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आपके सवाल, रवीश के जवाब

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना, हिन्दी मेरी जान, भोजपुरी मेरा ईमान.

सवाल

क्या आज के वक्त में हम दिखावे की राजनीति से ऊपर उठकर सामाजिक सरोकार की राजनीति कर पाएंगे, जैसी नेहरू, पटेल, गांधी के समय के नेता किया करते थे...? अगर हां, तो उसका रास्ता क्या होगा...?

रवि राज
जवाब

@रवि राज , हमारी राजनीति फटीचर हो चुकी है. जो जितना झूठ बोलेगा, कुतर्क करेगा, वही कामयाब होता रहा है. लेकिन हमारी राजनीति की एक खूबी और है. वह जब भी फटीचर होती है, ख़ूबसूरत होने का रास्ता खोजने लगती है. वक्त लग जाता है, मगर कब तक आप गाली-गलौज की राजनीति करेंगे और मीडिया के ज़रिये प्रोपेगैंडा की राजनीति झेलेंगे. मुझे नहीं लगता कि आप इसे और झेल पाएंगे.

सवाल

राम मंदिर का झगड़ा कब खत्म होगा...?

Md Sufyan
जवाब

@Md Sufyan , राम मंदिर का झगड़ा राम मंदिर तक ही सीमित नहीं है. झारखंड के पाकुड़ में जब लोग स्वामी अग्निवेश को लात-घूंसों से मार रहे थे, तब 'जय श्री राम' का नारा लगा रहे थे. वहां तो कोई मंदिर का मसला नहीं था. क्या राम का नाम किसी बुज़ुर्ग को मारने के लिए लिया जाना चाहिए...?

सवाल

चुनाव का मौसम आने वाला है, सो, इस मौके पर कोई ऐसा कार्यक्रम क्यों न चलाया जाए, जिससे लोगों में आपस में भाईचारा बढ़े, नफरत नहीं...?

Azaz Anjum
जवाब

@Azaz Anjum , अंजुम जी, चुनाव नहीं भी होता है, तब भी हम ऐसे ही कार्यक्रम चलाते हैं, जिनसे मोहब्बत बढ़े और उन्माद में लोग भीड़ का हिस्सा न बनें. यह काम रोज़ का है.

सवाल

क्या आर्दशवाद कोरी कल्पना है...?

अक्षय शर्मा
जवाब

@अक्षय शर्मा , अक्षय, आदर्शवाद बिल्कुल कोरी कल्पना नहीं है. ज़रा-सा निश्चय हो और ईमानदार बने रहने की कोशिश जारी रहे, तो इस पर चला जा सकता है. इसके बिना कोई जी भी कैसे सकता है.

सवाल

सर, हमारे देश से भ्रष्टाचार कैसे खत्म हो सकता है...?

umashankar kumar
जवाब

@umashankar kumar , हमारे देश से भ्रष्टाचार कभी ख़त्म नहीं होगा. न मेरे जीवनकाल में, न आपके जीवनकाल में. हमारी राजनीति भ्रष्ट पैसे से चलती है और चलती रहेगी. समाज भी इसे पालता-पोसता है. जैसे दहेज लेना, किसी की संपत्ति हड़पना, किसी को रिश्वत देना. यह सब आम है. हमें लगातार लड़ते रहना है. पहले यह थमेगा, फिर कम होगा और फिर शायद ख़त्म भी होने लगे.

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