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सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले के मुकदमे की रिपोर्टिंग पर पाबंदी को पत्रकारों ने दी चुनौती

सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ केस का मुकदमा मुंबई के सत्र न्यायालय में सीबीआई की विशेष अदालत में चल रहा है.

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सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले के मुकदमे की रिपोर्टिंग पर पाबंदी को पत्रकारों ने दी चुनौती

9 पत्रकारों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में पाबंदी के खिलाफ याचिका दायर की है

मुंबई: सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले के मुकदमे की रिपोर्टिंग पर पाबंदी लगाने के जज के फैसले को मुंबई के पत्रकारों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी है. याचिका में महाराष्ट्र सरकार, जांच एजेंसी सीबीआई और मामले में 23 आरोपियों को पार्टी बनाया गया है. मुंबई के कुल 9 पत्रकारों ने मिलकर याचिका दायर की है जो शहर के प्रमुख अखबार, राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ चैनल और वेब पोर्टल से जुड़े हैं और ज्यादातर 1993 मुंबई सीरियल बम धमाके, 26/11 मुंबई आतंकी हमले के मुकदमों की रिपोर्टिंग कर चुके हैं. याचिका पर सुनवाई अगले महीने होनी है. सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ केस का मुकदमा मुंबई के सत्र न्यायालय में सीबीआई की विशेष अदालत में चल रहा है. आरोप है कि साल 2005 में हुई फर्जी मुठभेड़ में गुजरात और राजस्थान की पुलिस ने सोहराबुद्दीन की हत्या की बाद में उसकी पत्नी कौसर बी की भी हत्या कर दफना दिया था. साल भर बाद फर्जी मुठभेड़ के चश्मदीद तुलसीराम प्रजापति की भी फर्जी मुठभेड़ में मौत दिखाई गई.

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मामले में गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह और राजस्थान के भी एक मंत्री के साथ कई बड़े पुलिस अधिकारियों के शामिल होने और गुजरात मे निष्पक्ष मुकदमा ना हो पाने की आशंका के चलते पीड़ितों की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर मुकदमा मुंबई में हस्तातंरित कर दिया गया. अब तक अमित शाह, गुलाब चंद कटारिया जैसे नेता और डीजी वंजारा जैसे कई दूसरे पुलिस वालों के खिलाफ आरोप खारिज हो चुके हैं लेकिन अब भी 25 के करीब पुलिस वाले मामले में आरोपी हैं. याचिका में कहा गया है कि 29 नवंबर, 2017 को सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा मीडिया रिपोर्टिंग पर दिया गया आदेश अवैधानिक है और कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है.

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अदालत का आदेश CRPC की धारा 327 के तहत प्राप्त खुली सुनवाई के सिद्धांत का हनन करता है और माननीय अदालत को मीडिया पर पाबंदी लगाने का अधिकार ही नही हैं, जब तक कि मुकदमा इन-कैमरा ना हो. याचिका में ये भी दलील दी गई है कि माननीय अदालत मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के लिए जरूरी परिस्थिति बताने में फेल रही है, साथ ही CRPC की धारा 1973 के तहत मीडिया पर पाबंदी लगाना जज के अधिकार क्षेत्र और शक्ति के बाहर है. संबंधित मुकदमा बहुत पहले से मीडिया में रिपोर्ट किया जाता रहा है. अब इस मोड़ पर मीडिया पर पाबंदी का कोई तुक नही बनता और साथ ही मामले से जुड़े किसी आरोपी और उसके वकील की जान को मीडिया रिपोर्टिंग से कोई खतरा नहीं है. माननीय जज ने सिर्फ अनहोनी की आशंका की वजह से मीडिया पर पाबंदी लगा दी है. ये अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ है.

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याचिका में अनुरोध किया गया है कि बॉम्बे हाईकोर्ट संविधान की धारा 227 और अपराध दंड संहिता की धारा 482 के तहत मिले अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा 29 नवंबर 2017 को पारित आदेश को निरस्त करें.


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