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आपके सवाल, रवीश के जवाब

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना, हिन्दी मेरी जान, भोजपुरी मेरा ईमान.

सवाल

रवीश जी, जब सब कुछ प्राइवेट हो रहा है और सरकार भी अपना सब कुछ प्राइवेट पार्टनरशिप से काम कर रही है तो चुनावों का क्या महत्व रह जाएगा? हम लोग सरकार किस लिए चुनेंगे, क्या केवल कुछ लोगों के ऐशो-आराम और उनके चहेतों के स्टेटस को बढ़ाने के लिए या समाज और सभी वर्गों के विकास के लिए, जो कि हो नहीं रहा है?

NARENDER SINGH
जवाब

@NARENDER SINGH मेरी राय में वक्त आ गया है कि निजीकरण की सार्वजनिक समीक्षा की जानी चाहिए. निजीकरण के कारण ज़रूर समाज के एक हिस्से को लाभ हुआ, मगर देखना चाहिए कि बाकियों को क्यों नहीं हुआ. हमारे देश में सामाजिक सुरक्षा बहुत ही खराब हालत में है. न सरकारी अस्पताल ठीक है, न प्राइमरी शिक्षा. सिर्फ बीमा देकर आप सामाजिक सुरक्षा नहीं दे सकते. आखिर जो भी नीति चल रही है, उसकी रिपोर्ट तो यही कहती है कि आबादी का एक प्रतिशत ही लाभान्वित हो रहा है. क्या इस व्यवस्था में कोई खामी है, क्या इसे दूर किया जा सकता है, क्यों कोई दूसरी व्यवस्था दिमाग़ में है, इन सब बातों पर बहस होनी चाहिए.

सवाल

साम्प्रदायिकता के विषय पर कठोर कानून बनाने के बारे में सकारात्मक बहस क्यों नहीं हो रही है? अगर हो भी रही है, तो इसका असर क्यों नहीं हो रहा है?

OM PRAKASH YADAV
जवाब

@OM PRAKASH YADAV क्या कानून बनाने से सांप्रदायिकता रुक सकती है? कानून तो अभी भी हैं, मगर मान कौन रहा है. सबको पता है कि हमारे देश में जांच होने में ही 10 साल लग जाते हैं, सज़ा मिलते-मिलते मामला कुछ और हो जाता है. एक-दो अपवादों में सज़ा मिलती है, तो हम सिस्टम में अपने विश्वास का जश्न मनाने लगते हैं. कानून तो है, मगर हिंसा रोकने के लिए सिस्टम नहीं है. सिस्टम भी कहने के लिए है, मगर वह खोखला है. एक मंत्री एक सांसद के आगे झुक जाता है. सारा सिस्टम आम आदमी को दबाने-कुचलने में ही अपनी बहादुरी दिखाते रहता है.

सवाल

अनुसूचित जाति / जनजाति एक्ट के बाद दोस्तों में बंटवारा हुआ है, उसकी सोशल मीडिया पर एक कैम्पेनिंग हुई है, इसको कैसे रोकें?

Vikas meena
जवाब

@vikas meena जो लोग दावा कर रहे हैं कि एससी / एसटी एक्ट झूठे तरीके से लगाया जाता है, उन्हें तथ्य देखने चाहिए. सरकार के तथ्य इसकी पुष्टि नहीं करते. आतंकवाद के मामले में भी बहुत-से लोग छूट जाते हैं, तो क्या वे कानून की प्रक्रिया में छूट चाहेंगे. एससी / एसटी मामले में सज़ा की दर बहुत कम है, जबकि चार्जशीट दायर करने की दर 70 फीसदी से ज्यादा. दलितों के खिलाफ हुए नरसंहार के मामले में कम ही में सज़ा होती है. हर दिन दलितों के प्रति जातिगत हिंसा बढ़ रही है. हमें इससे नाराज़ होना चाहिए कि आज भी जातिगत हिंसा क्यों हो रही है. क्यों हमारे समाज में एक दलित को घोड़ा खरीदने पर मार दिया जाता है, एक दलित को ठाकुरों के मोहल्ले से बारात ले जाने के लिए कोर्ट जाना पड़ता है. इस पर नाराज़गी होगी, तो हम एक दूसरे को बेहतर तरीके से समझेंगे. गलत तथ्यों से कुछ नहीं होने वाला. आपको पता है कि भारत में पेंसिल चोरी की एफआईआर मुश्किल होती है. अब अगर इसकी प्रक्रिया को जटिल करेंगे तो जातिगत हिंसा के मामले में शुरुआती इंसाफ भी नहीं मिलेगा. क्या आप एसएसपी पर इतना भरोसा करते हैं, अपवाद को छोड़ दें तो कभी आपने एसएसपी को देखा है सत्ता से अलग हटकर कानून के हिसाब से काम करते हुए. फिर जो किसी के खिलाफ झूठा या द्वेषपूर्ण केस करता है, उसके खिलाफ मुकदमा करने का कानून में प्रावधान है. दिक्कत है कि सारे प्रावधानों के रहते किसी को समय से इंसाफ नहीं मिलता.

सवाल

ऐसा क्यों है कि पत्रकार सिर्फ नेताओं की खिलाफत करते हैं, जबकि implementation की जिम्मेवारी अफसरों की होती है? नेताओं को तो हम 5 साल में बदल देते हैं, इसलिए सिस्टम में कोई बदलाव नहीं आता. अफसर पब्लिक से मीटिंग करते हैं और जो वहां पर बोलते हैं, अगले दिन न्यूज़ में वैसा कुछ नहीं होता. मीटिंग के बाद पत्रकार अकेले में बात करते हैं और फिर छापा जाता है.

अमित गोयल
जवाब

@Amit goel वह इसलिए, क्योंकि नेता को पब्लिक चुनकर भेजती है. उसका काम यह देखना है कि नौकरशाही भ्रष्ट न हो. नौकरशाही के लोग कहते हैं कि नेता ही उन्हें भ्रष्ट होने के लिए मजबूर करते हैं. यह खेल चलता रहता है. मगर यह गलत है कि मीडिया अफसरों की नाकामी को उजागर नहीं करता है. बल्कि आप कह सकते हैं कि मीडिया अब सरकार की नाकामी को उजागर ही नहीं करता है. फिर इस मीडिया से क्या गिला-शिकवा, जो अपना काम ही नहीं करता है.

सवाल

रोज़ शाम हिन्दू-मुस्लिम, भारत-पाकिस्तान, भाजपा-कांग्रेस, जाति-धर्म, यही डिबेट्स. अलग-अलग पत्रकार, परंतु वही विषय, क्या करें, देश टूटने से अच्छा है अपना टीवी ही तोड़ दें. क्या करें सर, राय दें.

Ramesh Godara
जवाब

@Ramesh Godara मेरी साफ राय है. आपको फिर टीवी नहीं देखना चाहिए. कनेक्शन कटवा लें या फिर देखना बंद कर दें. यह ज़हर के अलावा कुछ और नहीं है. इसे देखेंगे, तो आपके भीतर किसी न किसी समुदाय के प्रति नफरत पैदा होगी. मकसद ही यही होता है. अगर राजनीति में आप इस आधार पर फैसला करेंगे, तो अपने लिए नर्क का चुनाव करेंगे. नेता यही चाहता है कि आप हिन्दू मुस्लिम के आधार पर उसका चुनाव करें, उसके काम के आधार पर नहीं. याद रखिएगा, इससे आपके नागरिक अधिकार खत्म होते हैं. धार्मिक अधिकार हमेशा व्यक्तिगत होता है. नागरिक अधिकार संवैधानिक होता है.

सवाल

रवीश सर, समाज के हर वर्ग में इतनी निराशा क्‍यों है?

अनिल गुप्ता
जवाब

@Anil Gupta आम लोगों के पास निराश होने के लिए वक्त नहीं होता. उन्हें हर दिन शाम के लिए दो रोटी का इंतज़ाम करना होता है. फिर भी निराशा के कई कारण हैं. जीवनशैली उनमें से एक है. फिर भी बहुत से लोग मस्त हैं. खा-पी रहे हैं. बर्थडे मना रहे हैं. डांस कर रहे हैं. वे इतने अबोध हैं कि पता ही नहीं चल रहा है कि वे कहां जा रहे हैं.

सवाल

समाज को सुधारने के लिए क्या करना चाहिए? समाजसेवा, पत्रकारिता, या राजनीति?

Mohammed Ibrahim Ahmed
जवाब

@Mohammed Ibrahim Ahmed आप जो भी काम करें, मेहनत और ईमानदारी से करें. उसका पैमाना ऊंचा करें, ताकि कई लोग उसका अनुकरण करें. ऐसा काम बिल्कुल न करें, जो समाज में मोहब्बत न फैलाए.

सवाल

आप भारतीय मीडिया और राजनीति को अगले पांच साल बाद कहां और किस रूप में देखते हैं?

शिवेंदु माधव
जवाब

@शिवेंदु माधव , पांच साल का कौन बता सकता है, मगर इतना ज़रूर लग रहा है कि अगस्त, 2018 के बाद जब 2019 के चुनावी माहौल में मीडिया प्रवेश करेगा, तब अप्रत्याशित रूप से झूठ फैलाएगा. अगला चुनाव भारत के इतिहास में सबसे ज़्यादा झूठ बोले जाने वाला चुनाव होगा. इसे कोई ठीक नहीं कर सकता. कई पत्रकार इस झूठ का पर्दाफाश कर रहे हैं, मगर वे काफी नहीं हैं. जनता के लिए चुनौती है कि क्या वह इस झूठ को समझ पा रही है.

सवाल

रवीश जी, क्या आपको लगता है कि इस बदलते हुए दौर में पत्रकारिता का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है? आज जर्नलिज़्म के हर कॉलेज और इंस्टीट्यूट से निकलकर युवा पत्रकार नहीं, बल्कि एक कन्टेंट जेनरेट करने वाली मशीन बनते जा रहे हैं? जिन युवा पत्रकारों को समाज में फैले भ्रष्टाचार, नेताओं की चालबाजी और समस्याओं को बताना चाहिए, वे किसी वेबसाइट या फिर पोर्टल के लिए 10-12 खबरों का टारगेट पूरा करने में जुटे हैं. आपसे सिर्फ यही पूछना है कि क्या मीडिया इंडस्ट्री की नई चमक इन्हें वहां जाने पर मजबूर कर रही है, या फिर इसके पीछे कोई और कारण है. मुझे लगता है कि पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हजारों छात्रों के लिए इन सवालों के जवाब जरूरी हैं.

मुकेश
जवाब

@मुकेश , पत्रकारिता काफी बदल गई है. आप खुद ही चैनल खोल लें, तय करें कि कौन सा चैनल पत्रकारिता कर रहा है. पत्रकारिता का मॉडल ध्वस्त हो गया है. इस देश में पत्रकारिता की पढ़ाई पर पांच रुपये भी खर्च नहीं करना चाहिए. ज़्यादातर जगहों में योग्य शिक्षक नहीं हैं. कुछ सरकारी कालेज में हैं, तो वहां ज़रूर पढ़िए. कम से कम पैसा डूबने का अफसोस नहीं रहेगा और अगर किस्मत से अच्छे शिक्षक मिल गए तो समझिए लाटरी निकल गई. बहुत से सरकारी पत्रकारिता के विश्वविद्यालय हैं, भारत में जिनमें मेरी व्यक्तिगत आस्था नहीं है. मैं होता तो वहां पढ़ने नहीं जाता. प्राइवेट संस्थानों का भी वही हाल है. संस्थान कम, दुकान ज़्यादा हैं.

सवाल

नकारात्मक माहौल में सकारात्मक तथा न्यायपूर्ण आचरण / व्यवहार बनाए रखने के लिए आप क्या करते हैं, क्या आपको कभी लगा कि आपमें भी नकारात्मकता आ गई हो या आप अकेले पड़ गए हों? आपको देख कर पत्रकारिता पर विश्वास बना रहता है. आपकी लम्बी आयु की कामना करता हूं. धन्यवाद!

jeetendra singh
जवाब

@jeetendra singh , मुझमें नकारात्मकता नहीं है. चूंकि सरकार के झूठ को पकड़ लेता हूं, तो आपको लगता होगा. ज़रूर निराश होता हूं. यह एक सामान्य मानवीय प्रक्रिया है. मैं किताबें पढ़ता हूं. नई जानकारियां हासिल करता हूं और ज़मीन पर रहता हूं.

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