NDTV Khabar

अयोध्या मामला: SC में बाबरी मस्जिद के पक्षकार ने कहा, एक बार मस्जिद बन जाए, तो उसे तोड़ा नहीं जा सकता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर जरूरत पडी तो इस्माइल फारुखी केस को संविधान पीठ को भेजेंगे.

 Share
ईमेल करें
टिप्पणियां
अयोध्या मामला: SC में बाबरी मस्जिद के पक्षकार ने कहा, एक बार मस्जिद बन जाए, तो उसे तोड़ा नहीं जा सकता

सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

खास बातें

  1. अयोध्या मामले में बहस 6 अप्रैल को जारी रहेगी
  2. 'एक बार मस्ज़िद बन जाए तो वो अल्लाह की संपत्ति मानी जाती है'
  3. 'मुस्लिम धर्म में नमाज पढ़ना मौलिक अधिकार के दायरे में है'
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने आज कहा कि वह अयोध्या में विवादित जमीन के अधिग्रहण के संबंध में1994 के समूचे फैसले या उसके कुछ हिस्से को पुनर्विचार के लिये बड़ी पीठ को भेजने के बारे में फैसला करेगा. बाबरी मस्जिद- रामजन्म भूमि विवाद में मूल वादकारों में से एक एम सिद्दीक की मौत हो चुकी है, लेकिन उनका प्रतिनिधित्व उनके कानूनी वारिस के जरिये हो रहा है. वह एम इस्माइल फारूकी मामले में शीर्ष अदालत के 1994 के फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों को चुनौती दे रहे हैं. मिसाल के तौर पर उस फैसले में कहा गया था कि इस्लाम के अनुयायियों के लिये नमाज पढ़ने की खातिर मस्जिद अभिन्न हिस्सा नहीं है. फारूकी मामले पर फैसले में अयोध्या में कुछ क्षेत्रों का अधिग्रहण अधिनियम, 1993 की संवैधानिक वैधता पर विचार किया गया था. इस कानून के जरिये केंद्र ने विवादित स्थल और पास की कुछ जमीन का तब अधिग्रहण किया था. 

यह भी पढ़ें: अयोध्या मामले में मोड़, कोर्ट करेगा विचार- क्या मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का इंट्रीगल पार्ट?

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर की विशेष पीठ ने कहा, ‘‘ पहले हमें 1994 के फैसले पर इस विवाद को खत्म करना चाहिये. हम पूरे फैसले या उसके कुछ हिस्से को बड़ी पीठ के पास भेज सकते हैं.’’ फैसले की टिप्पणियों को महत्वपूर्ण बताते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि इसपर पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा पुनर्विचार करने की जरूरत है और फैसले में इस्लाम में मस्जिद की स्थिति जैसे पहलुओं पर इन विसंगतियों को दुरुस्त किये बिना दीवानी अपील पर प्रभावी तरीके से फैसला नहीं किया जा सकता है. उन्होंने कहा, ‘‘ विध्वंस के बावजूद कोई मस्जिद, मस्जिद ही रहता है और यह अल्लाह का होता है.’’ 

यह भी पढ़ें: अब लालू के बेटे तेज प्रताप ने लिया अयोध्या में राम मंदिर बनाने का जिम्मा

टिप्पणियां
1994 के फैसले के कुछ पैराग्राफ का उल्लेख करते हुए धवन ने कहा, ‘‘ शीर्ष अदालत ने कहा था कि नमाज पढ़ना या इबादत करना धार्मिक क्रिया है. किसी भी स्थान पर यह काम करना, जहां नमाज पढ़ी जा सकती है वह ऐसी धार्मिक प्रथा का तब तक अनिवार्य या अभिन्न हिस्सा नहीं होगा जब तक कि उस स्थान का उस धर्म के लिये खास महत्व हो ताकि उसका अनिवार्य या अभिन्न हिस्सा हो.’’ उन्होंने कहा कि फैसले में कहा गया था कि एकबार मस्जिद के लिये अर्पित कर दिया गया तो वह हमेशा मस्जिद के तौर पर इबादत स्थल बना रहेगा, यह भारत की वो मुस्लिम विधि नहीं है जिसे भारतीय अदालतों ने मंजूरी दी है. अदालत ने कहा था, ‘‘ संविधान के अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 के तहत संरक्षण की शर्त पर मस्जिद, चर्च, मंदिर जैसे धार्मिक इबादत स्थलों का राज्य की अधिग्रहण की संप्रभु शक्तियों के तहत उनका अधिग्रहण किया जा सकता है.’’

VIDEO: रणनीति: क्या श्री श्री का बयान भड़काऊ है?
धवन ने 1994 के फैसले को उद्धृत करते हुए कहा, ‘‘ इस तरह का अधिग्रहण स्वत: अनुच्छेद 25 या अनुच्छेद 26 का उल्लंघन नहीं करते हैं. प्रबंधन को अपने नियंत्रण में लेने का संपत्ति का अधिग्रहण करने के संबंध में राज्य की संप्रभु शक्तियों पर कोई प्रभाव नहीं है.’’ धवन ने फैसले का हवाला देते हुए कहा, ‘‘ यह बिल्कुल अलग मामला है कि क्षेत्र का अब अधिग्रहण कर लिया गया है. क्या आप कह सकते हैं कि अगर किसी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया जाता है तो वह मस्जिद नहीं रह जाता है.’’ उन्होंने कहा कि1994 के फैसले में कहा गया था कि पूजा का मौलिक


Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे...

Advertisement