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ग्राउंड रिपोर्ट : नॉर्थ ईस्ट में फुटबॉल को लेकर दीवानगी का माहौल

पूर्वोत्तर में जमीनी स्तर पर फुटबॉल के हालात में आए बदलाव जानने की कोशिश की NDTV की टीम ने

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ग्राउंड रिपोर्ट : नॉर्थ ईस्ट में फुटबॉल को लेकर दीवानगी का माहौल

नार्थ-ईस्ट में फुटबॉल को लेकर दीवानगी का माहौल देखने को मिल रहा है.

खास बातें

  1. सुबह पांच बजे से ही मैदानों में फुटबॉल खिलाड़ियों की मौजूदगी
  2. असम के पूर्व फुटबॉलरों ने फ़ुटबॉल अकादमी खोली
  3. बच्चों को फुटबॉल सिखाने का ज़िम्मा उठा रहे वरिष्ठ खिलाड़ी
नई दिल्ली: इस साल भारत में हुए अंडर-17 फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप के दौरान स्टेडियम में इतने दर्शक आए कि वर्ल्ड रिकॉर्ड बन गया. अंडर-17 वर्ल्ड कप के दौरान भारत में सबसे ज़्यादा क़रीब 13 लाख दर्शकों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और भारत ने इस मामले में चीन के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया. इसके साथ ही पिछले कुछ महीनों में नॉर्थ ईस्ट से फुटबॉल की खबरें छाई रहीं. लेकिन जमीनी स्तर पर वहां फुटबॉल के हालात में क्या बदलाव आए हैं, ये जानने की कोशिश की NDTV की टीम ने.

पिछले कुछ महीनों में अंडर-17 वर्ल्ड कप, ISL और आई-लीग के मैचों के दौरान नॉर्थ ईस्ट फुटबॉल अपनी अलग छवि बनाती नजर आई. लेकिन यह नॉर्थ ईस्ट फ़ुटबॉल का बस एक पहलू हैं. गुवाहाटी जैसे शहर में भी कंक्रीट के जंगल मैदानों को निगलते नज़र आते हैं. गुवाहाटी शहर के बीचोंबीच लाटूमा में एक लोअर प्राइमरी स्कूल में सुबह के पांच बजे से ही फुटबॉल की रौनक लग जाती है. लाटूमा के प्राइमरी स्कूल के उबड़-खाबड़ मैदान में कहीं-कहीं थोड़ी घास भी है. यानी गिरें तो चोट लगने की पूरी गुंजाइश है. मैदान के एक हिस्से में बड़े लोग फुटबॉल मैच खेलते हैं. इसलिए मैदान के किनारे बच्चों को भी थोड़ी जगह मिल जाती है. मैदान के एक कोने में अच्छी ख़ासी जगह एक-दो गाड़ियों ने भी ले ली है.

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असम के कुछ पूर्व फुटबॉलरों ने यहीं एक फ़ुटबॉल अकादमी खोली है. थोड़े-थोड़े पैसे इकट्ठे कर उन्होंने बच्चों को फ़ुटबॉल सिखाने का ज़िम्मा उठाया है. लेकिन फ़ुटबॉल जैसे खेल को लेकर भी बुनियादी कमियों की ओर इशारा करते हुए ये फ़ुटबॉलर अफ़सोस जाहिर करते हैं. इनमें से एक चंद्रशेखर दास असम में जिला स्तर पर फ़ुटबॉल खेल चुके हैं. चंद्रशेखर दास कहते हैं, "यहां ISL भी हो रहा है, आईलीग भी और अंडर-17 फ़ुटबॉल का आयोजन भी हुआ. फ़ुटबॉल को लेकर पिछले 3-4 सालों में यहां जागरूकता बढ़ी है. लेकिन बच्चों के लिए बुनियादी स्तर पर क्या हुआ है? हमने पढ़ा था कि फुटबॉल अंडर-17 वर्ल्ड कप के प्रचार लिए फ़ीफ़ा ने क़रीब 65 करोड़ रुपए दिए. ऐसे में तो यहां दुर्गा पूजा का माहौल हो जाना चाहिए था. लेकिन यहां वैसा तो कुछ नहीं हुआ."
 
north east football

फिर भी असम में अलग-अलग स्तर पर ये पूर्व फुटबॉलर फिर से अपने जुनून का नया रंग देखने आते हैं. कई फ़ुटबॉलर तो यहां अपने बच्चों के साथ भी आते हैं. इनमें से एक रमनजीत भौमिक और उनकी 13 साल की बेटी राशि भौमिक भी हैं. रमनजीत भौमिक ड्राइवर का काम करते हैं. तीन बच्चों के साथ अपने परिवार का खर्च बड़ी मुश्किल से चलाते हैं. लेकिन सुबह-सुबह इस फ़ुटबॉल अकादमी में आकर अपनी बेटी के साथ खेलने से इनके सपनों में जान आ गई है. रमनजीत कहते हैं, "मैंने तो बेटी के जन्म के बाद से ही फ़ुटबॉल खेलना छोड़ दिया था. लेकिन इसके (राशि) मैदान पर आने के साथ मैंने भी आना शुरू कर दिया. मेरा सपना है कि मेरी बेटी एक अच्छी फ़ुटबॉल खिलाड़ी बने." राशि कहती हैं, "मेरे पापा मेरे फ़ुटबॉल के हीरो हैं. मैं चाहती हूं कि एक दिन अच्छा खेलूं और इसके सहारे नौकरी हासिल कर सकूं. मैं अपने पिताजी का बोझ कम करना चाहती हूं."
 
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हमने शहर से दूर असम के कुछ चाय-बागानों में जाकर फ़ुटबॉल की हालत का जायज़ा लेने की कोशिश की. हमें बताया गया कि यहां होने वाली चाय बागान लीग में 30-35 टीमें आकर फ़ुटबॉल टूर्नामेंट खेलती हैं. गुवाहाटी शहर से क़रीब 25 किलोमीटर दूर शोणितपुर ज़िले के एक चाय बागान में बोस्टन, अमेरिका से पढ़कर आए 23 साल के फ़ुटबॉल उद्यमी विनायक अग्रवाल अपने दोस्त और फ़ुटबॉल कोच निशांत बरुआ के साथ मज़दूरों के बच्चों को फ़ुटबॉल खिलवाने की कोशिश कर रहे हैं. आमचॉन्ग टी स्टेट के मालिक उनकी इस कोशिश को सराहते हैं और उनकी मदद करने की कोशिश करते हैं. वे हर शाम उनके लिए बूट, नेट्स और फ़ुटबॉल का इंतज़ाम करते हैं. किसी तरह से एक मैदान भी तैयार कर लिया गया है. विनायक कहते हैं, "ये मेरा बिज़नेस प्लान है. मैं हर उम्र के लोगों के लिए फ़ुटबॉल की सुविधाएं जुटाना चाहता हूं. मुझे लगता है इन्हीं में से मैं एक दिन नेशनल टीम के लिए कुछ खिलाड़ी तैयार कर पाऊंगा."
 
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विनायक और निशांत जैसे युवाओं की कोशिशों ने चाय बागान के कई मज़दूरों के बच्चों को नई दिशा भी दी है और इनमें कुछ बड़ा हासिल करने के ख़्वाब भी दे दिए हैं. इनमें से एक जीतू कर्माकर कहते हैं, "अब हम बेहतर फ़ुटबॉल खेलने लगे हैं. मैं असम के लिए फ़ुटबॉल खेलना चाहता हूं. क्या पता शायद आगे भी जा पाऊं." उसी तरह सौराथ ख़ैरा कहते हैं, "पहले फ़ुटबॉल का बेसिक्स नहीं आता था. अब गेम बेहतर हो गया है. हम अच्छे खिलाड़ी बनना चाहते हैं. वैसे हमारे पास खेलने को कोई ढंग का स्टेडियम भी नहीं है."

NDTV से ख़ास बातचीत में असम के मुख्यमंत्री और पूर्व खेलमंत्री सर्बानंद सोनोवाल इन कमियों को दूर करने का भरोसा दिलाते हैं. वे कहते हैं, "इस पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं. हमारी योजना है कि हम जल्दी ही 500 मैदान तैयार करेंगे."  

VIDEO : फुटबॉल को लेकर उत्साहजनक वातावरण

दरअसल हाल के दिनों की नॉर्थ ईस्ट फ़ुटबॉल की कामयाबी हौसला बुलंद करती है तो बुनियादी स्तर की कमियां इशारा करती हैं कि काफ़ी कुछ किए जाने की ज़रूरत है. निजी कोशिशें कहीं-कहीं बदलाव ला सकती हैं. लेकिन फुटबॉल के ज़रिए वाकई कुछ बड़ा हासिल किए जाने की उम्मीद की जाती है तो पूरे सिस्टम के रवैये में बदलाव की ज़रूरत भी साफ़ नज़र आती है.


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