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राहुल गांधी की रैली में 'वंदे मातरम्', क्या गुजरात की तरह कर्नाटक में भी है 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की रणनीति

पहले से रिकॉर्ड किए गए राहुल-राहुल के नारे भी चलाए जा रहे थे जो अभी तक पीएम मोदी की रैलियों में सुनने को मिलता था.

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राहुल गांधी की रैली में 'वंदे मातरम्', क्या गुजरात की तरह कर्नाटक में भी है 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की रणनीति

गुजरात चुनाव की तर्ज पर ही कर्नाटक में भी राहुल गांधी प्रचार कर रहे हैं.

खास बातें

  1. कर्नाटक में चुनाव प्रचार चरम पर
  2. पीएम मोदी का अभी मैदान में उतरना बाकी
  3. राहुल और अमित शाह ने संभाल रखा है मोर्चा
बेंगलुरु:

कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार  अब धीरे-धीरे अपने चरम पर पहुंच रहा है. हालांकि अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी सभाएं शुरू नही हुई हैं. लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह लगातार राज्य के दौरे में हैं. इसी कड़ी में रविवार को राहुल गांधी ने बेंगलुरु में एक बड़ी चुनावी सभा को संबोधित किया. लेकिन इस रैली के बाद एक बार फिर सवाल उठने लगा है कि क्या कांग्रेस ने यहां भी बीजेपी के 'हिंदुत्व' को काटने के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर जाने का फैसला किया है. दरअसल इस राहुल गांधी की इस रैली की शुरुआत 'वंदेमातरम' से हुई. आम तौर पर कांग्रेस की चुनावी रैलियों में ऐसा नजारा नहीं देखने को मिलता है. मंच के सामने ही देवताओं की वेषभूषा में तीन लोगों को भी बैठाया गया था. 

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इतना ही नहीं पहले से रिकॉर्ड किए गए राहुल-राहुल के नारे भी चलाए जा रहे थे जो अभी तक पीएम मोदी की रैलियों में सुनने को मिलता था. रैली को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि जब मोदी जी भ्रष्टाचार की बाते करते हैं तो उन्हें नीरव मोदी, अमित शाह के बेटे जैसे मुद्दों पर बात करनी चाहिए. वहीं कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया ने कहा कि वे (बीजेपी) 'सबका साथ सबका विकास' की बात कहते हैं लेकिन सही मायने में 'सबका साथ सबका विकास' कांग्रेस ही कर सकती है. 

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गौरतलब है कि लिंगायतों और वैष्णवों के मुद्दे और दलितों के आंदोलन की वजह से बैकफुट पर चल रही बीजेपी ने अब कर्नाटक में राम माधव को भेजा है. 12 मई को कर्नाटक में 224 विधानसभा सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे. लेकिन इस बीच ऐसा लगता है राजनीति के कई नजारे देखने को मिलेंगे. फिलहाल कर्नाटक विधानसभा का चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाम मुख्यमंत्री सिद्धारमैया होता जा रहा है. स्थानीय मुद्दों की कमी तो नहीं है लेकिन दोनों ही तरफ से ज़यादातर राष्ट्रीय मुद्दे ही उछाले जा रहे हैं.
 



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