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आपके सवाल, रवीश के जवाब

प्राइम टाइम एंकर, तीन बार रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित, 20 साल की पत्रकारिता, ब्लॉगर, फेसबुक पेज @RavishKaPage, ट्विटर @ravishndtv, लेखक - The Free Voice, इश्क़ में शहर होना.

सवाल

सर, जनता इस चुनाव में किस मुद्दे पर वोट करे...? देश में इस समय बेरोज़गारी बहुत बढ़ी हुई है, लेकिन किसी भी प्लेटफॉर्म पर इसे बड़े मुद्दे के रूप में प्रोजेक्ट नहीं किया जा रहा... इसके अलावा सभी चीज़ों पर बहस हो रही है, और मीडिया में गिनती के ही लोग हैं, जो इसे मुद्दा मान रहे हैं...

राकेश कुमार
जवाब

@राकेश कुमार , क्या बेरोज़गार चाहते हैं कि वही मुद्दा हो...? वे चाहते, तो ज़रूर नेता मजबूर होते बेरोज़गारी पर बोलने के लिए.

सवाल

क्या आज की तारीख में मीडिया पर विश्वास किया जा सकता है...?

आलोक
जवाब

@आलोक , मैं मीडिया के सीमित हिस्से पर ही विश्वास करता हूं. 90 प्रतिशत मीडिया 'गोदी मीडिया' हो गया है और भारत के लोकतंत्र को बर्बाद करने पर तुला है. जो ठीक मीडिया है, उनके यहां भी कई समस्याएं हैं, इसलिए मीडिया को ध्यान से देखिए, विश्वास से नहीं.

सवाल

रवीश जी, नमस्कार... भारतीय लोकतंत्र को बचाने में आम नागरिक क्या योगदान कर सकते हैं, जब सारे राजनैतिक दल एक ही अवधारणा पर काम कर रहे हैं - भारतीय को भारतीय से लड़ाना...

कमलेश पान्डे
जवाब

@कमलेश पान्डे , कमलेश, यह तभी संभव होगा, जब जनता सवाल करेगी. सवाल करने के लिए सूचनाओं को महत्व देगी. आज सारे दल बिज़नेस घरानों के लिए काम करने लगे हैं, उन्हीं के इशारे पर चलते हैं. जनता को बिज़नेस की खबरों को ध्यान से पढ़ना चाहिए. प्रोपेगैंडा को समझना चाहिए.

सवाल

एग्ज़िट पोल पर आपके क्या विचार हैं...? ये भी तो एक 'फेक' माहौल बनाते हैं...

Mohd Quasim
जवाब

@Mohd Quasim , एग्ज़िट पोल और ओपिनियन पोल कौन करता है, कैसे करता है, इस पर उसकी विश्वसनीयता निर्भर करती है. मैं इन सबमें विश्वास नहीं रखता. इनके कारण मुद्दे खत्म हो जाते हैं. बहुत ज़्यादा चर्चा होती है इनकी. पूरा चुनाव सर्वे बनकर रह जाता है. यह अच्छा नहीं है. जीतना तो है ही किसी न किसी को, मगर बात इस पर होनी चाहिए कि क्यों जीतना है.

सवाल

क्या NDA सरकार ने पांच वर्ष के कार्यकाल में 'सबका साथ, सबका विकास' नारे को सही मायने में चरितार्थ किया है...?

राज बहादुर
जवाब

@राज बहादुर , NDA का दावा है कि सबका किया है. असलियत कुछ और है. विकास हुआ होता, तो इस चुनाव में 'स्किल इंडिया' और 'मेक इन इंडिया' के नतीजे रैलियों में लहराए जाते. उन सब पर कहीं कोई बात नहीं है. तब दावे किए जाते थे कि पलायन रुकेगा, एक भी पलायन नहीं रुका है. इस वक्त चुनाव हो रहा है, और बिहार के सहरसा ज़िले से मज़दूरों का पलायन जारी है.

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