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उपचुनाव के नतीजे भाजपा ही नहीं कांग्रेस के लिए भी बन सकते हैं परेशानी का सबब

राज्य की 403 सीटों पर गठबंधन कर सपा 298 और कांग्रेस 103 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कांग्रेस का भाग्य अब पूरी तरह इन दोनों दलों के हाथ में है.

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उपचुनाव के नतीजे भाजपा ही नहीं कांग्रेस के लिए भी बन सकते हैं परेशानी का सबब

प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में लोकसभा की दो सीटों के लिए हुए उपचुनावों में सपा और बसपा के चुनावी गठबंधन के जरिए मिली कामयाबी कांग्रेस के लिए भी परेशानी का सबब बन सकता है. खासतौर पर उन राज्यों में जहां कांग्रेस व भाजपा के अलावा क्षेत्रीय दल मजबूत स्थिति में हैं. खास बात यह है कि गोरखपुर व फूलपुर लोकसभा सीटों पर उपचुनाव में सपा के उम्मीदवारों को समर्थन देने की बसपा की घोषणा के बाद कांग्रेस ने इस गठबंधन से अलग होकर लड़ने का फैसला किया था. पार्टी सूत्रों के अनुसार कांग्रेस चाहती थी कि गोरखपुर सीट से सपा अपना उम्मीदवार वापस ले और कांग्रेस के उम्मीदवार को समर्थन दें. लेकिन सपा इसके लिए तैयार नहीं थी. बुधवार को आए नतीजों में कांग्रेस इन दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवारों की जमानत भी नहीं बचा पाई. गौरतलब है कि गोरखपुर एवं फूलपुर लोकसभा सीटें उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफा देने के बाद खाली हुई थीं.  एक वर्ष पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लडा़ था.

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राज्य की 403 सीटों पर गठबंधन कर सपा 298 और कांग्रेस 103 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कांग्रेस का भाग्य अब पूरी तरह इन दोनों दलों के हाथ में है. और दोनों ही नहीं चाहेंगे कि लोकसभा की 80 सीटों में से कांग्रेस पांच-छह सीट से ज्यादा पर लडे़. दोनों क्षेत्रीय दलों का अपना अपना जातिगत समर्थक वर्ग (वोट बैंक) है. दोनों ही दलों के साथ मुस्लिम समुदाय जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखते हुए जुडता है. दोनों ही दलों के नेताओं को यह आशंका बनी रहती है कि कांग्रेस यदि मजबूत हुई तो उनके वोट बैंक में सेंध लग सकती है.

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ऐसी स्थिति अकेले उत्तर प्रदेश में नहीं है. कर्नाटक में जल्द ही होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए बसपा ने गठबंधन के लिए कांग्रेस के बजाय स्थानीय क्षेत्रीय दल जनता दल (एस) को चुना. महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन में अपने लिए सम्मानजनक जगह निकालना बडी चुनौती होगा.

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कांग्रेस के रणनीतिकार मान रहे हैं कि यदि कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ जैसे राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर हुआ तो लोकसभा चुनावों तक हालात में कुछ बदलाव हो सकता है. (इनपुट भाषा से) 


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