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आपके सवाल, रवीश के जवाब

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना, हिन्दी मेरी जान, भोजपुरी मेरा ईमान.

सवाल

रवीश जी, क्या कभी भारत में ऐसा कड़ा कानून बन पाएगा, जिससे छोटी बच्चियों और महिलाओं को बलात्कार जैसी घटनाओं से निजात मिल सके...? कब तक मासूम बच्चियां दरिंदों का शिकार बनती रहेंगी, कब तक उन्हें यह सब सहना पड़ेगा...? क्या कभी उनके साथ ज़्यादती करने वाले को फांसी की सज़ा मिल पाएगी...?

chandrashree rajput
जवाब

@chandrashree rajput , भारत में जो भी कानून है, वह कड़ा ही है. हल्का कानून कभी नहीं बनता. यह बात दिमाग़ से निकाल दीजिए कि फांसी से इस समस्या का अंत हो जाएगा. इस मूर्खता को अब ढोना बंद कर दें. समस्या दो स्तर पर है. हमारे समाज में पुरुषों को लालन-पालन के समय से ही बहुत-सी छूट मिल जाती हैं, जो उन्हें इस अपराध की दिशा में ले जाती हैं. बहुत सी मांएं यही बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी कि उनका बेटा ऐसी हरकतें करता है. उन्हें मानना पड़ेगा कि उनका ही बेटा ऐसा काम कर सकता है. क्यों कर रहा है, इसका जवाब लंबा हो जाएगा. दूसरी समस्या है कि जांच एजेंसियों का खराब प्रदर्शन. पुलिस बल कम हैं. पेशेवर नहीं हैं. उनसे जितनी अपेक्षा की जाती है, उतनी ही उनकी उपेक्षा भी की जाती है. जांच का स्तर इतना खराब है कि सबूत जुटाने में वर्षों लग जाते हैं. वे कोर्ट में साबित नहीं हो पाते. इसलिए यह ठीक नहीं होगा, तो कुछ नहीं होगा. आप हेडलाइन सुख प्राप्त करते रहिए कि सरकार ने फांसी की सज़ा जोड़ दी है.

सवाल

रवीश जी, न्यूज़ चैनल ख़बर पहुचाने की बजाय न्यायालय क्यों बनते जा रहे हैं...?

मनीष उपाध्याय
जवाब

@मनीष उपाध्याय , मनीष, न्यूज़ चैनलों के भीतर ख़बरों का तंत्र ढह चुका है. संवाददाताओं की ख़बरें स्पीड न्यूज़ में चलती हैं, जिनका कोई मतलब नहीं होता है. स्पीड न्यूज़ की ख़बरें संदर्भों से कटी होती हैं. सूचनाएं छिन्न-भिन्न हो जाती हैं. पता नहीं, एक दर्शक की भांति आप क्या देखते हैं, क्या समझते हैं, आप ही बता सकते हैं. पचास चैनल हैं मगर सूचना कहीं नहीं हैं. हर जगह धारणा है. आप भी चैनलों के हिसाब से ढल चुके हैं. कई मौकों पर आप भी अदालत बन जाते होंगे, एंकरों के साथ-साथ. ज़रूरी है कि टीवी का चरित्र समझें. इसका चरित्र ही यही है कि चीखे-चिल्लाए, मनोरंजन करे, ताकि आपका दिल बहल ले. बहस में कोई पागल जैसा बोलता है, तब लोग ज़्यादा ध्यान से सुनने लगते हैं और अगली सुबह तक चर्चा करते हैं. दरअसल न्यूज़ चैनल इस क्रम में आपको गढ़ रहे होते हैं. आपकी तर्क क्षमता का मज़ाक उड़ा रहे होते हैं. एंकर हर रात जज बन जाता है. उसके साथ प्रवक्ता भी जज बन जाते हैं. फिर इन सबके साथ आप दर्शक भी जज बन जाते हैं. इस प्रक्रिया में एक नागरिक का पतन होता है. वह कमज़ोर होता है. वह बस एक दर्शक बनकर रह जाता है.

सवाल

सरकारी विभाग के कर्मचारी और निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की कार्यशैली, गुणवत्ता और परिणाम देने की दर भिन्न क्यों है, जबकि सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह अपेक्षाकृत कई गुना अधिक होती है...? क्यों लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहते, क्यों लोग अपना इलाज सरकारी अस्पतालों में मज़बूरी में ही करवाते हैं, क्यों सरकारी नल का पानी गंदा आता है...? मुझे लगता है, प्रत्येक विभाग अपना कार्य ईमानदारी से करने लगे, तो किसी के पास कोई समस्या ही न रहे, जैसे - झाड़ू लगाने वाला सही तरीके से झाड़ू लगाए, कूड़ा उठाने वाला अपना काम ठीक ढंग से करे, लेबर इंस्पेक्टर अपने क्षेत्र में सुनिश्चित करे कि सभी को न्यूनतम मज़दूरी मिले, लेकिन ऐसा क्यों नहीं होता है, सब अपने कामों और ज़िम्मेदारियों से क्यों बचना चाहते हैं...?

MANOJ KUMAR
जवाब

@MANOJ KUMAR , मनोज, बहुत ही जनरल सवाल है. कई जगहों पर सरकारी कर्मचारी की कार्यक्षमता ज़्यादा होती है. कई जगहों पर प्राइवेट वालों की होती है और उनकी सैलरी सरकारी से कई गुना ज़्यादा होती है. एक सीईओ की कमाई आज भी प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव से ज़्यादा है. सरकारी विभाग काम नहीं करते हैं, यह एक अलग सवाल है. आदर्श स्थिति में करना चाहिए, इसीलिए उनके ऊपर अधिकारी होते हैं, पार्षद होते हैं, विधायक होते हैं और सबसे ऊपर सांसद होते हैं. हम इन सवालों को मुख्य सवाल नहीं मानते हैं, इसलिए सब परेशान हैं.

सवाल

मुझे पत्रकारिता करने के लिए क्या करना चाहिए...? मैं हिन्दी अख़बार निकालना चाहता हूं और अपने शहर को साक्षर बनाना चाहता हूं...

विजय कुलदीप
जवाब

@विजय कुलदीप , विजय, शुभकामनाएं. मैंने कभी अख़बार नहीं निकाला, इसलिए इस बारे में कुछ राय नहीं दे सकता.

सवाल

क्या मुझे अपना वोट 'नोटा' को देना चाहिए, क्योंकि आज की राजनीति में मुझे कोई बेहतर विकल्प नहीं दिखता है...?

Arvind Upadhyay
जवाब

@Arvind Upadhyay अरविंद जी, बिल्कुल 'नोटा' पर वोट देना चाहिए. वह पूरी तरह से संवैधानिक है, तभी तो उम्मीदवारों के साथ उसका भी बटन है. वोट उम्मीदवार देखकर ही दें.

सवाल

सर, आप लोग पूरे भारत की ख़बरें दिखाते हैं, मगर कभी झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम क्यों नहीं आते...? यहां सारे माइन्स बंद हैं, बेरोज़गारी है...

irfan ahmad
जवाब

@irfan ahmad इरफ़ान, यह सही है. न्यूज़ चैनलों के पास अब हर जगह के लिए संवाददाता नहीं हैं. अब न्यूज़ चैनल रिपोर्टिंग के लिए नहीं, डिबेटिंग के लिए हो गए हैं. इसमें आप जैसी ख़बरों की बात कर रहे हैं, उनकी जगह नहीं रही. आप ही नहीं, बहुत-सी जगहों पर इस बात को लेकर हताशा देखता हूं. यह अब ठीक नहीं होगा. बीच-बीच में कोई रिपोर्टर कहीं जाकर स्टोरी कर लाएगा, लेकिन अब यह मान लेना चाहिए कि न्यूज़ चैनल दूरदराज़ के इलाकों के लिए नहीं हैं. वे सिर्फ दिल्ली की बात आप पर थोप रहे हैं.

सवाल

क्या मीडिया कठुआ की पीड़ित बच्ची को इंसाफ दिला पाएगा...?

Md shakib
जवाब

@Md shakib इंसाफ़ दिलाना मीडिया का काम नहीं है. पुलिस और अदालत में भरोसा रखना चाहिए. मीडिया बस ईमानदारी से नज़र रखे, बहुत है. आप देखा ही कि कैसे 'दैनिक जागरण' नाम के एक बड़े अख़बार ने लिख दिया कि कठुआ में लड़की के साथ बलात्कार ही नहीं हुआ. मीडिया यह भी कर सकता है. उससे आप इंसाफ की उम्मीद ही क्यों करें.

सवाल

मुद्दा-आधारित राजनीति हमेशा ही धार्मिक राजनीति से हार क्यों जाती है...? आपने लोगों की समस्याओं पर कई सीरीज़ कीं, आपने बहुत करीब से जाना भी कि लोगों की कितनी समस्याएं हैं, लेकिन क्या ये मुद्दे राजनीतिक दलों को डराते हैं...? क्या लोग वोट देते वक्त इन मुद्दों को याद रखते हैं...? धार्मिक राजनीति को कैसे हराया जा सकता है...?

Mohd Mukhtar
जवाब

@Mohd Mukhtar वोटर को भी हंगामे वाले मुद्दे पसंद हैं. मतदाताओं का बहुत ही छोटा-सा समूह मुद्दों पर अड़ा रहता है, लेकिन बड़ा समूह उन्ही फालतू बातों में फंसा रहता है, जो टीवी से उन्हें मिलता है. धार्मिक राजनीति को आसानी से हराया जा सकता है. कैसे हराया जा सकता है, इसका जवाब यहां बहुत लंबा हो जाएगा.

सवाल

सर, सरकारी नौकर, नेता, सांसद, मंत्री - सभी की तनख्वाह बढ़ती जा रही है, लेकिन आज भी भारतवर्ष में प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड की तनख्वाह के बारे में कोई नहीं सोचता... उनका शोषण आज भी हो रहा है, कुछ उनके बारे में भी सोचिए...

RANJEET SINGH
जवाब

@RANJEET SINGH रंजीत जी, प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड का बहुत शोषण हो रहा है. इनकी बात कोई नहीं करेगा. जब गार्ड खुद ही अपनी सैलरी की बात नहीं करेंगे, तो दूसरे क्यों करेंगे. सांसद भी क्यों बात करेंगे. उनका काम चल जाता है. आप धर्म और जाति के नाम पर वोट दे ही देंगे, तो आपके लिए लड़ने की ज़रूरत क्या है. इसलिए अगर आपको यकीन है कि आपका शोषण हो रहा है, तो लड़ाई आप करेंगे. आपके बदले दूसरा नहीं करेगा.

सवाल

रवीश जी, मैंने आपकी यूनिवर्सिटी और नौकरी सीरीज़ देखी हैं और आप सही कहते हैं कि आज के युवा की राजनैतिक समझ निचले दर्जे की है और उनके लिए खबर केवल व्हॉट्सऐप है, लेकिन ऐसा क्या किया जाए कि उनकी इस दृष्टि को बदला जा सके?

shashi kant
जवाब

@shashi kant , प्रयास करते रहिए. इसके लिए आप सभी को मेहनत करनी होगी. कई माध्यमों से जानकारी लीजिए. हर ख़बर को ध्यान से पढ़िए और जो भी जानिए, दूसरों को बताइए.

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