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यादें शेष : काश, मौत को 'डॉज' दे पाता ड्रिब्लिंग का उस्‍ताद शाहिद....

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यादें शेष : काश, मौत को 'डॉज' दे पाता ड्रिब्लिंग का उस्‍ताद शाहिद....

मोहम्‍मद शाहिद को ड्रिब्लिंग में महारत हासिल थी। (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. अशोक कुमार बोले, उससे बड़ा ड्रिब्लर और कोई नहीं दिखा
  2. महिला हॉकी टीम भी शाहिद की कलाकारी देखने आती थी : कौशिक
  3. खेल मंत्री विजय गोयल ने कहा, ध्‍यानचंद के बाद वे सबसे बड़े खिलाड़ी थे
हॉकी के कई जानकार कहते हैं कि क़रीब सौ साल के हॉकी के खेल के इतिहास में शायद किसी ने मोहम्मद शाहिद से बड़ा ड्रिब्लर नहीं देखा. 1980 के ओलिंपिक खेलों के गोल्ड मेडल विजेता मो. शाहिद का बुधवार सुबह गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में इंतकाल हो गया. उन्हें आख़िरी विदाई उनके घर बनारस में दी जाएगी.

मॉस्को ओलिंपिक्स का हीरो और ड्रिब्लिंग का उस्ताद मौत को मात नहीं दे पाया. काश, ड्रिब्लिंग का यह उस्‍ताद ऐसा कर पाता। ओलिंपिक्स में भारत की जीत की चुनिंदा तस्वीरों में  गुम हुए मोहम्मद शाहिद फिर भी दुनिया भर के हॉकी प्रेमियों के ज़ेहन में छाये हुए हैं. जिसने भी उन्हें कहीं भी खेलते देखा उनका कायल हो गया. टीवी के दौर में शायद  उनकी ड्रिब्लिंग की बराबरी करने वाला कोई और उस्ताद नहीं नज़र आया.  

(पढ़ें - मैदान पर आक्रामक, लेकिन बाहर बेहद खुशमिजाज थे शाहिद...)

हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचंद के बेटे और पूर्व भारतीय कप्तान अशोक कुमार कहते हैं, "1980 का मेडल शाहिद की वजह से ही आया. उससे बड़ा ड्रिब्लर और कोई नहीं दिखा. वो बनारस या यूपी के नहीं बल्कि पूरे भारत के महान खिलाड़ी थे." बनारस की पेचीदा गलियों से बिल्कुल उलट शाहिद सरल थे और उन्होंने पूरी ज़िन्दगी बेतकल्लुफ़ी और बेबाकी से काटी- मैदान पर भी और बाहर भी. सिर्फ़ 56 साल की उम्र में शाहिद को दुनिया से रुखसत होना पड़ा. उनके आख़िरी वक्त किडनी और लिवर के ख़राब होने की वजह से गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में ही कटे. लेकिन उनकी ज़िन्दादिली एक मिसाल बनी रही.

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1980 मॉस्को ओलिंपिक्स में उनके साथी खिलाड़ी एमके कौशिक बताते हैं कि शाहिद अपने खेल की वजह से हमेशा बेहद लोकप्रिय रहे. वे बताते हैं कि 1980 में भारतीय महिला टीम भी वक्त निकालकर शाहिद की 'कलाकारी' देखने को आती थी. पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान अशोक कुमार बताते हैं कि उनसे एक बार एक अधिकारी ने उन्हें सबूत के तौर पर सर्टिफिकेट लाने को कहा कि वो ज़िन्दा हैं. उन्होंने अधिकारी के कहे का बुरा नहीं माना, लेकिन कहा, "भाई मैं मरूंगा तो मेरे मरने की ख़बर टीवी और अख़बारों में ज़रूर आएगी. इसलिए मुझे अभी ज़िंदा मानिए."

शाहिद में अपने खेल और रवैये को लेकर आत्मविश्वास की कमी नहीं थी. खेल मंत्री विजय गोयल ने भी शोक प्रकट करते हुए श्रद्धांजलि दी," ध्यानचंद के बाद वो बहुत बड़े खिलाड़ी थे. मौजूदा टीम के कई खिलाड़ी उनसे आशीर्वाद लेकर रियो जाना चाहते हैं." 1979 में जूनियर वर्ल्ड कप के हीरो रहे शाहिद ने साल भर के अंदर ही मॉस्को ओलिंपिक्स में सीनियर स्तर पर भी अपना लोहा मनवा दिया. हॉकी टीम के कप्तान का भी रोल अदा किया और एशियाई खेलों में भी खूब शोहरत कमाई, बेस्ट एशियन हॉकी टीम के खिलाड़ी भी चुने गए। ज़फ़र इक़बाल के साथ उनकी चपल जोड़ी चर्चा का विषय बनी।  बनारस के शाहिद बेशक इस खेल में पिछली पीढ़ी के बादशाह रहे. लेकिन उनकी अहमियत का अंदाज़ा मौजूदा पीढ़ी भी बखूबी समझती है...और उनकी बादशाहत को सलाम करती है...


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