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ऑपरेशन सज्जाद मुगल की पूरी कहानी, बिना बंदूक और हथकड़ी के क्राइम ब्रांच पकड़ लाई सज्जाद को

जून महीने में सज्जाद की तलाश में उसके गांव गई नासिक पुलिस को एक बार वहां से जान बचाकर भागना पड़ा था. यहां तक कि केंद्रीय एजेंसियां और जम्मू कश्मीर पुलिस भी मान चुकी थी कि सज्जाद पहुंच से बाहर है.

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ऑपरेशन सज्जाद मुगल की पूरी कहानी, बिना बंदूक और हथकड़ी के क्राइम ब्रांच पकड़ लाई सज्जाद को

मुंबई क्राइम ब्रांच की गिरफ्त में सज्‍जाद मुगल (दाएं)

खास बातें

  1. सज्जाद मुगल मुंबई की एक वकील पल्लवी पुरकायस्थ का क़ातिल है
  2. नासिक पुलिस 2 बार सज्‍जाद के गांव से खाली हाथ लौट चुकी थी
  3. 2016 में 3 महीने के लिए पैरोल पर छूटने के बाद से फरार था सज्‍जाद
मुंबई: मंगलवार 10 अक्टूबर की शाम 6 बजे के करीब अचानक से खबर आयी कि सज्जाद मुगल पकड़ा गया. पहले तो विश्वास नहीं हुआ क्योंकि मई 2016 से गायब सज्जाद जम्मू कश्मीर में बारामुला जिले के सलामाबाद गांव का रहने वाला है जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से काफी नजदीक है और आतंकवाद प्रभावित इलाका है. जून महीने में सज्जाद की तलाश में उसके गांव गई नासिक पुलिस को एक बार वहां से जान बचाकर भागना पड़ा था. यहां तक कि केंद्रीय एजेंसियां और जम्मू कश्मीर पुलिस भी मान चुकी थी कि सज्जाद पहुंच से बाहर है. फिर मुंबई क्राइम ब्रांच उसे कश्मीर से कैसे खोज निकाल सकती है? लेकिन मुंबई पुलिस की अपराध शाखा के विशेष दस्ते ने ये कर दिखाया था वो भी बिना किसी बंदूक और हथकड़ी के, सिर्फ अपनी दिलेरी और दिमाग का इस्तेमाल कर.

यही वजह थी कि जब सज्जाद मुगल को लेकर वो दस्ता मुंबई पुलिस मुख्यालय पहुंचा तो अपराध शाखा के सह आयुक्त संजय सक्सेना खुद उनकी अगवानी के लिए नीचे खड़े थे. दूसरी ओर मुंबई पुलिस आयुक्त दत्तात्रेय पडसलगीकर अपनी कुर्सी छोड़ बाहर आये और कहा कि मुझे देखना है कि कौन वो जांबाज अफसर है जिसने अपनी जान की परवाह किये बिना इस ऑपरेशन को अंजाम दिया. पुलिस इंस्‍पेक्‍टर संजय निकम और उनके 4 साथियों के लिए ये किसी सपने से कम नहीं था. दया काम्बले, संदीप काम्बले, संदीप तलेकर और चन्द्रकांत गुरव ये वो 4 सिपाही हैं जो इस ऑपरेशन का अहम हिस्सा रहे.

सज्जाद मुगल मुंबई की एक वकील पल्लवी पुरकायस्थ का क़ातिल है. अगस्त 2012 में वो पल्लवी के घर में घुसकर हत्या कर फरार हो गया था. पकड़े जाने के बाद मुकदमा चला और मुंबई सत्र न्यायालय ने साल 2014 में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. उसके बाद से नासिक जेल में बंद सज्जाद अपनी बीमार मां से मिलने के लिए मार्च 2016 में 3 महीने के लिए पैरोल पर छूटने में कामयाब रहा. उसे मई 2016 में वापस जेल आना था लेकिन वो नहीं आया. तब से उसकी तलाश जारी थी. पहले नासिक पुलिस और बाद में मुंबई क्राइम ब्रांच को भी उसे खोज निकालने का काम दिया गया.
 
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मुंबई क्राइम ब्रांच के इंस्‍पेक्‍टर संजय निकम (फाइल फोटो)

इसके लिए उन अफसरों की एक खास टीम बनाई गई जिन्होंने पल्लवी की हत्या के बाद उसे गिरफ्तार किया था. एसीपी अभय शास्त्री के सुपरविजन में पुलिस इंस्पेक्टर महेश तावड़े, पुलिस इंस्पेक्टर संजय निकम, सिपाही दया काम्बले, संदीप काम्बले, संदीप तलेकर, अजय बल्लाल और चन्द्रकांत गुरव की टीम बनाई गई थी. एंटॉप हिल में क्राइम ब्रांच यूनिट 4 के दफ्तर से टीम ने काम शुरू किया था.

पल्लवी के पिता आईएएस अफसर रहे हैं और जम्मू-कश्मीर में सेना और कई केंद्रीय एजेंसियां भी सुरक्षा में तैनात हैं इसलिए खबर है कि अपने प्रभाव और पहचान का इस्तेमाल कर उन्होंने आईबी, बीएसएफ, मिलिट्री इंटेलजिंस, राष्ट्रीय राइफल और जम्मू-कश्मीर पुलिस से भी फरार सज्जाद को खोजने में मदद की गुहार लगाई थी. सभी एजेंसियां अपनी तरह से तलाश में जुटी थीं.

समय तेजी से बीत रहा था. नासिक पुलिस 2 बार उसके गांव से खाली हाथ लौट चुकी थी. पुलिस के पास सज्जाद का कोई मोबाइल नंबर नहीं था जिसके जरिये उसका लोकेशन पता चल जाता. चुनौती बड़ी और कठीन थी क्योंकि आतंकवाद प्रभावित कश्मीर में सीधे जाकर उसे खोजना खतरे से खाली नहीं था. लिहाजा विशेष टीम ने मुंबई क्राइम ब्रांच का पुराना तरीका अपनाया. शुरुआत नासिक जेल से ही की गई. जेल में उसके साथ रहे अपराधियों से पूछताछ में पता चला कि वापस नहीं आने की योजना के साथ ही उसने पैरोल की अर्जी दी थी. बातचीत में ये भी पता चला कि उसे शराब की भी लत है और अय्याश भी है. जाहिर है इस सबके लिए उसे पैसों की जरूरत होगी? इसलिए पुलिस ने ये भी पता करना शुरू किया कि हो सकता है कश्मीर भागने के पहले उसने पैसे कमाने के लिए कहीं मजदूरी या चौकीदारी की हो तो वहां से उसका सुराग मिल सकता है. लेकिन तब ऐसा कुछ पता नहीं चल पाया. ये अलग बात है कि पकड़े जाने के बाद सज्जाद ने इस बात का खुलासा किया कि पैरोल के दौरान उसने मुंबई मे अंधेरी की और कुछ दूसरी हाउसिंग सोसायटियों में चौकीदारी का काम किया था. सवाल है हत्या का दोषी और पैरोल पर फरार मुजरिम को चौकीदारी का काम मिला कैसे?

VIDEO: मुंबई की वकील पल्लवी पुरकायस्थ की हत्या के दोषी सज्जाद को उम्रकैद

बहरहाल नासिक पुलिस और मुंबई क्राइम ब्रांच की टीम के काम का तरीका एकदम अलग था. नासिक पुलिस जहां सीधे सज्जाद की तलाश में उसके गांव जा धमकी थी वहीं मुंबई क्राइम ब्रांच की टीम ने पहले सज्जाद के घर परिवार और दोस्तों की जानकारी जमा करना शुरू किया. क्योंकि वहां गई नासिक पुलिस की टीम को पथराव का सामना करना पड़ा था. स्थानीय पुलिस बड़ी मुश्किल से उन्हें अपनी सुरक्षा में बाहर निकाल कर लायी थी. ये अलग बात है कि दूसरी बार नासिक पुलिस सज्जाद की मां का बयान लेने में कामयाब रही थी. पर सज्जाद का कुछ पता नहीं चल पाया था.

पता चला कि सज्जाद के तीन और भाई हैं. उनके नाम हैं तौफीक़,  अमजिद और इरफान. तकरीबन 6 महीने बाद पहली बार मुंबई क्राइम ब्रांच की टीम जम्मू गई. सूत्र बताते हैं कि पुलिस टीम को जम्मू से अपने अधिकारियों की तरफ से साफ निर्देश था कि वो सीधे कश्मीर में सज्जाद के गांव या उसके आसपास नहीं जायेगी जब तक कि कोई ठोस सुराग नहीं मिले. इसलिए इंस्पेक्टर निकम सबसे पहले जम्मू में ही रहकर बारामुला में सोर्स बनाने में जुट गये. साथ ही उस इलाके की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति की जानकारी भी जुटानी शुरू की. वहां से पता चला कि श्रीनगर के आगे रामबन तक तो ठीक है लेकिन उसके आगे जाना खतरे से खाली नहीं है.

टीम जम्मू से ही वापस आ गई और मुंबई आकर जम्मू में बनाये गए सोर्स के जरिये तलाश जारी रखी. इस बीच एसीपी अभय शास्त्री अपने डिवीजन में वापस लौट गए, पुलिस इंस्पेक्टर महेश तावड़े को भी एक हत्याकांड के सिलसिले में मालाड पुलिस थाने में वापस आना पड़ा और सिपाही अजय बल्लाल भी किसी वजह से टीम का हिस्सा नहीं रहा. टीम में रह गये सिर्फ इंसपेक्टर संजय निकम और बाकी के 4 सिपाही.
 
मुंबई में रहकर भी इंस्पेक्टर संजय निकम शांत नहीं बैठे. सज्जाद के भाईयों के नाम से इंटरनेट पर सोशल साइट खंगालते रहे. कई दिनों की कोशिश के बाद उन्हें फेसबुक पर किलर नाम से एक पेज मिला. सज्जाद के छोटे भाई द्वारा बनाये गए उस पेज पर सभी 4 भाईयों का एक साथ एक फ़ोटो भी था. लेकिन फ़ोटो में भाइयों के पीछे जो जगह दिख रही थी वो सज्जाद के गांव से अलग थी. ध्यान से देखने पर पता चला कि वो कोई ऐसी जगह है जहां बांध या टनल जैसा कोई निर्माण कार्य चल रहा है. फ़ोटो में चारों भाइयों को साथ देखकर इतना तो साफ हो गया था कि सज्जाद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में नहीं भागा है, वो इसी पार है और अपने परिवार के संपर्क में है. पुलिस के हाथ बहुत बड़ा सुराग लग गया था. लेकिन चुनौती उस जगह को पहचानने और वहां जाने की थी.

इस अहम सुराग के साथ इंस्पेक्टर निकम अपनी टीम के साथ अब श्रीनगर के लिए निकल गये. इसके लिए उन्होंने अपनी दाढ़ी बढ़ाई, और पहनावा भी बदल लिया. वहां रहकर उन्होंने कुछ ऐसे सोर्स बनाये जो बारामुला इलाके को समझते थे, वहां जान पहचान रखते थे. उनसे बातचीत में पता चला कि उस इलाके में हर कोई नहीं जा सकता. वहां कुछ ऐसे संवेदनशील इलाके हैं जहां जाने के लिये किसी भी बाहरी शख्स के पास टीआरपी यानी टेम्पररी रेसिडेंस पास होना चाहिए. उसके लिए इलाके में उस शख्स को जानने वाला भी होना चाहिए.

वो इलाका सेना की निगरानी में है और जरा भी शक होने पर वो गोली मार सकती है. पुलिस टीम के सामने दोहरी चुनौती थी. अगर वो अपनी असली पहचान जाहिर करते हैं तो राज खुलने का डर था और पहचान छुपाते हैं तो गोली खाने का. सूत्रों के मुताबिक इस दौरान सोर्स बनाने और जानकारी जुटाने के लिए उसे खूब पैसे भी खर्च करने पड़े. बताते हैं कि वहां के लोगों को मिठाई पसंद है लेकिन वहां इस तरह की मिठाई आसानी से नहीं मिलती इसलिए उन्हें मिठाई के डिब्बे भेंट कर काम निकालना पड़ा.

अब तक पुलिस टीम के पास काफी जानकारी जमा हो चुकी थी. ये भी पता चल चुका था कि फ़ोटो में पीछे दिख रही जगह झेलम नदी पर नेशनल हाइड्रो पावर की साइट हैं जहां निर्माण का काम चल रहा है. इससे ये अंदाजा लग गया कि सज्जाद हो ना हो उस जगह पर ही मजदूरी का काम कर रहा है. लेकिन सिर्फ अंदाजे पर ही वहां जाने का जोखिम नहीं लिया जा सकता था. बहरहाल पता चला है कि इंस्पेक्टर निकम किसी तरह जुगाड़ लगाकर एक बार सज्जाद के गांव तक भी पहुंच गये थे. लेकिन जब ये जानकारी मिली कि वहां 20 से 25 घर सज्जाद के मुगल परिवार के ही हैं और एक आवाज पर सभी जमा हो जाते हैं इसलिये वहां जरा भी जोखिम मोल लेना मुनासिब नहीं था. ये भी पता चला कि सज्जाद अपने घर मे ना रहकर गांव से 4 किलोमीटर दूर जबाड़ इलाके में अपने चाचा सरीफ के घर आता जाता रहता था. वहां कुछ करना उसके गांव से भी जोखिम भरा था. पुलिस टीम एक बार फिर वापस मुंबई आकर मौके का इंतजार करने लगी. मिठाई वाले सोर्स काम मे लगे रहे.

अक्टूबर के पहले सप्ताह में खबर मिली कि सोनमर्ग में एक बड़े प्रोजेक्ट के निर्माण का काम चल रहा है, वहां तकरीबन डेढ़ हजार मजदूर काम करते हैं. सलामाबाद से भी कई लड़के उस साइट पर मजदूरी करते हैं और वहीं रहते हैं. मतलब सज्जाद के वहां होने की प्रबल संभावना थी. सूचना मिलने के बाद इंस्पेक्टर संजय निकम अपने तीन सिपाहियों के साथ निकल गए. मुंबई से श्रीनगर और वहां से सोनमर्ग. श्रीनगर हवाई जहाज से गये थे इसलिये बंदूक और हथकड़ी ले जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता. ऐसे इलाके में जहां बात बात में पथराव, पुलिस और सेना पर भी हमला होने की आशंका बनी रहती हैं वहां 4 लोग वो भी निहत्थे, कुछ भी हो सकता था. लेकिन सज्जाद को पकड़ना था वो भी बिना स्थानीय पुलिस की सहायता लिए क्योंकि बात लीक होने का डर था.

स्थानीय लिबास में टीम सीधे उस साइट पर ना जाकर पहले आसपास के गांव में गई. खुद को टेलीफोन कंपनी का अफसर बताकर  टेलीफोन टावर लगाने के लिए सर्वे करने आया है बताया. आतंक और गरीबी की दोहरी मार झेल रहे लोगों को आमदनी का जरिया दिखा और वो उसके लिए जमीन देने को तैयार हो गए. लेकिन पुलिस का लक्ष्‍य तो उन मजदूरों तक पहुंचना था. लिहाजा टावर बनाने के लिए जरूरी मजदूरों को लाने की शर्त जमीन वालों को ही दी गई. पैसा आता देख भला कौन मना करेगा. वो लोग सोनमर्ग में जहां निर्माण काम चल रहा था वहीं के कुछ ठेकेदारों को बुला लाये. उनसे कोटेशन मांगा गया और मजदूरों के काम देखने के लिए उस साइट पर ले जाने की शर्त रखी गई. ठेकेदार तैयार हो गया और थोड़ी ही देर में टीम उन मजदूरों के बीच में थी. इत्तेफाक से जिस ठेकेदार से मुलाकात हुई थी उसके मजदूरों की लिस्ट में साजिद नाम लिखा था. पुलिस को पहले से अंदेशा था कि अपनी पहचान छुपाने के लिये सज्जाद दूसरे नाम का सहारा ले सकता है और साजिद सज्जाद से मिलता जुलता है इसलिए पुलिस ने साजिद को देखना चाहा. ठेकेदार का उसकी तरफ इशारा करते ही पुलिस टीम को उसे पहचानने में देर नहीं लगी. लेकिन किसी ने कोई हड़बड़ी नहीं की ना ही अपने चेहरे पर सज्जाद को खोज निकालने की खुशी को आने दिया. टीम वापस चली गई.

अगले दो दिन उसे वहां से उठाने के मौके की तलाश होती रही. लेकिन वो कंस्ट्रक्शन साइट से बाहर नहीं आया. अब पुलिस के सामने मजदूरों के बीच मे जाकर सज्जाद को पकड़ने के अलावा कोई चारा नहीं था. तकरीबन 100 मीटर दूर गाड़ी खड़ी कर सिपाही दया कांबले और संदीप कांबले को ड्राइवर के साथ उसी में बैठे रहने को कहकर इंपेक्टर निकम सिर्फ एक सिपाही संदीप तलेकर के साथ सज्जाद के पास गए. सज्जाद जहां काम कर रहा था उसके ठीक पीछे बड़ा गड्ढा था और डर था कि अगर वो भागता है तो गड्ढे में गिर सकता है और अगर ऐसा हुआ तो बात बिगड़ते देर नहीं लगेगी और उसके बाद क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता था. इसलिए इंपसेक्टर निकम पहले उस गड्ढे की तरफ सज्जाद के बिल्कुल करीब खड़े हुए फिर एक हाथ से उसके हाथ को दबाया और बोले, "सज्जाद तुझे मेरे साथ चलना है." और उसका हाथ छोड़ दिया. लेकिन तब तक साथ में गया दूसरा सिपाही तय योजना के मुताबिक दूसरी तरफ से सज्जाद से सटकर खड़ा हो गया.

इंस्‍पेक्टर निकम के मुताबिक उनकी आवाज सुनते ही सज्जाद जगह पर ही जड़ गया. उसे कुछ समझ ही नहीं आया कि हम कौन हैं और क्या चाहते हैं? हमने उसका हाथ बिना पकड़े ही शरीर से धक्का देकर आगे चलने का इशारा किया और उससे सामान्य बात करते करते गाड़ी के पास लाये. सबकुछ इतनी शांति से हो गया कि आसपास काम करने वाले मजदूर भी कुछ समझ नहीं पाये. गाड़ी का दरवाजा खोलकर जैसे ही उसे गाड़ी में बिठाया गया अंदर बैठे सिपाही दया कांबले को देख कर वो पहचान गया और उसके मुंह से आवाज निकली "अरे साहब आप?" दया कांबले वो सिपाही हैं जो मुकदमे के दौरान विशेष सरकारी वकील उज्वल निकम की मदद के लिए हमेशा अदालत में मौजूद रहते थे. सज्जाद उन्हें अच्छी तरह से पहचानता था और दया ने दाढ़ी भी नहीं रखी थी इसलिए दया कांबले को गाड़ी में ही बैठने को कहा गया था.

सज्जाद और कुछ बोलता या हरकत करता तब तक दूसरा सिपाही भी उसके बगल में बैठ चुका था और गाड़ी भी वहां से निकल चुकी थी. ड्राइवर के बगल की सीट पर बैठे इंस्‍पेक्‍टर संजय निकम ने पीछे मुड़कर सज्जाद को एक सेब दिया और बोले "खा". सज्जाद को पहचानते देर नहीं लगी और बोल उठा निकम साहब आप हैं?

सवाल है कि सज्जाद मुगल को पता था कि पुलिस उसकी तलाश में है. आज नहीं तो कल वो पकड़ा ही जायेगा. फिर वो सीमा पार क्यों नहीं भाग गया? इंस्पेक्टर संजय निकम के मुताबिक ये सवाल उन्होंने भी उससे पूछा था. तब सज्जाद का जवाब था, साहब उस पार जिंदगी नहीं है. गरीबी, बेकारी और जिल्लत के सिवा वहां कुछ नहीं है इसलिये मैं यहीं रहकर जीना चाह रहा था.

इसके बाद की कहानी तो जग जाहिर है. सज्जाद की गिरफ्तारी कितनी अहम थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद मुंबई पुलिस आयुक्त दत्तात्रेय पडसलगीकर ने पत्रकार परिषद लकेर उसकी गिरफ्तारी की घोषणा की. उन्होंने बताया कि जैसे ही मुझे सज्जाद की गिरफ्तारी की सूचना मिली मैंने सबसे पहले पल्लवी के पिता पुरकायस्थ को फोन कर बताया तो उनकी आंख में आसूं आ गए. वो बोले मुझे इसी पल का इंतजार था. पुलिस आयुक्त ने पूरी टीम का परिचय पत्रकारों से कराया.

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कदकाठी से पहलवान लगने वाले इंस्‍पेक्‍टर संजय निकम 26/11 आतंकी हमले में भी मोर्चा संभालने वालों में रहे हैं. उस समय वो प्रॉपर्टी सेल में थे. प्रोपर्टी सेल ने ही साल 2008 में इंडियन मुजाहिदीन के पुणे मॉड्यूल को पकड़ कर आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन की कमर तोड़ी थी. तब अरुण चव्हाण प्रॉपर्टी सेल के इंचार्ज थे और श्रीपद काले, नंदकुमार गोपाले, संजय निकम और अजय सावंत उस टीम के अहम हिस्सा थे. उसके पहले तक पहेली रहे इंडियन मुजाहिदीन के लिए वो बड़ा झटका था. उसके बाद अहमदाबाद और कर्नाटक में भी बड़ी संख्या में उसके आतंकी पकड़े गए. उस समय दिवंगत आर आर पाटिल राज्य के गृहमंत्री थे उन्होंने 5 लाख रुपये इनाम देने का वादा किया था. लेकिन बाद में 26/11 आतंकी हमले के बाद उन्होंने इस्तीफा दिया और वो वादा सिर्फ घोषणा बनकर रह गया. हैरानी की बात है कि साल 2000 से 2008 तक देश में आतंकी वारदातों को अंजाम देने वाले संगठन को बेनकाब करने वाली टीम को इनाम तो दूर एक अदद पुरस्कार भी नहीं मिला. मिला है तो सिर्फ क्राइम ब्रांच में तब के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त देवेन भारती का एक अभिनंदन पत्र.

अब कश्मीर की दुरूह परिस्थितियों में से फरार क़ातिल को खोज निकालने और बिना किसी गड़बड़ी के उसे पकड़कर वापस सलाखों के पीछे भेजने वाली टीम की तारीफ तो खूब हो रही है. खुद मुख्यमंत्री देवेंन्द्र फडणवीस ने ट्वीट कर शाबाशी दी है. लेकिन सवाल है क्या इन्हें इनकी बहादुरी, समर्पण और सफलता पर इनाम और पुरस्कार मिलेगा या फिर साल 2008 की तरह सिर्फ जुबानी कवायद बन कर रह जायेगी?


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