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कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा दिया, फैसले के विरोधी और समर्थक आपस में भिड़े

कैबिनेट की बैठक में काफी नोंकझोंक हुई क्योंकि चार लिंगायत मंत्रियों में से दो इसके पक्ष में थे तो दो इसके विरोध में. कुछ ऐसा ही विरोध और समर्थन सड़कों पर भी दिखा.

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कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा दिया, फैसले के विरोधी और समर्थक आपस में भिड़े

सन्त बसवण्णा की मूर्ति के साथ धार्मिक झंडा लिए खड़े हैं समर्थक

बेंगलुरु:

कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार की कैबिनेट ने सोमवार को लिंगायत को एक अलग धर्म का दर्जा देते हुए केंद्र सरकार से कैबिनेट के इस प्रस्ताव को क़ानूनी दर्जा देने की मांग की है. हालांकि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के लिए ये फैसला इतना आसान भी नहीं था. कैबिनेट की बैठक में काफी नोंकझोंक हुई क्योंकि चार लिंगायत मंत्रियों में से दो इसके पक्ष में थे तो दो इसके विरोध में. कुछ ऐसा ही विरोध और समर्थन सड़कों पर भी दिखा. जहां बेंगलुरु में लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा मिलने की खुशी में जश्‍न मनाया गया वहीं गुलबर्गा में इस फैसले का समर्थन और विरोध कर रहे लोग आपस में भिड़ गए. पुलिस को इन्हें क़ाबू में लाने के लिए काफी मशक्‍कत करनी पड़ी.

कैबिनेट की बैठक के बाद मेडिकल एजुकेशन मंत्री और लिंगायत नेता एमबी पाटिल ने कहा, कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने ऐतिहासिक फैसला लिया है. कैबिनेट ने लिंगायतों और वीरशेवाये के उन लोगों को अलग धर्म का दर्जा देने का फैसला किया है जो लॉर्ड बसवा के मानने वाले हैं. हम कैबिनेट के इस फैसले को केंद्र को मंजूरी के लिए भेज रहे हैं."


दरअसल कर्नाटक में लिंगयतों की संख्या तक़रीबन 19 फीसदी है और लगभग तीन दशकों से बीजेपी का समर्थन कर रहे हैं. लिंगायत नेता वीरेंद्र पाटिल को एयरपोर्ट पर बुलाकर राजीव गांधी ने 1990 में मुख्‍यमंत्री पद से इस्तीफा देने का आदेश दिया जिसे लिंगायतों के बीच उनके अपमान के तौर पर वीरेन्द्र पाटिल ने प्रचारि‍त किया. और तभी से कांग्रेस की पकड़ लिंगायतों पर कमज़ोर पड़ी और बीजेपी के साथ तक़रीबन 19 फीसदी वोट बैंक वाला लिंगायत समाज जुड़ गया.

कर्नाटक सरकार के लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देने के फैसले से नाराज़ बीजेपी के राज्य प्रवक्ता एस प्रकाश ने कहा कि "मुख्यमंत्री सिद्धारमैया काफी दिनों से लिंगायत समाज को बांटने में जुटे थे. अब केंद्र को फैसला लेना है लेकिन मैं इतना ज़रूर कहूंगा कि इस चाल से सिद्धारमैया को फायदा नहीं होगा."

क्‍या कहता है इतिहास
12वीं सदी के संत और विचारक वस्वन्ना ने एक ऐसे विचारधारा की नींव रखी जो कर्म प्रधान हो यानी उन्होंने वीरशैव पद्धति का विरोध किया. जहां वीरशैव वेदों पर आधारित है, धर्म प्रधान समाज का समर्थक है और शिव के उपासक हैं वहीं बसवा ने जिस पंथ की स्‍थापना की जिसे हम आज लिंगायत के नाम से जानते हैं. उसमें मनुवाद का विरोध है, लिंगयटिज्‍म जाति प्रथा, वर्ण व्यवस्था, सती प्रथा और बाल विवाह का विरोध करता है।

संत वस्वन्ना ने पिछड़ी जातियों और दलितों को भी एक ही साथ सामाज में एक ही पंक्ति में ला खड़ा किया. वो ऐसे समाज के पक्षधर थे जो धर्म प्रधान ने होकर कर्म प्रधान हो.

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लंबे अरसे से लिंगयत वीरशैव से अलग होने की मांग करते रहे हैं. दस्तावेज़ों के हवाले से जानकार बताते हैं कि अलग धर्म के तौर पर लिंगायतों ने अपनी मांग 1942 के आसपास तेज़ की. कई उतार चढ़ाव के दौर से गुजरने के बाद जब 50 के दशक में कर्नाटक वजूद में आया तो ये मांग एक बार फिर तेज़ हुई लेकिन आंदोलन का रूप नहीं ले पाई.

लेकिन 2017 में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने की मांग और अपने वादे को देखते हुए 7 सदस्यीय एक्सपर्ट समिति  कर्नाटक हाई कोर्ट के पूर्व जज एच एन नागमोहन दास की अध्यक्षता में बनाई जिसने इसी साल जनवरी में सिफारिश की कि लिंगायतों को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाना चाहिए उन वीरशैव उपासकों के साथ जो बसवण्णा के दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं. कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने नागमोहन दास समिति की इसी सिफारिश को मानते हुए लिंगायतों को वीरशैव से अलग धर्म का दर्जा देने की सिफारिश की है.


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