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कबड्डी का गुरुकुल: यहां की छात्राएं जीतना चाहती हैं देश के लिए पदक...

जो सवाल हमारे दिमाग में आया था वह शायद आपके मन में भी आ रहा होगा कि कबड्डी की ट्रेनिंग के लिए किराये के मकान में रहने की क्या जरूरत है. दूसरी बात, अगर किराये पर रहना है तो फिर दो कमरे में तीस लड़कियों को रहने की क्या जरूरत है.

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कबड्डी का गुरुकुल: यहां की छात्राएं जीतना चाहती हैं देश के लिए पदक...

कबड्डी गुरुकुल की कई छात्राएं राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर खेल चुकी हैं

खास बातें

  1. कई छात्राएं राष्‍ट्रीय-अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर खेल चुकी हैं
  2. कोच नीलम साहू फ्री में देती हैं लड़कियों को ट्रेनिंग
  3. दिल्‍ली में किराए के मकान में चल रहा यह गुरुकुल
नई दिल्‍ली:

दिल्ली के राजनगर के पार्ट-2 के उस किराये के मकान पर एंट्री करते ही एक लड़की पोंछा लगाते हुए नज़र आई. तब तक हमारा कैमरा भी तैयार नहीं हुआ था.हमें लगा कि शायद यह लड़की यहां काम करती होगी लेकिन जल्‍द ही हमारा भ्रम दूर हो गया. जो लड़की पोंछा लगा रही थी वह सरकारी स्कूल में पढ़ती है और पिछले कई माह से दूसरी छात्राओं के साथ यहां किराये पर रह रही है. मकसद है  अंतरराष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी बनना. धीरे-धीरे हम उस कमरे तक भी पहुंचे जहां और छात्राएं रहती हैं. एक कमरे में 15 की करीब छात्राएं घेरा बनाकर बैठी हुई थीं. किसी के हाथ में किताब थी तो कोई दूसरे से बात कर रही थी. बातचीत से पता चला कि कोई उत्तर प्रदेश से है तो कोई हरियाणा से, सभी लड़कियां सरकारी स्कूल में पड़ती है और कबड्डी की ट्रेनिंग ले रही हैं.

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गरीब घर से हैं ये छात्राएं
शुरुआत में जो सवाल हमारे दिमाग में आया था वह शायद आपके मन में भी आ रहा होगा कि कबड्डी की ट्रेनिंग के लिए दिल्ली में किराये के मकान में रहने की क्या जरूरत है. दूसरी बात, अगर किराये पर रहना है तो फिर दो कमरे में तीस लड़कियों को रहने की क्या जरूरत है. सच्चाई यह है यह सभी लड़कियां गरीब घर से हैं, किसी के पिता किसान हैं तो किसी के टेलर, कोई ड्राइवर है तो कोई इलेक्ट्रीशियन. यह सभी लड़कियां नीलम साहू नाम की फिजिकल एजुकेशन टीचर से फ्री में कबड्डी की ट्रेनिंग ले रही हैं. नीलम कोई आम कोच नहीं हैं, वे पिछले 23 सालों से कबड्डी की ट्रेनिंग दे रही है. दिल्ली के सरकारी स्कूल में फिजिकल एजुकेशन टीचर हैं. अभी तक नीलम 600 से भी ज्यादा बच्चों को ट्रेनिंग दे चुकी हैं जिसमें से 9 अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुके हैं.

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एक-दूसरे को संभालती हैं लड़कियां
धीरे धीरे इन छात्राओं से बातचीत आगे बढ़ती गई. यहां दो कमरे के साथ साथ एक स्टोर रूम भी है जहां लड़कियां अपना सामान रखती हैं जिसमें किताबें भी शामिल हैं. यहां एक किचन भी है. लड़कियां यहां अपना काम खुद करती हैं. जो बड़ी लड़कियां है, वे खाना बना देती हैं. छोटी लड़कियां झाड़ू-पोंछा में मदद करती हैं. सब एक-दूसरे से मदद करती हैं. सीनियर छात्राएं, जूनियर छात्राएं को संभालती हैं और जूनियर, सब जूनियर को. ये लड़कियां सुबह चार बजे उठ जाती है, खुद ब्रेकफास्ट तैयार करती हैं फिर दो किलोमीटर चलकर ट्रेनिंग ग्राउंड पहुंचती है. ट्रेनिंग के बाद स्कूल जाती हैं और शाम को फिर दो किलोमीटर चलकर ट्रेनिंग ग्राउंड पहुंचती हैं और दो से तीन घंटे प्रैक्टिस करती हैं. इसके बाद डिनर बनाती हैं, यह इनका रोज का रूटीन है.
 

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एनडीटीवी से बात करती हुईं कबड्डी गुरुकुल की छात्राएं

कई लड़कियां राष्‍ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल चुकी हैं
कई लड़कियां ऐसी मिलीं, जो नेशनल और इंटरनेशनल स्‍तर पर खेल चुकी हैं. हरियाणा की साक्षी आठवीं क्लास में पढ़ती है, वह पिछले आठ महीने से यहीं है. साक्षी का सब जूनियर टीम में चयन हो चुका है. साक्षी की पिता टेलर हैं और मां हाउसवाइफ हैं. रेमन हरियाणा के जींद की रहने वाली है. रेमन के पिता किसान हैं और मां हाउसवाइफ. एक तो भारत के लिए कबड्डी खेलना चाहती है और उस के साथ साथ रेलवे में नौकरी भी करना चाहती है. झज्‍जर की एक लड़की का भी सब जूनियर नेशनल टीम में चयन हो चुका है. महाराष्ट्र और ओडिशा में खेलने के लिए जा चुकी हैं. मैडल भी जीतकर आई हैं. नीतू पुरानी दिल्ली की रहने वाली है. एक साल से यहां रहकर ट्रेनिंग ले रही हैं.

मेरठ के रहने वाली तनु को जैसे ही पता चला कि यहां अच्‍छी ट्रेनिंग दी जा रही है तो यहां पहुंच गईं. जींद की पिंकी की दो बहन भी यहीं से कोचिंग ले चुकी हैं और इंटरनेशनल लेवल पर खेल चुकी हैं. अब पिंकी खुद यहां ट्रेनिंग ले रही है. पानीपत की एक छात्रा ने बताया कि वह पिछले चार साल से यहां ट्रेनिंग ले रही है. अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुकी हैं. 2016 में ईरान में एशियाई चैंपियनशिप में भारतीय टीम भी हिस्सा थी. पहले राउंड में खेलने का भी मौक़ा मिला था. कपासेड़ा की रहने वाली एक लड़की ने बताया कि वह खुद भी अंतरराष्ट्रीय और नेशनल खेल चुकी है. बेंगलुरू की प्रीति यहां ढाई साल से हैं. वे मानती है कि सबसे अच्छी कोचिंग यहां दी जाती है. प्रीति का हर महीने 1500 रुपये खर्च होता है, जिसमें रहना और खाना शामिल है.

फ्री में कोचिंग देती हैं नीलम साहू
जैसे ही शाम को चार बजे, यह छात्राएं तैयार होकर मैदान के लिए निकल पड़ीं. हम भी उनके साथ चल पड़े. दो किलोमीटर चलने के बाद यह लोग मैदान पहुंचीं. लड़कियों ने खुद मैदान तैयार किया फिर प्रैक्टिस शुरू कर दी. यहां कोच नीलम साहू से हमारी मुलाकात हुई. नीलम से बताया कि अभी वे 40 बच्चों को ट्रेनिंग दे रही है, इनकी उम्र 9 साल से लेकर 26 साल के बीच है. नीलम ने बताया कि वे फ्री में ट्रेनिंग देती हैं और 1995 से ट्रेनिंग दे रही हैं. नीलम की 9 स्टूडेंट अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुकी हैं और कई नेशनल. नीलम का कहना है कि हर साल कुछ खिलाड़ियों को कबड्डी के बेस पर सरकारी नौकरी मिल जाती है. नीलम ने बताया कि सभी बच्चे गरीब घर से हैं इसीलिए उनसे कभी कोचिंग की फीस नहीं ली. बच्चों से सिर्फ 1500 रुपये लिए जाते हैं जिसमें रहना और खाना शामिल है.

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वीडियो: दिल्‍ली में कबड्डी एक एक गुरुकुल ऐसा भी

प्रैक्टिस के लिए सुविधाओं का अभाव
नीलम खुद पालम स्पोर्ट्स क्लब के साथ जुड़ी हुई हैं. नीलम का मानना है कि जब छात्राएं स्कूल से पासआउट हो जाती हैं तो कहीं न कहीं उन्हें प्लेटफॉर्म की जरूरत पड़ती है और पालम स्पोर्ट्स क्लब यह प्लेटफॉर्म देता है. भावना यादव, गायत्री और रितु जैसी खिलाड़ी अभी नीलम साहू के कोचिंग ले रही हैं और अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुकी हैं. नीलम का मानना है कि छात्राओं को सभी सुविधायें नहीं मिल पाती हैं. रहने के लिए सुविधा नहीं है, प्रैक्टिस करने के लिए मैट भी नहीं है. सर्दी के दिन में बच्चों पैर छिल जाते हैं. मदद के लिए नीलम कई जगह लिख भी चुकी हैं लेकिन अभी तक कोई मदद नहीं मिली है.



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