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'पदयात्रा' से गिरती बनती है आंध्र प्रदेश की सरकार, अब नायडू के खिलाफ जगनमोहन रेड्डी तैयार

आंध्र प्रदेश की राजनीति में पदयात्राओं का एक पुराना इतिहास रहा है और राजनीतिक पदयात्राओं ने हर समय सत्ता को बदलने का काम किया है.

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'पदयात्रा' से गिरती बनती है आंध्र प्रदेश की सरकार, अब नायडू के खिलाफ जगनमोहन रेड्डी तैयार

जगनमोहन रेड्डी (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. पदयात्रा से गिरती बनती है आंध्र प्रदेश की सरकार
  2. जगनमोहन रेड्डी सबसे लंबी व सबसे बड़ी राजनीतिक पदयात्रा कर रहे हैं
  3. माना जा रहा है कि जगनमोहन रेड्डी इस बार सरकार बनाने में कामयाब होंगे
नई दिल्ली: आंध्र प्रदेश की राजनीति में पदयात्राओं का एक पुराना इतिहास रहा है और राजनीतिक पदयात्राओं ने हर समय सत्ता को बदलने का काम किया है. अगर संयुक्त आंध्र के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि यहां भी चंद्रबाबू नायडू की सत्ता को वाईएस राजशेखर रेड्डी की पदयात्रा ने हिला दिया था तो चंद्रबाबू नायडू की दोबारा सत्ता में वापसी पदयात्रा के जरिए हुई थी. अब वाईएस राजशेखर रेड्डी के पुत्र वाईएस जगनमोहन रेड्डी अब तक के राजनीतिक इतिहास की सबसे लंबी व सबसे बड़ी राजनीतिक पदयात्रा कर रहे हैं. 

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वाईएसआर कडपा जिले के पुलिवेन्दुला निर्वाचन क्षेत्र के इडुपुलपाया से 6 नवंबर, 2017 को जब वाईएस जगनमोहन रेड्डी ने 'प्रजा संकल्प यात्रा' शुरू की थी, तो इसको लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे थे. पर जैसे जैसे 100 किमी फिर 1000 किमी और उसके बाद 2000 किमी का पड़ाव पार करते आंध्र प्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर हो गया और चंद्रबाबू नायडू को भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार से अपना नाता तोड़ना पड़ा. अब जब 2500 किमी का आंकड़ा पार करते हुए 3000 किमी पैदल चलने का अपना संकल्प पूरा करने की ओर आगे बढ़ रहे हैं ऐसा लग रहा है कि अगर कोई बड़ा उलटफेर न हुआ तो वाईएस जगनमोहन रेड्डी को अगली सरकार बनाने से कोई नहीं रोक सकता है. 
 
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ऐसा रहा है पदयात्राओं का इतिहास 
पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वाईएस राजशेखर रेड्डी ने 2003 में 'प्रजा प्रस्थान यात्रा' शुरू की थी. 3 अप्रैल 2003 को यह पदयात्रा मौजूदा तेलंगाना प्रदेश के रंगारेड्डी जिले के सूखे की समस्या से प्रभावित चेवेल्ला नामक स्थान से शुरू यह पदयात्रा कुल 1460 किमी तक चली थी. 60 दिनों की पदयात्रा में आंध्र प्रदेश व तेलंगाना के कुल 11 जिलों को कवर किया था. इस यात्रा के दौरान अपने द्वारा उठाए गए मुद्दों से वाईएस राजशेखर रेड्डी लोगों के दिलों में बस गए और 1995 से सत्ता में काबिज चंद्रबाबू नायडू की सरकार को मई 2004 में पलटकर सत्ता हासिल की. 

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इसके बाद चंद्रबाबू नायडू ने 63 साल की उम्र में 2 अक्टूबर 2012 को Vastunna Mee Kosam ( आपके लिए मैं आ रहा हूं) के नारे के साथ अपनी सत्ता को फिर से पाने के लिए राजनीतिक पदयात्रा पर निकले थे. इस समय राज्य का बंटवारा नहीं हुआ था पर आंदोलन चरम सीमा पर था. वाईएस राजशेखर रेड्डी के मौत के बाद पहले के रोसैय्या और फिर किरन कुमार रेड्डी मुख्यमंत्री बनाए गए थे. कांग्रेस की सरकार के खिलाफ पदयात्रा पर निकले चंद्रबाबू ने 117 दिनों तक पदयात्रा की और कुल 2340 किलोमीटर की दूरी कवर की. चंद्रबाबू नायडू ने अपनी पद यात्रा के दौरान तेलंगाना, रायलसीमा, कोस्टल आंध्र और उत्तरी आंध्र के तमाम इलाकों का दौरा करके सरकार को हिला दिया. चंद्रबाबू ने अपनी पदयात्रा एनटी रामाराव के गढ़ हिंदूपुर से शुरू की थी. 

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अबकी बार आंध्रप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और YSR कांग्रेस के नेता वाईएस जगनमोहन रेड्डी अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए चंद्रबाबू नायडू की भ्रष्टाचार बढ़ाने वाली जनविरोधी नीति के खिलाफ सड़कों पर उतरे हुए हैं. उनकी पदयात्रा अब तक ढाई हजार किलोमीटर का सफर पूरी कर चुकी है और लगभग 500 किलोमीटर की दूरी और तय करना है. माना जा रहा है कि यह पदयात्रा एक ऐतिहासिक पदयात्रा बन जाएगी, क्योंकि भारतीय राजनीति के इतिहास में आज तक किसी राजनेता ने अपने प्रदेश में इतनी लंबी पदयात्रा नहीं की और न ही इतनी लंबी दूरी पैदल चलकर कवर की. 
 
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जगनमोहन रेड्डी की जनसभाओं में और पदयात्रा के दौरान आ रही भीड़ को देखते हुए लोग कहने लगे है कि यह एक ऐसी पदयात्रा है जो भूतो न भविष्यति जैसी साबित होगी. दक्षिण भारतीय राजनीति में पकड़ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार के. रामचंद्रमूर्ति का कहना है कि वाईएस जगनमोहन रेड्डी के पदयात्रा अब तक आंध्र प्रदेश में हुई सारी पदयात्राओं से काफी अलग है. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण पदयात्रा में हर दिन उमड़ने वाली भीड़ है. ऐसा जनसमर्थन अब तक किसी राजनेता को नहीं मिला है. जनसमर्थन के मामले में जगन मोहन रेड्डी दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों से आग निकल गए हैं.

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राजनीतिक विश्लेषक वाई. सत्यनारायण का कहना है कि जगनमोहन रेड्डी ने अपनी इस पदयात्रा से न केवल चंद्रबाबू नायडू की ही सरकार को हिलाकर रखा है, बल्कि मोदी सरकार को भी हिलाने का काम किया है. जगन मोहन रेड्डी की पदयात्रा का ही नतीजा है कि मोदी-नायडू अलग-अलग हो गए हैं. इतना ही नहीं चंद्रबाबू तो जगन मोहन के कई मुद्दों को अपने हाथों में लेकर अपनी कुर्सी को बचाने का जुगाड़ कर रहे हैं.  

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पिछले 2014 के चुनाव में टीडीपी की जीत केवल चंद्रबाबू नायडू की जीत वह भी केवल आंशिक मार्जिन से इसलिए हो गई थी, क्योंकि एकीकृत आंध्र प्रदेश का विभाजन हुआ था और लोग चंद्रबाबू के राजनीतिक अनुभव को देखते हुए यह मानते थे कि यह विभाजित राज्य के हितों की रक्षा करने में सफल होंगे. इसके अलावा इनके साथ भाजपा व नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने वाली लहर व जनसेना अध्यक्ष पवन कल्याण का टीडीपी के समर्थन में प्रचार करने से सत्ता हासिल करने में कामयाब हो गए थे. अबकी बार न तो मोदी का साथ है और न ही पवन कल्याण का और तो और सत्ता विरोधी लहर का भी सामना चंद्रबाबू को करना है. 

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ऐसे में लगता है कि आंध्र प्रदेश में लगता है कि लोगों का मूड अब बदलने लगा है. इसीलिए वे किसी के भड़काए बिना ही सरकार के विरोध में आवाज उठाने लगे हैं. लगता है कि लोगों ने यह मन बना लिया है कि चंद्रबाबू को सत्ता से उखाड़ फेंके. यह बात स्पष्ट है कि अगर आज की तारीख में चुनाव कराए जाएं, तो वाईएस जगन की जीत पक्की है. वाईएस जगन ने अपनी पदयात्रा के दौरान जो गुडविल अर्जित की है, वह प्रशंसनीय है. निजी संस्थाओं व संगठनों द्वारा कराए गये सर्वेक्षणों में भी यही निष्कर्ष निकल रहा.


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