मुंबई : 18 साल पहले बिछड़े युवक को एक सिपाही ने घर पहुंचा दिया

मुंबई : 18 साल पहले बिछड़े युवक को एक सिपाही ने घर पहुंचा दिया

पुलिस कर्मी नामदेव हिमगिरे के साथ युवक लहू।

मुंबई:

वह 6 साल की उम्र में ही घर से बिछड़ गया था। न माता - पिता का नाम याद था और न ही अपने गांव का। याद था तो सिफ गांव के पास का विट्ठल मंदिर और नदी। हिंदी फिल्म 'बजरंगी भाईजान' में सलमान खान ने भी सिर्फ एक तस्वीर के जरिए मुन्नी को अपने बिछड़े मां- बाप से मिलवाया था। हालांकि सिनेमा और हकीकत में अंतर होता है। लेकिन दाद देनी होगी ठाणे के ट्रैफिक पुलिस सिपाही नामदेव परशुराम हिमगिरे को जिसने सिर्फ इतने से सुराग पर 18 साल पहले बिछड़े बेटे को उसके परिवार से मिला दिया।

वड़ा-पाव की दुकान पर मिला युवक
ठाणे के नारपोली ट्रैफिक चौकी में कार्यरत सिपाही नामदेव हिमगिरी ने NDTV इंडिया को बताया कि दो महिने पहले ही उनकी यहां नियुक्ति हुई है। एक दिन वड़ा-पाव खाते हुए उन्होंने जिज्ञासावश वहां काम करने वाले लड़के से नाम और उसके घर का पता पूछा तो पता चला कि उसका नाम लहू है और वह बचपन मे ही घर से बिछड़ा हुआ है। उसने अपने घर वापस जाने की बहुत कोशिशें कीं लेकिन संभव नहीं हुआ क्योंकि उसे अपने नाम के अलावा कुछ याद नहीं है।

संवेदनशील पुलिसकर्मी नामदेव हिमगिरे
आम तौर पर माना जाता है कि पुलिस कर्मी संवेदनशील नहीं होते, लेकिन नामदेव में संवेदनशीलता बरकरार है। इसलिए उस युवक की दर्दभरी कहानी उन्हें छू गई। बकौल नामदेव 'बचपन में अपने मां-बाप से बिछड़ने से बड़ा दुख कोई और नहीं हो सकता, इसलिए मैंने खुद उसकी मदद करने की ठानी।'

घर जाने के बजाय भटककर मुंबई पहुंचा
नामदेव के मुताबिक उसके बाद जब भी उन्हें वक्त मिलता वे लहू से मिलते और उसके गांव के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की कोशिश करते। बहुत कोशिशों के बाद भी लहू सिर्फ इतना बता पाया कि जब वह पांच साल का था तब अपने गांव के ही एक घर में पशुओं की देखभाल का काम करता था। एक दिन अपने मां-बाप से मिलने निकला लेकिन घर जाने के बजाय भटककर मुंबई के पास वसई पहुंच गया। दस साल तक इस्माइल नाम के शख्स के साथ काम करने के बाद अब वड़ा-पाव की गाड़ी पर काम करता है।

विट्ठल मंदिर और नदी की धुंधली याद
लहू को अपने गांव का नाम तो नहीं याद था बस एक धुंधली सी याद थी कि गांव से लगकर ही एक विट्ठल मंदिर है और पास में नदी बहती है। सिर्फ इतने सुराग पर किसी का परिवार खोज निकालना आसान नहीं था, लेकिन सिपाही नामदेव पर तो लहू को उसके परिवार से मिलाने का जुनून सवार हो गया था। सबसे पहले उन्होंने आसपास के जिलों में ऐसे गांव की तलाश शुरू की जिसके पास विट्ठल मंदिर और नदी हो। उन्होंने यह जानने के लिए न जाने कितने चुनाव कार्यालयों और तहसील कार्यालयों तक के चक्कर लगाए। जहां भी इस तरह के पते का उल्लेख मिलता नामदेव तुरंत छुट्टी लेकर या फिर साप्ताहिक छुट्टी के दिन लहू को साथ लेकर निकल जाते। राज्य में कहां- कहां विट्ठल मंदिर हैं यह जानने के लिए नामदेव ने गूगल सर्च भी किया।


खोजबीन के लिए नामदेव ने की भारी मशक्कत
लहू का गांव खोजने की कोशिश में उन्होंने कितने विट्ठल मंदिरों के चक्कर लगाए उन्हें अब याद भी नहीं है। सफलता न मिलने के बावजूद नामदेव ने हार नहीं मानी। इस सप्ताह की शुरुआत में छुट्टी मिलते ही वह लहू के साथ गोवा के रास्ते पर जा रहे थे, तभी लहू को इलाका जाना- पहचाना लगा। रुककर पता किया तो विट्ठल मंदिर भी मिला और नदी भी। बस फिर क्या था उम्मीद की किरण जग गई। मंदिर और आसपास पूछते-पूछते वह घर मिल गया जहां लहू काम करता था। पता चला कि घर के मालिक की मौत हो गई है। लेकिन उनके लड़के ने सुन रखा था कि उसके घर में पहले एक छोटा लड़का काम करता था जो एक दिन अचानक गायब हो गया था। वह छोटा बालक दहे गांव के आदिवासी पाढा का रहने वाला था।

आखिर गोवा रोड पर मिल ही गया ठिकाना
नामदेव के मुताबिक इतना सब कुछ जानने के बाद उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी लहू को उसके मां- बाप से मिलाना। इसके लिए वह पहले गांव के पुलिस पाटिल से मिले। पुलिस पाटिल ने बताया कि जिस घर की बात हो रही है उस परिवार ने चरित्र प्रमाण-पत्र बनवाने के लिए अपने फोटो उनके पास जमा करवाए हैं।

मां-बाप की तस्वीर देखकर आंखें हुईं नम
नामदेव ने बताया कि लहू हमेशा कहता था कि उसे गांव का नाम भले याद नहीं लेकिन अपने माता -पिता का चेहरा याद है। लहू की याददास्त जांचने के लिए उसे फोटो दिखाने का फैसला किया, लेकिन अकेले उसके माता-पिता की नहीं बल्कि कुछ अन्य लोगों की तस्वीरें भी उसके साथ रखीं। लहू को 6 साल की उम्र में देखा हुआ अपने मां-बाप का चेहरा पहचानने में देर नहीं लगी। फोटो देखते ही उसकी आंखें एक पल के लिए चमकीं और फिर उनमें आंसू भर आए।

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लहू के पास आभार के लिए शब्द नहीं
इसके बाद उसे नामदेव आदिवासी पाढा में लहू को उसके घर ले गए। वहां उसके मां- बाप तो नहीं थे लेकिन बूढ़ी आजी थी। हैरानी की बात है कि आजी ने भी उसे तुरंत पहचान लिया और आगे बढ़कर गले से लगा लिया। 18 साल बाद घर में खुशी लौटी थी। परिवार के सभी लोग खुशी से रो रहे थे। न तो लहू की आजी और न ही खुद लहू की समझ में आ रहा था कि सिपाही नामदेव का वे धन्यवाद करें तो कैसे करें?