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आपके सवाल, रवीश के जवाब

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना, हिन्दी मेरी जान, भोजपुरी मेरा ईमान.

सवाल

सर, सरकारी नौकर, नेता, सांसद, मंत्री - सभी की तनख्वाह बढ़ती जा रही है, लेकिन आज भी भारतवर्ष में प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड की तनख्वाह के बारे में कोई नहीं सोचता... उनका शोषण आज भी हो रहा है, कुछ उनके बारे में भी सोचिए...

RANJEET SINGH
जवाब

@RANJEET SINGH रंजीत जी, प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड का बहुत शोषण हो रहा है. इनकी बात कोई नहीं करेगा. जब गार्ड खुद ही अपनी सैलरी की बात नहीं करेंगे, तो दूसरे क्यों करेंगे. सांसद भी क्यों बात करेंगे. उनका काम चल जाता है. आप धर्म और जाति के नाम पर वोट दे ही देंगे, तो आपके लिए लड़ने की ज़रूरत क्या है. इसलिए अगर आपको यकीन है कि आपका शोषण हो रहा है, तो लड़ाई आप करेंगे. आपके बदले दूसरा नहीं करेगा.

सवाल

रवीश जी, मैंने आपकी यूनिवर्सिटी और नौकरी सीरीज़ देखी हैं और आप सही कहते हैं कि आज के युवा की राजनैतिक समझ निचले दर्जे की है और उनके लिए खबर केवल व्हॉट्सऐप है, लेकिन ऐसा क्या किया जाए कि उनकी इस दृष्टि को बदला जा सके?

shashi kant
जवाब

@shashi kant , प्रयास करते रहिए. इसके लिए आप सभी को मेहनत करनी होगी. कई माध्यमों से जानकारी लीजिए. हर ख़बर को ध्यान से पढ़िए और जो भी जानिए, दूसरों को बताइए.

सवाल

जातिगत आरक्षण के स्थान पर आर्थिक आधार पर आरक्षण क्यों नहीं होना चाहिए, क्या इससे सभी जाति, धर्म, वर्ग के लोगों को फायदा नहीं होगा और आरक्षण के लिए सभी जाति, धर्म, वर्गों की लड़ाई समाप्त हो जाएगी. आपकी क्या राय है?

vishwa mohan pareek
जवाब

@Vishwa Mohan Pareek , क्या समाज में जातिवाद ख़त्म हो गया है?

सवाल

आप अमेरिका गए थे. आपको क्या लगता है, भारत में पिछले कुछ सालों से जो हो रहा है, उससे भारत बदनाम हो रहा है या यहां का लोकतंत्र, या फिर यहां का युवा?

पंकज पारीक
जवाब

@पंकज पारीक , आपका सवाल बेतुका है. अमेरिका से कोई भी भारत के भीतर कही गई बातों को सर्च कर पढ़ सकता है. भारत की बदनामी इसलिए नहीं होगी कि बाहर किसी ने बता दिया, सुनने वाले वैसे ज़्यादातर भारतीय ही थे. सबको पता है कि भारत में मीडिया की क्या हालत है. प्रधानमंत्री बाहर के देशों में जाकर विपक्ष के बारे में क्या-क्या कहते हैं. इससे भारत की बदनामी नहीं होती है.

सवाल

आपको नहीं लगता कि हमारा समाज अभी सोशल मीडिया के लिए तैयार ही नहीं था, जैसे कि फेसबुक / व्हॉट्सऐप / ट्विटर इत्यादि? बाकी किताबों और प्रिंट मीडिया और टीवी में तो कम से कम कुछ फिल्टर होता है.

ek khalilabadi
जवाब

@Altaf Ahmad Khan , दुनिया का कोई भी समाज सोशल मीडिया के लिए तैयार नहीं था. टेक्नोलॉजी कई बार अचानक आकर सब कुछ बदल देती है. जिन समाजों में इनका विस्तार है, वहां भी उसी तरह के धोखे हो रहे हैं, जिस तरह के भारत में हो रहे हैं. फिल्टर होना चाहिए.

सवाल

सर, क्या 2019 का चुनाव हिन्दू, मुस्लिम, जाति के आधार पर लड़ा जाएगा या विकास के नाम पर, जैसा हमें चार साल पहले सपने दिखाए गए थे?

Imran
जवाब

@Imran , 2019 का चुनाव भारत के इतिहास में सबसे अधिक झूठ बोले जाना वाला चुनाव होगा. जो ज़्यादा झूठ बोलेगा, वह उतना सफल होगा. जनता इतनी झूठ और अफवाहों से घिर जाएगी कि उसी को सत्य मान लेगी. 2018 का साल जिस रास्ते से 2019 की तरफ जा रहा है, उससे तो यही लगता है कि हिन्दू-मुस्लिम एक बड़ा मुद्दा बनाया जाएगा. इसके अलावा जनता के सामने जाने के लिए कोई मुद्दा नहीं है. यही वह मुद्दा है, जिससे जनता के सवालों से बचा जा सकता है.

सवाल

सर प्लीज़, एक सीरीज़ अस्पतालों और दवाओं के खेल को दुनिया के सामने लाने के लिए कीजिए.

आदित्य कुमार
जवाब

@आदित्य कुमार , अस्पताल और दवाओं के खेल पर सीरीज़ करना चाहता हूं, पर आप जानते हैं कि इन सबके लिए बड़ी टीम की ज़रूरत होती है और संसाधनों की भी. इनके बिना मैं बहुत कुछ नहीं कर पाता हूं. इसलिए इस पर कई साल से किताबों को जमा कर रहा हूं, मगर अफसोस नहीं कर पाया. फिर भी प्राइम टाइम में कई एपिसोड तो किए ही हैं.

सवाल

आज के दौर में जहां भारत को एक युवा देश का दर्जा दिया जाता है, वहीं देश की सरकार देश के युवा को हिन्दू-मुस्लिम दंगे में झोंकने का काम कर रही है. इस वर्तमान स्थिति को देखते हुए भविष्य के भारत का राजनीतिक स्तर कैसे ऊपर उठाया जा सकता है? आज का युवा जो हिन्दू मुस्लिम जैसे मुद्दों में उलझा हुआ है, क्या वो एक मजबूत एवं संगठित भारत की नींव रख पाएगा?

अंकित यादव
जवाब

@अंकित यादव , युवाओं को हिन्दू-मुस्लिम डिज़ाइन को समझना होगा, वर्ना नेताओं के चक्कर में हर घर में एक दंगाई हो जाएगा. हिन्दू-मुस्लिम का विवाद आपको भीड़ में बदलना चाहता है. हिंसक भीड़ में किसी की हैसियत नहीं होती. उसका चरित्र लोकतांत्रिक नहीं होता है. आपकी नागरिकता समाप्त हो जाती है, निलंबित हो जाती है. इसलिए जो भी बहस आपको हिंसक भीड़ के लिए ले जाए, उससे दूर रहिए. वर्ना अपने माता-पिता से पूछिए कि एक नेता के शौक के लिए क्या हम हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर दंगाई बन जाएं? उनका जवाब मुझे बताइएगा.

सवाल

रवीश जी नमस्कार, केवल एक प्रश्न है कि आप वो पुराना वाला प्राइम टाइम कब से करेंगे, जिसमें डिबेट होती थी, आप बहुत ही खूबसूरती से सवाल पूछते थे, सभी पार्टी के प्रवक्ताओं से. आप शायद ही मानें, मैंने कई ज़रूरी काम छोड़े थे आप के प्राइम टाइम को देखने के लिए. कृपया उसी ज़ज़्बे को फिर से वापस लाएं और क्योंकि आप के शो में बहस का एक स्तर होता था, अब वो गायब हो गया है, किसी भी चैनल में वह बात नहीं है. इसी बात को लेकर मैं आप से मिलने दिल्ली आने वाला था, पर अच्छा हुआ कि आपने खुद ही पूछ लिए. बहुत बहुत धन्यवाद.

मधुशील शुक्ल
जवाब

@मधुशील शुक्ल , मधुशील जी, बीजेपी के प्रवक्ता दो साल से शो में नहीं आ रहे हैं. जहां जाते हैं, वहां भी तू-तू मैं-मैं ही करते हैं. इस तरह के कार्यक्रम को आप समझिए. ये डिज़ाइन है आपको खबरों से दूर करने की, खबरों के नाम पर सिर्फ धारणाओं के खेल में फंसाने की. ये लोग मेरा बहिष्कार न करते तो मैं यूनिवर्सिटी सीरीज़ नहीं कर पाता, न ही नौकरी सीरीज़. बहस के कार्यक्रम मैंने भी किया है, कुछेक को छोड़ दें तो बकवास ही होता है. आप देखिए, कोई भी प्रवक्ता बहस को समृद्ध करने के लिए हिस्सा नहीं लेता, दूसरे की गलती साबित करने के लिए आता है. जवाब भी नहीं देता और सही सवाल पूछ देने पर तुनक जाता है, इसलिए मैं यही दुआ करता हूं कि डिबेट जैसा बकवास शो करने का मौका न मिले और आप भी ऐसे कार्यक्रमों से दूर रहे हैं, जहां हर बात फर्ज़ी साबित कर दी जाती है.

सवाल

सोने से पहले मैं रोज प्राइम टाइम देखता हूं, बेचैनियों से भर जाता हूं, अपने वजूद से टकराने लगता हूं, सब कुछ बदल देना चाहता हूं, पर फिर सो जाता हूं, सुबह उठता हूं, दफ्तर चला जाता हूं, मेरे भीतर का क्रांतिकारी यहां रोज जन्मता और मरता है, कुछ भी नहीं बदल रहा हूं, न कुछ बदल रहा है. इस कुचक्र से बाहर निकलने का क्या रास्ता है?

Rajdeep Singh Parihar
जवाब

@Rajdeep Singh Parihar , राजदीप जी, मैं भी इन बेचैनियों से गुज़रता हूं. हर दिन लगता है कि अब टीवी बहुत हो गया. फिर करना पड़ता है. इस कुचक्र से निकलने का रास्ता पता नहीं, मगर इस कुचक्र से लड़ने का तरीका पता है, जो मैं कर रहा हूं.

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