानी आता है,पाइप लाइन बिछाई गई है लेकिन अब तक चालू नहीं हुई है. नदियों में स्टॉप डैम बना है लेकिन पानी नहीं है, जहां पानी है वो अतिक्रमण की चपेट में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. देवास ज़िले में टैंकर पहुंचते ही, माहौल एक अजीबो-गरीब मशीन में तब्दील हो जाता है... पाइप और बाल्टी पहचानने में मुश्किल, लेकिन लोगों की यही नियति है हर गर्मी के मौसम में.
    
बुंदेलखंड पानी की कमी से जूझने के लिए अभिशप्त है.बुंदेलखंड पैकेज के अंतर्गत बनाई जाने वाली नल जल योजना छतरपुर जिले में एक भी चालू हालत में नहीं है, सारी बंद हैं. बड़वानी का नागलवाड़ी, दुर्गम इलाका है लोग पथरीले रास्तों से पीने का पानी भरते हैं, एक-एक गड्ढे से छानकर ... लेकिन गंदा. क्या करें, सरकार 1000 करोड़ की सिंचाई परियोजना बनाने की बात कह रही है.
    
डिंडोरी जिले में इन दिनों जल संकट भीषण रूप ले चुका है. लोग बूंद बूंद पानी के लिए जद्दोजहद करते नजर आ रहे हैं. लगभग सभी जल स्रोत सूखने की कगार पर हैं. गांव में हैंडपंप हवा उगल रहे हैं. जहां पानी है, वहां विवाद भी हो रहा है. पिछले दिनों पानी की समस्या से जूझ रहे कुदवारी गांव के लोगों ने तो घंटों डिंडोरी-शहडोल मार्ग को जाम कर दिया था. कुछ इसी तरह की समस्या से देवलपुर के ग्रामीण भी जूझ रहे हैं. ग्राम में नलजल योजना होने के बाद भी लोगों को पेयजल उपलब्ध नहीं हो रहा है. सारसताल में अधेड़ उम्र के मंगलू पानी की तलाश में निकले, सूखे कुंए में गिरने से उनकी मौत हो गई. गांव के डालचंद नामदेव कहते हैं उसने झांका होगा, बैलेंस नहीं होने की वजह से कुंए में गिर गया.  वहीं अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शिवकुमार सिंह ने कहा जल संकट तो है, पर हम लोग मर्ग को गंभीरता से देख रहे हैं ये घटना हुई कैसे. शहपुरा तहसील में लोग कुंए पर कपड़ा ढंककर पानी की सुरक्षा कर रहे हैं.

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कहने को तो भिंड जिला चंबल, क्वारी और सिंध इन तीन नदियों से घिरा है...भिंड की गोहद विधानसभा में दो डैम भी हैं बावजूद इसके गोहद के कई गांव आज खारे पानी की समस्या से जूझ रहे हैं. यहां तक कि लोगों को पीने के पानी के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ती है और जिम्मेदार हैं कि योजनाओं को सिर्फ कागज पर चलाए जा रहे हैं. बरथरा गांव के लोग पानी भरने 3 किलोमीटर दूर सिसोनिया जाते हैं. गांव वाले कहते हैं, हालात ऐसे हैं कि लोग यहां रिश्ता तक नहीं जोड़ना चाहते. जिला पंचायत सीईओ का कहना है जल्द से जल्द लोगों की समस्या दूर करने की कोशिश की जाएगी.
     
नरसिंहपुर जिले में नर्मदा का जल घर-घर पहुंचाने के लिए सरकार की जलावर्धन योजना के तहत बन रही पानी की टंकियों में भ्रष्टाचार की दीमक लग गई. पानी सप्लाई से पहले ही टंकियों में दरार आ गई, वो झुकने लगीं. 30 करोड़ की लागत से चिनकी घाट से नर्मदा से पाइप लाइन से पानी लाना है... दो साल पहले योजना को पूरा होना था अधूरी है... करेली, गाडरवारा हर जगह योजना देरी से चल रही है. पूरे जिले में नर्मदा में खनन से नदी संकट में है. करोड़ों की योजनाओं के जरिए और पानी खींचने से नदी का अस्तित्व खतरे में हैं. सिंगरौली जिले के देवसर की सूरत 70 सालों से नहीं बदली है. लोग गंदे नाले का पानी पीने को मजबूर हैं, लंबी दूरी तय कर चिलचिलाती धूप में पानी भरने जाते हैं.

राज्य के लगभग हर संभाग की कहानी आपने सुन लीं, अब बताते हैं ये हालात क्यों हैं. भारत सरकार के आंकड़े कहते हैं कि मध्यप्रदेश में महज 12 फीसदी ग्रामीण आबादी को ही पेयजल उपलब्ध हो पाया है. इसमें से छह फीसदी योजनाएं 2003 की हैं. जबकि इस दौरान औसतन ढाई हजार करोड़ रुपये सालाना पानी की योजनाओं पर खर्च किए गए. घोटाले सिर्फ योजनाओं में नहीं, पानी के परिवहन के नाम पर भी हुआ. दस्तावेजों की पड़ताल में पता लगा कि पिछले दो सालों में 100 से ज्यादा निकायों में टैंकरों से पानी की सप्लाई की गई, लेकिन इस बार गंभीर जल संकट के बावजूद 32 निकायों में पानी के परिवहन की जरूरत हुई, ऑडिट में पता लगा कि दो सालों में ऐसे कई निकायों में टैंकरों से आपूर्ति की गई, जहां पेयजल उपलब्धता थी.

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शिवराज सिंह ने 2012 में जल निगम बनाया जिसने 6 सालों में सिर्फ 700 गांवों तक पानी पहुंचाया. सरकार अब पता कर रही है कि कौन सा जल स्त्रोत कब बना, कितना खर्च रहा. ऐसे मामलों की जांच की जाएगी जहां भारी खर्च के बावजूद स्थिति खराब है. पीएचई मंत्री सुखदेव पांसे ने कहा बीजेपी ने केवल भाषण दिया 15 साल में ... धरातल पर शून्य हैं, आज हालात ग्रामीण अंचल में 15 साल में जो काम हुआ वो भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गया ... 2003 में जब छोड़ा था कांग्रेस ने 6 परसेंट घरों में नलजल योजना के जरिए पानी सप्लाई थी 15 साल बीत गए केवल 12 परसेंट पर लाए जबकि करोड़ों रुपये हर साल खर्चे. बुंदेलखंड पैकेज में करोड़ों रुपये आए इनकी हम जांच करवाएंगे, जांच के बाद सख्त से सख्त कार्रवाई करेंगे.
    
हालात ये हैं कि राज्य के 197 निकायों में ही पेयजल योजनाएं पूरी हुईं, 181 निकायों में पेयजल योजना अधूरी हैं. गांवों में 15787 नल-जल योजनाएं हैं, जिसमें 1450 नल-जल योजनाएं पूर्णत: बंद हैं, 600 योजनाएं भू-जलस्तर गिरने से बंद हो चुकी हैं.
     
अब ये आश्चर्य नहीं कि राज्य में हज़ारों करोड़ के ई टेंडरिंग घोटाले के तार भी पेयजल सप्लाई से ही निकले. 23 जून को राजगढ़ के बांध से हज़ार गांवों में पेयजल सप्लाई करने की योजना का शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया लेकिन उससे पहले ये बात पकड़ में आई कि ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल में छेड़छाड़ कर लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी यानी पीएचई विभाग के 3000 करोड़ रुपये के तीन टेंडरों के रेट बदले गए हैं. हालांकि उस वक्त जल संसाधन का जिम्मा संभालने वाले शिवराज के सिपहसालार मंत्री कह रहे हैं वे किसी जांच से नहीं डरते, बीजेपी विधायक नरोत्तम मिश्रा ने कहा पीने का पानी, उसी वाटर बॉडी से हमने योजना बनाई थी हर गांव में नल की टोंटी से पानी जाएगा पूरे प्रदेश में योजना लागू की. हम किसे ऑडिट से नहीं डरते हम किसी चीज से नहीं डरते हर चीज के लिये सामने खड़े हैं, आपके द्वारा भी वैसे भी.

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प्रदेश के लोगों को पानी उपलब्ध करवाने के मामले में मध्यप्रदेश देश में 17वें नंबर पर है, राज्य सरकार अब 'पानी का अधिकार' कानून लागू करने की बात कह रही है, जिसके तहत पूरे साल एक परिवार को जरूरत के मुताबिक पानी की उपलब्धता रहेगी.



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