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बुलंदशहर : इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की हत्या के मामले की ढीली जांच से छूट रहे आरोपी

हिंसा भड़काने के मुख्य आरोपी योगेश राज को जमानत मिलने के बाद शुक्रवार को जेल से गुपचुप रिहा कर दिया गया

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लखनऊ:

बुलंदशहर में पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार को गोकशी की एक घटना के बाद भीड़ ने पत्थर, कुल्हाड़ी और गोली मारकर कत्ल कर दिया था. वहां हिंसा भड़काने के मुख्य आरोपी योगेश राज की जमानत मिलने के बाद आज रिहा कर दिया गया. सुबोध कुमार के करीबियों का आरोप है कि इस मामले की जांच बहुत ढीले तरीके से की जा रही है जिसकी वजह से आरोपी छूट रहे हैं.

बुलंदशहर कांड के आरोपी जब पिछली बार जमानत पर छूटे थे तो उनका कुछ यूं स्वागत हुआ था मानो आजादी की लड़ाई में जेल गए हों. इससे  संगठन की बदनामी हुई. इसलिए इस बार योगेश राज को चुपचाप जेल से निकाल दिया गया. वे कहते हैं कि उन्हें जेल में कोई तकलीफ नहीं हुई. योगेश राज ने कहा कि जेल में अधिकतर समय अध्ययन में बिताया. और जैल में किसी प्रकार का कष्ट जेल प्रशासन द्वारा नहीं दिया गया.

योगेश राज ने कहा कि 'तीन दिसंबर की घटना गोकशी को लेकर हुई थी. 20-25 गौवंश को बेरहमी से काटा गया था. इसको लेकर हिंदू संगठनों ने जाम लगाया था. मैं जाम खुलवाकर के स्याना कोतवाली में मुकदमा दर्ज करवाने चला गया था. मुझे इंस्पेक्टर की मौत के विषय में, न तो मैं उस वक्त वहां मौजूद था न ही मुझे उस घटना के बारे में कोई जानकारी है.'


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तीन दिसंबर को बुलंदशहर में गोकाशी की घटना के बाद भीड़ ने कार्रवाई की मांग को लेकर जाम लगाया था. पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई का वादा किया तो जाम खुल गया. योगेश राज पर आरोप है कि उसने फिर जनता को भड़काया जिससे हिंसा हुई और इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की हत्या हुई.

इस मामले में पुलिस की कार्रवाई पर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं. मिसाल के लिए- पहले पुलिस ने चार लोगों को गोकाशी के इल्ज़ाम में जेल भेजा, बाद में एसआईटी ने उन्हें निर्दोष बताकर छोड़ दिया और चार दूसरे लोगों को पकड़ा. पुलिस ने जीतू फौजी को इंस्पेक्टर की हत्या का मुलजिम बनाया. बाद में एसआईटी ने उसे निर्दोष पाया और कलुआ नट पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ. इंस्पेक्टर की पिस्तौल छीनकर उनकी हत्या हुई लेकिन वह आज तक बरामद नहीं हुई.

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योगेश राज के वकील कहते हैं कि यह बात उनके फेवर की है. बुलंदशहर के विश्व हिंदू परिषद के विभाग मंत्री ब्रूनो भूषण ने कहा कि किसी भी मामले में आला क़ातल बरामद न होना प्रॉसिक्यूशन के मुक़दमे को कमज़ोर करता है.और यह डिफेंस के लिए एक अच्च्छा बचाव है.

बहुत बड़ी भीड़ के अंदर कई ऐसे लोगों के नाम उसमें फंस गए जो लोग वास्तव में उसमें नामजद नहीं थे और जिनका कोई भी रोल उस घटना में नहीं था. ऐसे कई लोगों को जेल जाना पड़ा.

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विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि जांच में बहुत झोल हैं जिसका फायदा आरोपियों को मिल रहा है. यूपी कांग्रेस के महासचिव द्विजेंद्र त्रिपाठी ने कहा कि एसआईटी जांच लचर क्यों हो रही है, यह देखने की बात है. हम यह कह रहे हैं कि अगर एसआईटी ईमानदारी से जांच नहीं कर रही है तो इस मामले की जांच किसी दूसरी एजेंसी से कराई जानी चाहिए ,जिससे इंस्पेक्टर के साथ न्याय हो सके.

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