जानिए, गरीबी के कारण कैसे संघर्ष कर रहा चमत्कारी मैराथन धावक बुधिया सिंह...

जानिए, गरीबी के कारण कैसे संघर्ष कर रहा चमत्कारी मैराथन धावक बुधिया सिंह...

बुधिया सिंह का फाइल फोटो...

खास बातें

  • गरीबी की वजह से मेरे बेटे का अच्छा धावक बनने का सपना टूट रहा : सुकांति
  • स्पोर्ट्स हॉस्टल द्वारा दी जा रही ट्रेनिंग से सुकांति और बुधिया नाखुश।
  • बुधिया सिंह को फ्री में ट्रेनिंग देने के लिए कोई राजी नहीं है।
नई दिल्‍ली:

'मैं अपने बेटे को एक अच्छा धावक बनाना चाहती हूं। मैं चाहती हूं कि मेरा बेटा पूरी दुनिया में नाम कमाए, लेकिन मैं गरीब हूं। मेरी गरीबी की वजह से मेरे बेटे का एक अच्छा धावक बनने का सपना टूट रहा है। मेरे पास पैसा नहीं है। मेरा बेटा दुबला-पतला हो गया है। मैं अपने बेटे को अच्छी ट्रेनिंग नहीं दे पा रही हूं।'  यह कहना है चमत्कारी मैराथन धावक बुधिया सिंह की मां सुकांति सिंह का। एनडीटीवी ने जब बुधिया और उसकी मां सुकांति सिंह से बात की तो दोनों काफी भावुक हो गए। सुकांति सिंह अपने बेटे के भविष्य को लेकर काफी चिंतित नज़र आईं।

सुकांति का कहना था कि 'गरीबी की वजह से वह बुधिया को अच्छा ट्रेनिंग नहीं दे पा रही हैं। बुधिया सिंह को फ्री में ट्रेनिंग देने के लिए कोई राजी नहीं है।' बुधिया भुवनेश्वर का साईं हॉस्टल छोड़ चुका है। वह हॉस्टल दोबारा वापस नहीं जाना चाहता। बुधिया का कहना था कि हॉस्टल में सही ट्रेनिंग नहीं मिल रही है। कुछ दिनों से यह खबर आ रही है कि ओडिशा का मैराथन बालक बुधिया सिंह गायब है। देश के कई बड़े अख़बारों और टेलीविजन चैनलों पर यह खबर दिखाई गई। बुधिया के गायब को लेकर कई अटकलें लगाई गई थीं। यह भी कहा जा रहा था कि बुधिया सिंह का किडनैप हो गया है। लेकिन बुधिया सिंह का मां सुकांति सिंह का कहना है 'वह अपने मर्ज़ी से घूमने गए थे। कुछ-दिन के लिए वह लोग मुंबई में रूके और कुछ दिन तमिलनाडु में।'

दुनिया में बहुत कम लोग बुधिया सिंह को जानते होंगे। भुवनेश्वर के स्लम में रहने वाले बुधिया सिंह ने साल 2006 में महज चार साल की उम्र में पुरी से भुवनेश्वर 65 किलोमीटर की दूरी सात घंटे और दो मिनट में दौड़कर पूरी करते हुए सबका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया था। इस कारनामे की वजह से बुधिया सिंह का नाम 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' में दर्ज हुआ था। बुधिया के पास टैलेंट था, लेकिन अफसोस पैसा नहीं था। बुधिया के घर में कमाने वाली सिर्फ उसकी मां सुकांति सिंह है। बुधिया के पिताजी का कई साल पहले देहांत हो चुका है।

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बुधिया के टैलेंट को देखते हुए भुवनेश्‍वर के जुडो कोच बिरंचि दास उसे अपने पास रखकर ट्रेंनिंग दे रहे थे और बुधिया का खर्चा उठा रहे थे, लेकिन 2008  में बिरंचि दास की हत्या हो जाने के बाद बुधिया की ज़िंदगी बदल गई। अब उसे दूसरा कोई ट्रेनिंग देने के लिए आगे नहीं आया। नतीजतन, बुधिया को वापस अपने घर लौटना पड़ा। गरीबी की वजह से वह कहीं अच्छी जगह ट्रेंनिंग नहीं ले पाया। फिर बुधिया सिंह के टैलेंट और हालात के देखते हुए ओडिशा सरकार ने बुधिया को भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) हॉस्टल में रखकर ट्रेनिंग दी और डीएवी पब्लिक स्कूल में उसका  दाख़िला करवाया। ओडिशा सरकार बुधिया का पूरा खर्चा उठाती थी, लेकिन बुधिया सिंह हॉस्टल में दी जा रही ट्रेनिंग से खुश नहीं था। फिर भी न आवाज़ उठा पा रहा था, न हॉस्टल छोड़ पा रहा था।

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बुधिया का मां सुकांति सिंह का कहना है वह बुधिया को दोबारा हॉस्टल वापस भेजना नहीं चाहती हैं। सुकांति ने बताया बुधिया को स्पोर्ट्स हॉस्टल में सभी सुविधा नहीं मिल रही थी। स्पोर्ट्स हॉस्टल के द्वारा दी जा रही ट्रेनिंग से भी सुकांति और उनके बेटे बुधिया खुश नहीं है। अब बुधिया खुद प्रैक्टिस करना चाहता है। दौड़ना चाहता है। सुकांति सिंह का यह भी कहना है वह चाहते हैं कि कोई एक अच्छा कोच उनकी मज़बूरी को समझे... गरीबी को समझे और बुधिया सिंह को फ्री में ट्रेनिंग दे।