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बीज विधेयक 2019 किसानों के खिलाफ और बीज बेचने वाली बड़ी कंपनियों के हित में!

मध्यप्रदेश में किसानों को लेकर बरती जा रही इस लापरवाही पर अब सरकार सख्त, खाद, बीज ओर कीटनाशक की शु़द्वता को लेकर अभियान

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भोपाल:

मध्यप्रदेश में इन दिनों खाद बीज और कीटनाशकों में मिलावट के खिलाफ अभियान छिड़ा हुआ है. खाद बीज के दुकानों पर सैंपलिंग हो रही है और ढेर सारे नमूने अमानक पाए जा रहे हैं. देर से जागी सरकार की ये कार्रवाई और सामने आ रहे परिणाम बता रहे हैं कि नकली और अमानक खाद बीज के कारण किसानों कितने सालों से छले जा रहे थे. पिछले कुछ सालों में किसानों की आत्महत्या की बड़ी वजह बीजों में अंकुरण नहीं होना और नकली कीटनाशकों का उपयोग बढ़ना भी सामने आया है. कुछ किसानों को लगता है कि प्रस्तावित बीज विधेयक 2019 जो बीज अधिनियम (1966) की जगह ले लेगा उससे हालात बदलेंगे. लेकिन इसका विरोध करने वालों का सबसे बड़ा आरोप है कि यह विधेयक सीमांत और छोटे किसानों के हितों के खिलाफ और बीज बेचने वाली बड़ी कंपनियों के हित में है.
          
सीहोर जिले के बिलकीसगंज गांव में रहते हैं मुंशीलाल मेवाड़ा. खेत में पोते-पोतियों की किताब है, लिखा है मदन ने जमाल को चावल चखाया. लेकिन साल भर पहले परिवार से खुशी और खेत से फसल गायब हो गई. भाई मांगीलाल ने 6 एकड़ चने की फसल पर जब कीटनाशक छिड़का तो पूरी फसल जल गयी. चार लाख रूपये के नुकसान का सदमा मांगीलाल झेल नहीं पाए, खटिया पकड़ी तो कुछ दिनों बाद दम तोड़ दिया. अब उनके भाई कीटनाशक कंपनी के खिलाफ मुकदमा लड़ रहे हैं. हम चने 8000 क्विटंल में लाए थे, 24000 के चने लाये बाकी पूरी अन्य लागत, खाद, सिंचाई, दवा का खर्चा करीब 1 लाख ... फसल सूखने लगी फिर दवा डलवाई, ईल्ली की दवाई से पूरी फसल चौपट हो गई, भैया को सदमा बैठ गया.  
         
छतरपुर जिले के हरपालपुर रेलवे प्लेटफार्म पर रखी खाद उस 2600 टन डीएपी खाद का हिस्सा है जो बड़े पैमाने पर अमानक पायी गयी लेकिन जबतक रिपोर्ट आती तब तक 2521 टन खाद किसानों में बांटा जा चुका था.
       
हरदा जिले के चारखेड़ा के सुशील बांके ने पिछले साल चने और गेहूं की फसल लगायी, मनियाखेडी सोसायटी से मिली खाद भी छिड़की इस उम्मीद में कि बंपर फसल होगी, लेकिन बंपर तो छोड़िये नुकसान अलग हुआ, पता लेकिन सिर्फ उन्हें नहीं 174 से ज्यादा किसानों को जिसके बाद पांच खाद कंपनियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई.

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मध्यप्रदेश में किसानों को लेकर बरती जा रही इस लापरवाही पर अब सरकार सख्त हुयी है. पूरे प्रदेश में खाद बीज ओर कीटनाशक की शु़द्वता को लेकर अभियान चल रहा है. पिछले महीने से लेकर 18 तारीख से अब तक 2910 उर्वरक विक्रेताओं की गोदामों पर छापा मारकर 2267 नमूने लिये और 250 मामलों में गड़बड़ी मिलने पर कार्रवाई की गई 3174 बीज विक्रेताओं की गोदामों का निरीक्षण कर 2557 सैंपल लिये और 146 मामलों में कार्रवाई की गई वहीं 1303 कीटनाशक विक्रेताओं से 541 नमूने लिये गये जिसमें 257 में अनियमितता की कार्रवाई की गई.
    
सरकार कह रही है इसमें कई कंपनियां बीजेपी के राज में फली फूलीं, यहां तक बीजेपी किसान मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और पूर्व विधायक के बेटे की फैक्टी पर भी मामला दर्ज किया गया है. कृषि मंत्री सचिन यादव ने कहा पिछले 15 साल में देखने में आए है कि बीजेपी नेताओं और उनके लोगों के संरक्षण में अमानक खाद बीज जो धंधा है वो फला फूला है हमारा किसान साथी कृषि के व्यवसाय को आगे नहीं बढ़ा पाए है, अमानक आदन के इस्तेमाल से वो वित्तीय संकट में फंस गये. पिछले दिनों मेघनगर में बड़ी कार्रवाई की लाइसेंस निरस्त किये, हरदा टिमरनी में भी बड़ी कार्रवाई की.
       
हालांकि मामला सिर्फ सियासी नहीं रसूख का भी है, झाबुआ के मेघनगर में खाद बनाने वाली पांच इकाइयों पर छापे पड़े और अनियमितता मिलने पर उनको सील कर दिया गया, लेकिन कार्रवाई होने के बाद भी रात में इन फैक्ट्रियों में चोरी छिपे काम चल रहा है. ऐसे में बीजेपी को लगता है मामला सियासी है, उनका ये भी कहना है कि अगर बीजेपी के लोगों ने चोरी की तो केन्द्र में कांग्रेस सरकार ने कृषि कर्मण पुरुस्कार क्यों दिये.
      
पूर्व सहकारिता मंत्री और नरेला से बीजेपी विधायक विश्वास सारंग ने कहा जब मनमोहन सिंह की सरकार थी उसी वक्त बीजेपी को कृषि कर्मण अवॉर्ड मिला लगातार 5-7 दफे, जिसका मतलब है हमने सही किया, उत्पादन बढ़ा तो नकली खाद बीज से कैसे बढ़ा. अगर गलत हुआ तो दोषी को अंदर करो ढिंढोरा क्यों पीट रहे हो. सिर्फ अपनी छवि बचाने के लिये बीजेपी पर आरोप लगा रहे हैं, ये वैसे ही है जैसे नाच ना आवे आंगन टेढ़ा.
     
दिक्कत सिर्फ अमानक खाद बीज की नहीं. यूरिया की भयानक किल्लत और कालाबाज़ारी भी है, सागर के गढ़ाकोटा में विपणनन संघ के कर्मचारी किसानों की भीड़ देखकर ऐसे घबराए कि थाने के अंदर बैठकर पर्ची काटी, तबजाकर किसान यूरिया ले पाए.
     
अमानक खाद-बीज का मामला मध्यप्रदेश नहीं पूरे देश में किसानों के लिये बड़ी परेशानी का सबब है, सरकार का मानना है कि बीज विधेयक 2019 इसका उपाय हो सकता है, जिसमें खराब गुणवत्ता के बीज बेचने वाली कंपनियों पर जुर्माने की राशि को बढ़ाकर अधिकतम 5 लाख रुपये करने का प्रस्ताव है जबकि अभी तक यह 500 रुपये (न्यूनतम) और 5,000 रुपये (अधिकतम) है.

देश में बिकने वाले सभी बीजों में से आधे से अधिक बीज किसी भी उचित परीक्षण संस्था से प्रमाणित नहीं होते, ऐसे में उनकी ख़राब गुणवत्ता किसानों के पैदावार को नुकसान पहुंचाती है. पारित होने पर ये करीब पांच दशक पुराने बीज अधिनियम, 1966 की जगह लेगा दावा ये है कि इससे देश में कृषि उत्पादकता में लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि होगी. ये अधिनियम बीजों के उत्पादन, वितरण और बिक्री को नियमित करने पर जोर देता है. इसके जरिए सरकार सभी बीजों के लिए एक समान प्रमाणन की व्यवस्था और बीजों की बारकोडिंग करने जैसे बदलावों को लागू करने की तैयारी में है.
       
लेकिन बिल का विरोध करने वाले इसे छोटे किसानों के लिये नुकसानदेह बड़ी कंपनियों के लिये फायदेमंद मानते हैं, क्योंकि पंजीयन को अनिवार्य करने से छोटे किसान बीज-व्यापार के बाजार में घुस नहीं पाएगा.जहां फिलहाल उसकी हिस्सेदारी 70 फीसद से ज्यादा है. फसल खराब होने पर मुआवज़े का ज़िक्र तो है लेकिन उसका निर्धारण समिति करेगी. ये भी कहा जा रहा है कि प्रस्तावित बिल खेती में शोध को कंपनियों और पेटेंटधारकों के एकाधिकार में तब्दील कर देगा.
       
मध्यप्रदेश किसान कांग्रेस के केदार सिरोही कहते हैं, इस बिल में कुछ प्रावधान अच्छे हैं, लेकिन कुछ पर सोचने की ज़रूरत है लेकिन लगता है बीजेपी के रणनीतिकार कंफ्यूज हैं. एक तरफ जीरो बजट खेती की बात दूसरी तरफ बीज लेना जरूरी होगा क्यों अगर मैं ब्रीडर उगाता हूं तो फाउंडेशन पर आउंगा, फाऊंडेशन से सी-1, सी-2 पर 87 परसेंट जोत छोटी है जहां एक किसान दूसरे से बीज खरीदता है, एक लाख की सज़ा 5 लाख का जुर्मान ठीक रहेगा, लेकिन प्रश्न ये है कि कौन सर्टिफाई करेगा जेनेटिकल प्योरिटी टेस्ट करने की जगह नहीं है.

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जानकार कहते हैं कि देश में 45 फीसदी बीज ही ऐसे हैं जो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से प्रमाणित होते हैं. लगभग 55 फीसदी बीज जिन्हें निजी कंपनियां बेचती है प्रमाणित नहीं होती, मध्यप्रदेश सरकार की कार्रवाई बताती है कि ये तादाद कहीं ज्यादा है, वो भी तब जब किसानों को बेहतर खाद और उन्नत बीज देने के लिये प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर बीज विकास निगम और विपणन संघ जैसी संस्थाएं बनी हैं, लेकिन कई बार सरकारी तंत्र भी बाजार से बीज लेकर उनपर अपनी सील लगाकर बेचने को मजबूर हैं.



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