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फर्जी ई वे बिल का खेल, जीएसटी में भी सेंध, करोड़ों का कारोबार कर बनाई फर्जी कंपनियां

मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इंदौर ने जब जीएसटी अधिकरियों ने कई फर्जी ई वे बिल पकड़े तो अबतक घोटाले से परे माने जाने वाले सिस्टम में सेंध की बात बाहर आई.

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भोपाल:

एक राष्ट्र एक कर का नारा देकर लागू किये गए गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) में भी सेंध लग चुकी है. मध्यप्रदेश के इंदौर में एक के बाद एक फर्जी ई वे बिल सामने आने लगे और इन बिलों की पड़ताल पर पता चला कि कई फर्जी कम्पनियां बनाकर आरोपियों ने करोड़ों की टैक्स चोरी की. वाणिज्यिक कर विभाग और सेंट्रल एक्साइज जीएसटी विभाग की संयुक्त कार्रवाई में अनुमान है कि आरोपी अबतक 1200 करोड़ तक का नकली ट्रांजेक्शन कर चुके हैं, जबकि 100 करोड़ से ज्यादा का इनपुट टैक्स क्रेडिट लिया गया है. इस घोटाले के तार इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और छतरपुर से लेकर महाराष्ट्र के ठाणे, गुजरात के भावनगर तक से जुड़े हैं.

मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इंदौर ने जब जीएसटी अधिकरियों ने कई फर्जी ई वे बिल पकड़े तो अबतक घोटाले से परे माने जाने वाले सिस्टम में सेंध की बात बाहर आई. आयुक्त सेन्ट्रल जीएसटी नीरव कुमार मल्लिक ने बताया, 'जब हमने कुछ ईवे बिल पकड़े, रिकॉर्ड्स चेक किये तो बहुत सारी फर्म ऐसी थीं जिसमें एक ही मोबाइल नंबर, एक ही ईमेल था. पहली दफा देखने से ही लगा एक ही नंबर से इतनी सारी फर्मों का संचालन हो रहा है. इन फर्मों के तार 2-3 राज्यों में फैले हैं. भावनगर में, मुंबई में, जबलपुर में तो राज्य सरकार और केन्द्र ने साथ मिलकर कार्रवाई की. शुरू में 400 फर्मों के ऑपरेशन संदिग्ध लगे लेकिन इतने फर्मों पर एक साथ कार्रवाई नहीं कर सकते थे, इसलिये पहले हमने 24 फर्म चुने. जांच के दौरान पता चला कि सभी फर्मों के मालिक भी ठगी का शिकार हुए हैं जिनके दस्तावेज़ लेकर फर्जी कंपनी बना ली गई.'

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सूत्रों के मुताबिक कुछ लोगों से उनके पैन कार्ड और दूसरे दस्तावेजों की कॉपी के आधार पर जीएसटी नंबर ले लिया गया और फर्जी कंपनियां रजिस्टर्ड करा ली गईं. इनके पते, नाम से फर्जी दस्तावेज से अपलोड कराए गए. इसके बाद इन कंपनियों ने कागजी कारोबार दिखाया. नये नियमों में अंतिम कड़ी के रूप में कारोबार करने वाले को टैक्स नहीं चुकाना पड़ता और वो इन कंपनियों के ज़रिये से बताता है कि इनका टैक्स पहले चुकाया जा चुका है, इसलिए टैक्स का भार नहीं आता. इस तरह से फर्जी कंपनियों के आधार पर सरकार से भरे गए टैक्स को क्लेम भी कर लिया जाता है.


सूत्रों के अनुसार ये पूरा घोटाला स्टील स्क्रैप और लोहे के कारोबार से जुड़ा हुआ है. सेन्ट्रल जीएसटी आयुक्त नीरव कुमार मल्लिक ने कहा, 'तरीका सीधा था, कागज में ट्रांजैक्शन बताये जा रहे थे, उस कागज का इस्तेमाल जीएसटी में क्रेडिट लेने के लिये होता है जिससे आगे के कर का भुगतान होता है. तो जब शुरू का क्रेडिट नकली होगा तो एक फ्रॉड हुआ, सरकार से उसको वापस कराया जा रहा है.'

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शुरूआती अनुमान 1000-1200 करोड़ का नकली ट्रांजैक्शन बताया जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक इस जांच की आंच कई कंपनियों तक भी जाएगी और घोटाले की राशि का आंकड़ा भी बढ़ सकता है. एजेंसी अब मामले के मास्टरमाइंड तक पहुंचने की जुगत में है जिसने ये नकली फर्में खुलवा कर टैक्स चोरी का जाल बुना.

(इंदौर से समीर खान के इनपुट के साथ)


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