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आपके सवाल, रवीश के जवाब

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना.

सवाल

क्या इंडिया कभी वर्ल्ड लीडर (सुपरपॉवर) बन सकता है...? अगर हां, तो कैसे, और अगर नहीं, तो क्यों...? पांच प्वाइंट में जवाब दें, प्लीज़...

RAJESH
जवाब

@RAJESH , न्यूज़ चैनल देखने से तो भारत सुपरपॉवर नहीं बनेगा. सुपरपॉवर से आप क्या समझते हैं...? अगर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतरी की बात करते हैं, तो मुझे नहीं लगता है कि हम इस सेक्टर में अगले 10 साल तक किसी स्तर पर पहुंचने वाले हैं. कोई इम्तिहान नहीं होता है कि पास कर सुपरपॉवर बन गए. बड़ा और सक्षम देश बना जाता है, ग़रीबी से लड़ते हुए और सबके लिए अवसरों को पैदा करते हुए. बाकी जो आप इस सवाल के आस-पास सुनते हैं, वह सब प्रोपेगैंडा और ड्रामा है.

सवाल

क्या भारतीय प्रधानमंत्री आत्ममुग्धता से ग्रस्त हैं...?

अमर दलपुरा
जवाब

@अमर दलपुरा , बिल्कुल... हमारे प्रधानमंत्री आत्ममुग्धता के शिकार हैं. आत्ममुग्धता के अलावा कैमरामुग्धता के भी शिकार हैं. हर समय टीवी पर दिखने या किसी न किसी बहाने लोगों के बीच दिखने की उनकी राजनीतिक रणनीति भले स्मार्ट है, मगर वह एक प्रधानमंत्री हैं. अधिकांश छोड़िए, अगर उनके समय का मामूली से ज़्यादा हिस्सा भी इन सब पर खर्च हो रहा है, तो यह उनके काम और देश का नुकसान है. जनवरी आते ही वह एक सौ सभाओं को करने निकल गए. अगर पांच घंटे भी एक सभा पर लगते हैं, तो इस हिसाब से वह 20 दिन के बराबर सभाएं ही कर रहे हैं. क्या यह सवाल नहीं होना चाहिए...?

सवाल

सर, कश्मीर समस्या का समाधान आपकी नज़र में क्या हो सकता है...?

अमर दलपुरा
जवाब

@अमर दलपुरा , कश्मीर की समस्या जटिल है. उसका समाधान बताने से हम जैसे मामूली एंकरों को दूर रहना चाहिए. आप अगर हिन्दी के पाठक हैं, तो अशोक पांडे की कश्मीरनामा, इतिहास और समकाल पढ़ें. राजपाल प्रकाशन ने यह किताब छापी है.

सवाल

RSS और उसकी विचारधारा की काट क्या है...? हिन्दू भाइओं के दिल-ओ-दिमाग में जो दूसरे धर्मों के लिए ज़हर भरा गया है, 70-80 साल में, उसकी दवा क्या है...?

Sarfaraz
जवाब

@Sarfaraz , किसी भी विचारधारा की काट से पहले उसका अध्ययन और समझ देना ज़रूरी होता है. उस विचारधारा से लैस लोगों के व्यवहार को भी समझना होता है. वे बोलते क्या हैं, करते क्या हैं. फिर देखना होता है कि उस विचारधारा के पास कोई आर्थिक विकल्प है. इसके बाद विकल्प की विचारधारा का इसी तरह सख्ती से अध्ययन करना चाहिए. विचारधारा की काट निकालने का रास्ता मुश्किल है. काफी अध्ययन और समझदारी की ज़रूरत होती है. यकीन की ज़रूरत होती है कि जो ग़लत है, वह ग़लत है. ग़लत का विरोध करना सही काम है.

सवाल

सर, आप भी पत्रकार हैं, लेकिन आजकल जो कुछ न्यूज़ चैनलों पर दिखाया जाता है, उसके बारे में आप क्या कहेंगे...? इतनी उग्र, असयंमित भाषा, अपारदर्शिता एवं पक्षपात - क्या सच है और क्या झूठ, पता ही नहीं चलता... कभी-कभी लगता है, न्यूज़ नहीं, हिन्दी फ़िल्म देख रहे हैं...

Arup Majumdar
जवाब

@Arup Majumdar , अगर भारत की जनता मेरी बात मानती, तो मैं उससे यही निवेदन करता कि उसे न्यूज़ चैनल देखना बंद कर देना चाहिए. मैंने इस पर विस्तार से लिखा है. अब आप इन माध्यमों से बहुत उम्मीद न करें. इन पर सरकार और कॉरपोरेट का कब्ज़ा हो गया है. इनका काम है, सरकार के लिए भीड़ पैदा करना. पत्रकारिता करने के लिए जो संसाधन और सामर्थ्य होना चाहिए, वह अब किसी चैनल के पास नहीं है. चाटुकारिता ही पत्रकारिता है. चैनलों को यह फार्मूला मिल गया है.

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