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मूवी रिव्यू

  • वास्तविकता और कल्पना के बीच उलझाती है 'सत्याग्रह'
    क्लाइमैक्स की तरफ जाते हुए कहानी थोड़ी सी डगमगाती है... और वहां दर्शक वास्तविकता और कल्पना के बीच में उलझ जाते हैं।
  • मद्रास कैफे : मौजूदा चलन से हटकर एक फिल्म
    'मद्रास कैफे' हिन्दी फिल्मों के मौजूदा चलन से अलग हटकर है, जो एक ताजा झोंके की अहसास कराती है। फिल्म की टीम ने एक तेज धार पर चलते हुए भी इसे किसी भी तरह गिरने या झुकने नहीं दिया है। फिल्म के सारे एक्टर असली लगते हैं।
  • कमजोर कहानी और अभिनय की मारी 'वंस अपॉन...'
    'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई दोबारा' रिलीज़ हुई है इस गुरुवार को। यह कहानी है गैंगस्टर सोहेब यानी अक्षय कुमार की जो अपने दुश्मन रवैल से बदला लेने मुंबई पहुच जाता है पर यहां वह गिरफ़्तार हो जाता है जैसमीन यानी सोनाक्षी सिन्हा के इश्क में जो फिल्मों में हीरोइन बनने की ख्वाहिश रखती है।
  • 'मास एंटरटेनर' है 'चेन्नई एक्सप्रेस'...
    'चेन्नई एक्सप्रेस' का मकसद है, लोगों को एंटरटेन करना, जिसमें यह फिल्म कामयाब रही है, यानि यह 'मास एंटरटेनर' फिल्म है... फिल्म में काफी जगह अच्छी कॉमेडी और अच्छे सीन हैं...
  • हर नजरिये से कमज़ोर है 'इसक'
    लेकिन इसकी जो बातें पसंद आईं, वे हैं सचिन−जिगर का संगीत, और रवि किशन का अभिनय... इन दोनों पहलुओं के अलावा फिल्म मनोरंजन कतई नहीं कर पाई...
  • 'बजाते रहो' में ढूंढते रह जाओगे कॉमेडी
    फिल्म में उतनी ही कॉमेडी है, जितनी प्रोमो में दिखाई गई। कहानी, स्क्रिप्ट, स्क्रीनप्ले, गीत-संगीत सभी पक्ष कमजोर हैं।
  • जिंदगी को अलग नजरिये से देखती है 'शिप ऑफ थीसस'
    जो लोग फिल्म में कुछ ढूंढने की कोशिश करते हैं, या ऐसी फिल्म देखने की शौकीन हैं, जो दुनिया में उथल-पुथल मचा दे, यह फिल्म उनके लिए है।
  • 'डी डे' के कुछ सीन्स नहीं होते हजम
    'डी डे' कहानी है, एक मोस्ट वांटेड अपराधी को पाकिस्तान से हिन्दुस्तान लाए जाने की, जिसकी जिम्मेदारी ली है हिन्दुस्तानी इंटेलिजेंस एजेंसी रॉ ने।
  • प्रेरणाभरी कहानी है 'भाग मिल्खा भाग'
    फिल्म में अच्छाइयां बहुत हैं... पहले नंबर पर है फरहान की एक्टिंग, फिर बिनोद प्रधान की बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी, फिर 'अलिफ अल्लाह...' और 'हवनकुंड...' जैसे जुबान पर चढ़ने वाले गाने...
  • 'लुटेरा' : उम्दा निर्देशन, बेहतरीन एक्टिंग
    'लुटेरा' आपके दिल को छू जाएगी। इसमें सोनाक्षी की झकझोर देनी वाली परफॉर्मेंस है और रणवीर सिंह ने भी अपना किरदार बखूबी संभाला है।
  • अच्छी साइको-थ्रिलर है 'द सेन्ट हू थॉट अदरवाइज़'
    फिल्म की कहानी अच्छी और अलग है... कैमरे का इस्तेमाल भी ढंग से किया गया है... कुछ मिलाकर डायरेक्टर अमोल शेटगे का काम अच्छा रहा...
  • एक्शन से भरपूर 'एनेमी' की कहानी है कमजोर
    'एनेमी' को देखकर ऐसा लगता है कि फिल्म सिंगल स्क्रीन के लिए बनाई गई है और शायद वही दर्शक इस फिल्म की तरफ रुख भी करें।
  • 'रांझना' : दिल को छूती है यह मासूम मोहब्बत
    प्यार में लड़की का दिल जीतने की कोशिश, उसका पीछा करना, लड़की के घर के बाहर चक्कर लगाना और हाथ की नसें काटना ये सब कुछ फिल्म 'रांझना' में दिखेगा।
  • सच्चाई से रू-ब-रू कराती है 'अंकुर अरोड़ा मर्डर केस’
    डॉ. अस्थाना इस बात से वाकिफ हैं कि अंकुर ऑपरेशन से पहले बिस्किट खा चुका है, पर अपनी व्यस्तता के कारण डॉक्टर ये भूल जाते हैं और ऑपरेशन कर डालते हैं।
  • हंसा-हंसा कर लोटपोट कर देगी 'फुकरे'
    पैसे का जुगाड़ करने के लिए ये फंस जाते हैं, ऋचा चड्ढा के जाल में और फिर ये चारों उससे कैसे निकलते हैं, यह आप फिल्म देखकर ही जानिए।
  • पहली के मुकाबले कमज़ोर है 'यमला पगला दीवाना 2'...
    दरअसल, 'यमला पगला दीवाना 2' की कहानी काफी कमज़ोर है और आपको हंसा पाने में शायद नाकाम रहे... 'यमला पगला दीवाना' की कहानी में किरदार बहुत अच्छी तरह गूंथे गए थे, और वन-लाइनर्स भी अच्छे थे, लेकिन 'यमला पगला दीवाना 2' के वन-लाइनर्स आपको नहीं गुदगुदाएंगे...
  • कोई कहानी नहीं, फिर भी मनोरंजक है 'यह जवानी है दीवानी'...
    अगर फिल्म में दीपिका पादुकोण और रणबीर कपूर न होते तो इसका भविष्य डांवाडोल होता... खैर, फिल्म देखिए, क्योंकि इसमें आपको कहानी भले न मिले, लेकिन मनोरंजन ज़रूर मिलेगा...
  • औरंगजेब : अच्छी कहानी, बेहतरीन अभिनय
    डायरेक्टर अतुल ने '70 के दशक की फिल्मों का फार्मूला नए ढंग से पेश किया है, जिसके चलते 'औरंगज़ेब' कहीं आपको 'त्रिशुल' लगती है तो कहीं 'डॉन', पर स्क्रीन प्ले आपको बांधे रखता है।
  • दर्शकों को 'जॉम्बीज' से मिलाती है 'गो गोवा गोन'
    फिल्म में कुणाल के वन लाइनर्स हंसाते हैं। आनंद तिवारी, जो बनी के किरदार में हैं, उनका भी जबरदस्त अभिनय है। वीरदास का काम ठीक है, वहीं पूजा और सैफ के पास ज्यादा कुछ करने को नहीं दिखता।
  • गिप्पी : कहानी बच्चों की, संदेश बड़ा
    यह फ़िल्म देखकर आप शायद अपने बचपन में लौट जाएं। फ़िल्म और उसके किरदारों की सादगी आपको हंसाएगी भी और यादों के सफ़र पर भी ले जाएगी...
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