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क्या मस्जिद के लिए जमीन नहीं लेना कोर्ट की अवमानना होगा, कानूनी सलाह ले रहा है सुन्नी वक्फ बोर्ड

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार अयोध्या में मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ ज़मीन लेने या नहीं लेने के मामले पर उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड कानूनी राय ले रहा है.

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क्या मस्जिद के लिए जमीन नहीं लेना कोर्ट की अवमानना होगा, कानूनी सलाह ले रहा है सुन्नी वक्फ बोर्ड

प्रतीकात्मक तस्वीर

खास बातें

  1. मस्जिद निर्माण के लिए कानूनी सलाह ले रहा है सुन्नी वक्फ बोर्ड
  2. पांच एकड़ ज़मीन लेने या नहीं लेने के मामले पर चर्चा
  3. 'मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अयोध्या मामले में कोई पक्षकार नहीं था'
लखनऊ:

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार अयोध्या (Ayodhya) में मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ ज़मीन लेने या नहीं लेने के मामले पर उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड (Sunni Waqf Board) कानूनी राय ले रहा है और उसका कहना है कि वह रविवार को लखनऊ में हो रही ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में इस सिलसिले में लिए जाने वाले निर्णय को 'खास' अहमियत देगा. बोर्ड के अध्यक्ष जु़फर फारुकी ने शुक्रवार को कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड अयोध्या में ज़मीन लेने या न लेने के मसले पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के निर्णय को खास अहमियत देगा. उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अयोध्या मामले में कोई पक्षकार नहीं था, मगर वह बेशक देश में मुसलमानों की सर्वमान्य संस्था है, लिहाजा उसके निर्णय को अहमियत देना वाजिब है.

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फारुकी ने कहा कि फिलहाल सवाल यह है कि क्या सुन्नी वक्फ बोर्ड मस्जिद निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दी जाने वाली पांच एकड़ ज़मीन लेने से इंकार कर सकता है, और कहीं ऐसा करना अदालत की अवमानना तो नहीं होगी, इसके लिए बोर्ड ने कानूनी राय लेना शुरू कर दिया है.

उन्होंने एक सवाल पर कहा कि ज़मीन लेने को लेकर लोगों की अलग-अलग राय है और उस ज़मीन पर कोई रचनात्मक काम कर पूरी दुनिया को संदेश देने की मंशा रखने वाले लोगों की तादाद बहुत कम है. बहरहाल, बोर्ड 26 नवंबर को होने वाली अपनी बैठक में इस सिलसिले में कोई फैसला करेगा. फारुकी ने बताया कि बैठक में आगामी रविवार को नदवा में होने वाली मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में ज़मीन लेने या न लेने के सिलसिले में लिए गए फैसले पर भी विचार-विमर्श होगा.

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इस बीच, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक वरिष्ठ अधिवक्ता जफरयाब जिलानी ने कहा कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अयोध्या मामले में मुस्लिम पक्ष की रहनुमाई की थी, लिहाज़ा मस्जिद निर्माण के लिए ज़मीन लेने या नहीं लेने के बारे में उसके फैसले को सबसे ज्यादा वरीयता दी जानी चाहिए. इस सवाल पर कि अगर ज़मीन लेने के मामले पर सुन्नी वक्फ बोर्ड और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की राय अलग-अलग हुई, तो उस सूरत में क्या होगा, जिलानी ने कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड अयोध्या मामले में अकेला पक्षकार नहीं था, बल्कि उसे मुस्लिम पक्ष का नुमाइंदा मान लिया गया था, लिहाज़ा इस सिलसिले में सुन्नी बोर्ड अकेले कोई फैसला नहीं ले सकता. 

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मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को अयोध्या मामले में फैसला सुनाते हुए विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण और मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में पांच एकड़ ज़मीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को उपलब्ध कराने का आदेश दिया था. सुन्नी वक्फ बोर्ड इस मामले में मुसलमानों की तरफ से मुख्य पक्षकार था. सुन्नी वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष फारुकी का मस्जिद निर्माण के लिए ज़मीन लेने के मामले पर कहना था कि सकारात्मकता के ज़रिये ही नकारात्मकता को खत्म किया जा सकता है. मुसलमानों के सबसे बड़े सामाजिक संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी का कहना है कि मुसलमानों को बाबरी मस्जिद के बदले दी जाने वाली ज़मीन नहीं लेनी चाहिए.



(हेडलाइन के अलावा, इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है, यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)


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