मुश्किल ड्रॉ, फिर भी क्यों हैं योगेश्वर दत्त से गोल्ड की उम्मीद?

मुश्किल ड्रॉ, फिर भी क्यों हैं योगेश्वर दत्त से गोल्ड की उम्मीद?

रियो ओलिंपिक में भारत की आखिरी उम्मीद हैं योगेश्वर दत्त. (फाइल फोटो)

खास बातें

  • रियो में पदक के लिए भारत की आखिरी उम्मीद हैं योगेश्वर दत्त.
  • लंदन ओलिंपिक में दत्त ने जीता था कांस्य पदक.
  • इस बार पदक का रंग बदलने के लिए रिंग में उतरेंगे दत्त.
नई दिल्ली:

रियो में 16 दिन और 115 एथलीट्स के हिस्सा लेने के बाद भारत के खाते में 2 पदक हैं. इस ओलिंपिक में तीसरे पदक के लिए हमारी आखिरी उम्मीद पहलवान योगेश्वर दत्त हैं. अभी तक मिले दोनों पदक महिलाओं ने दिलाए हैं. इसके अलावा 2 और महिलाओं ने इतिहास रचा है. ललिता बाबर 1984 में पीटी ऊषा के बाद पहली भारतीय महिला हैं जो एथलेटिक्स के ट्रैक एंड फ़ील्ड इवेंट के फ़ाइनल में पहुंची. मतलब 32 साल बाद. इस बीच उन्होंने निजी रिकॉर्ड और 3000 मीटर महिला स्टीपलचेज़ में राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाया.

इनके अलावा दीपा कर्माकर ने इतिहास रचा. सबसे पहले जिमनास्टिक्स में ओलिंपिक्स के लिए क्वालिफ़ाई करके और फिर वॉल्ट इवेंट के फ़ाइनल में जगह बनाकर. मतलब वह विश्व के टॉप 8 एथलीट्स में शुमार हुईं. लेकिन पिक्चर अभी बाकी थी. वॉल्ट के फ़ाइनल में दीपा कांस्य पदक से महज़ 0.150 अंकों से पीछे रह गईं. मतलब वह चौथे स्थान पर आईं लेकिन इस प्रदर्शन ने दुनिया में खेलों के सबसे बड़े स्टेज पर जिमनास्टिक्स और भारत को एक साथ जोड़ दिया. यानि जिमनास्टिक्स के मैप में अब भारत भी शुमार होगा. यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं. खासतौर पर जब आप भारत में जिमनास्टिक्स के स्तर और सुविधाओं की तुलना विश्व के शीर्ष देशों के साथ करते हैं. इन 4 खिलाड़ियों में से ललिता को छोड़ बाकी तीनों के खेल रत्न के लिए नामांकित होने की खबर है. तीनों पर धन की बारिश भी हो रही है.

'पहलवान जी गोल्ड जरूर लाएंगे'
आज रियो ओलिंपिक का अंतिम दिन है और भारत की अंतिम उम्मीद योगेश्वर दत्त 65 किलोग्राम वर्ग में 2012 लंदन ओलिंपिक के अपने पदक के रंग को बदलने की कोशिश करेंगे. लंदन ओलिंपिक में योगेश्वर ने कुश्ती के 60 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक हासिल किया था और इस बार कुश्ती ने ही भारत के पदक का सूखा तोड़ने का काम किया. रियो में भारत का पहला पदक जीतने वाली महिला पहलवान साक्षी मलिक ने कहा कि "पहलवान जी गोल्ड ज़रूर लाएंगे". इसके बाद भारत के डबल ओलिंपिक मेडलिस्ट सुशील कुमार ने ट्वीट कर कहा है कि "मैं योगेश्वर को शुभकामनाएं देता हूं. पूरा देश तुम्हारे लिए प्रार्थना कर रहा है."

दुआएं और प्रार्थनाएं अपनी जगह और योगेश्वर की मेहनत और उनका रिकॉर्ड अपनी जगह. योगेश्वर उन चंद लोगों में शुमार हैं जिनसे शुरू से ही पदक की उम्मीद बनी हुई है. योगेश्वर के 2012 ओलिंपिक कांस्य के बाद से अब तक के सफ़र पर नज़र डालें तो इसके पीछे की वजह खुद ब खुद साफ़ होती है. उन्होंने 2014 में ग्लास्गो कॉमवेल्थ और इंचियॉन एशियन गेम्स में 65 किलोग्राम वर्ग फ़्रीस्टाइल कुश्ती में गोल्ड मेडल जीते थे.

फिटनेस को लेकर चिंता
चिंता योगेश्वर की क्षमता को लेकर नहीं उनकी फ़िटनेस को लेकर है. पिछले साल उनकी तीन सर्जरी हुई और रियो जाने से पहले भी उनके चोटिल होने की खबरें आईं. लेकिन उनके साथ मौजूद लोगों का मानना है कि वह पूरी तरह फ़िट हैं और इस बार वह गेल्ड मेडल ही लेकर आएंगे. 2004 में कृपाशंकर पटेल के उनके ओलिंपिक जाने पर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने के बाद से योगेश्वर 2008 और 2012 ओलिंपिक में हिस्सा ले चुके हैं. मतलब यह उनका चौथा ओलिंपिक होगा. मुश्किलों और चोट से उबरकर उन्होंने पहले भी वापसी की है.

साल 2009 में वह घुटने की चोट की वजह से बाहर रहे. लगा कि यह चोट उनके करियर पर खतरा है. लेकिन 2010 कॉमनवेल्थ में गोल्ड हासिल कर उन्होंने बता दिया कि वह टूर्नामेंट में हिस्सा ले रहे हैं तो इसका मतलब वह आधी-अधूरी फ़िटनेस के साथ नहीं उतर रहे. और पदक जीतने के लिए खेल रहे हैं. इस बार भी हालात वैसे ही हैं. लंबे समय से वह चोटिल रहे. लेकिन अब रियो में अगर योगेश्वर खेलने उतर रहे हैं तो वह पदक जीतने के लिए उतर रहे हैं.

मुश्किल है ड्रॉ
सच है कि उनका ड्रॉ मुश्किल है. एक नज़र उस पर भी डाल लेते हैं. शाम 5 बजे उनका पहला मुक़ाबला मंगोलिया के गैंग्ज़ोरिगीन मेंडाख्नारान से है. इसके बाद क्वार्टर फ़ाइनल में उन्हें रूस के सोस्लान रोमोनोव से भिड़ना है, जो 2014 वर्ल्ड चैंपियन और 2015 में वर्ल्ड चैंपियनशिप्स के कांस्य पदक विजेता हैं. यहां जीते तो सेमी फ़ाइनल में उज़बेकिस्तान के इख्तिोयोर नव्रुज़ोव से टक्कर हो सकती है. जो मौजूदा रजत पदक विजेता हैं.

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मतलब राह मुश्किल है. लेकिन योगेश्वर भी कोई आसान पहलवान नहीं. ये सच है कि विपक्षी रेसलर भी इनसे सतर्क रहेंगे. योगेश्वर अगर इस बार पदक जीतते हैं तो वह भी सुशील कुमार के साथ भारत के सबसे सफल ओलिंपियन के तौर पर गिने जाएंगे. पदक का रंग अगर गोल्ड हुआ तो सबसे बड़े एथलीट बन जाएंगे और भारत के एकमात्र गोल्ड मेडलिस्ट अभिनव बिंद्रा का अकेलापन भी दूर होगा. ये कम प्रेरणा नहीं. उम्मीद अब बस यही है कि जब खेल खत्म होंगे तो पदकों की संख्या 3 होगी, और भारत के खाते में एक गोल्ड होगा.