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छत्तीसगढ़ में आदिवासी आंदोलन, समर्थन में नक्सलियों के अलावा बीजेपी और कांग्रेस भी

बस्तर की खदानों को निजी हाथों में देने के विरोध, 35 पंचायतों के हज़ारों आदिवासी किरन्दुल में डेरा जमाकर बैठ गए

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छत्तीसगढ़ में आदिवासी आंदोलन, समर्थन में नक्सलियों के अलावा बीजेपी और कांग्रेस भी

प्रतीकात्मक फोटो.

रायपुर:

छत्तीसगढ़ में बस्तर में खदानों को निजी हाथों में दिए जाने के विरोध में 35 पंचायतों के हज़ारों आदिवासी किरन्दुल में डेरा जमाकर बैठ गए हैं. इनके समर्थन में नक्सलियों ने पर्चे फेंके हैं. खास बात यह रही कि विरोध के मंच पर बीजेपी, कांग्रेस भी एक साथ दिखे.
      
दाल-चावल लेकर हजारों ग्रामीण दूर-दूर से एनएमडीसी का घेराव करने इस बार अनिश्चितकालीन आंदोलन पर पहुंचे हैं. इधर नक्सली समर्थन की बात से पुलिस सजग है, एक हजार से अधिक जवान तैनात किए गए हैं.
       
दरअसल पूरा मामला नंदीराज पर्वत का है. इसी पहाड़ पर 13 नम्बर खदान आती है. इसे आस्था का केंद्र बताकर संस्कृति से खिलवाड़ बताया जा रहा है. पहली बार किसी आंदोलन में सत्ता पक्ष, विपक्ष,सामाजिक कार्यकर्ता, नक्सली ,पंचायतों का समर्थन मिला है.
        
खदान में 350 मिलियन टन लोहा बताया जाता है. इसी खदान की खुदाई शुरू करने के लिए एक लाख से ऊपर पेड़ कटेंगे, तब काम शुरू होगा. लीज की प्रक्रिया पूरी भी हो गई है. लीज की जगह को आदिवासियों के लिए आस्था का केंद्र बताया जा रहा है. आदिवासियों का आरोप है उनकी ज़मीन पर खनन होता है लेकिन नौकरी किसी और को देकर उन्हें छला जाता है.
       

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इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी ने कहा ये सिर्फ निजीकरण का मामला नहीं है. हमारे यहां जितने भी पहाड़ हैं उसे खोद खोदकर लोहा बाहर ले जा रहे हैं. पहले एनएमडीसी को लीज में देकर हमने बहुत बड़ी गलती की है अब दोबारा अडानी हो या जिंदल, किसी कंपनी को लीज में देकर दोबारा गलती हमें नहीं करना है. फर्जीवाड़े के तरीके से जो लीज लिया गया है इन्हें उखाड़कर फेंकने में हमें टाइम लगेगा. 13 नंबर डिपॉजिट की तरह 11 नंबर डिपॉजिट का भी विरोध होगा. नंदराज पहाड़ी को इस तरह से खुदाई के लिए दिया जाना आदिवासियों की आस्था पर चोट लगाने जैसा है. लाल पानी के चलते खेतों का नुकसान हुआ है गाय-बकरी लाल पानी पीकर मर रहे हैं. बच्चों के स्वास्थ्य पर फर्क पड़ रहा है. पानी का बहाव जिस दिशा में  जाना चाहिए उस ओर न जाकर गांव की ओर बहाया जा रहा है. इसीलिए अभी से लड़कर हम जल जंगल जमीन को बचा रहे हैं.




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