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Exclusive:अखिलेश यादव सरकार में कहां खर्च हुए 97 हजार करोड़, कैग को नहीं मिले सर्टिफिकेट

उत्तर प्रदेश में 97 हजार करोड़ रुपये के खर्च पर कैग(CAG) ने सवाल उठाए हैं. रिपोर्ट में जिस समय का जिक्र है, उस वक्त अखिलेश यादव की सरकार रही.

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Exclusive:अखिलेश यादव सरकार में कहां खर्च हुए 97 हजार करोड़, कैग को नहीं मिले सर्टिफिकेट

प्रतीकात्मक तस्वीर.

खास बातें

  1. यूपी में 97 हजार करोड़ के खर्च पर उठे सवाल
  2. अखिलेश यादव सरकार में खर्च धनराशि का हिसाब-किताब नहीं
  3. विभागों ने नहीं जमा किए यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट
नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में सरकारी धन के इस्तेमाल में भारी घपले का खुलासा हुआ है. 97 हजार करोड़ की भारी-भरकम धनराशि कहां-कहां और कैसे खर्च हुई, इसका कोई हिसाब-किताब ही नहीं है. सबसे ज्यादा घपला समाज कल्याण, शिक्षा और पंचायतीराज विभाग में हुआ है. सिर्फ इन तीन विभागों में 25 से 26 हजार करोड़ रुपये कहां खर्च हुए, विभागीय अफसरों ने हिसाब-किताब की रिपोर्ट ही नहीं दी. देश की सबसे बड़ी ऑडिट एजेसी कैग(CAG) ने वित्तीय प्रबंधन में इस गड़बड़झाले की पोल खोलकर रख दी है. कैग ने 31 मार्च 2017-18 तक यूपी में खर्च हुए बजट की जब जांच की तो यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ.वर्ष 2018 की अगस्त में आई रिपोर्ट नंबर एक में कैग ने इस पूरे गड़बड़झाले को उजागर किया है. NDTV.in के पास मौजूद इस रिपोर्ट में सीएजी ने कहा है कि धनराशि खर्च का उपयोगिता प्रमाणपत्र(यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट) उपलब्ध न होने से यूपी में बड़े पैमाने पर धनराशि के दुरुपयोग और खर्च में  धोखाधड़ी की आशंका है. कैग ने जिस अवधि में खर्च बजट की जांच की है, उस वक्त सूबे में अखिलेश यादव की सपा सरकार रही. यूपी में 2014 से 31 मार्च 2017 के बीच हुए करीब ढाई लाख से ज्यादा कार्यों के उपयोगिता प्रमाणपत्र उपलब्ध ही नहीं हैं. 

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क्या हैं नियमः वित्तीय नियम कहते हैं कि जब किसी विशेष मकसद या योजना के तहत विभागों को बजट जारी होता है तो तय-सीमा बीतने के बाद उन्हें उपयोगिता प्रमाणपत्र(यूसी) जमा करना होता है. बजट जारी करने वाले विभाग पर यह सर्टिफिकेट लेने की जिम्मेदारी है. जब तक विभाग सर्टिफिकेट नहीं देते तब तक उन्हें बजट की दूसरी किश्त नहीं जारी की जा सकती. यह व्यवस्था इसलिए है, ताकि पता चल सके कि बजट का इस्तेमाल संबंधित कार्यों के लिए ही हुआ है. उपयोगिता प्रमाणपत्र से पता चलता है कि बजट का कितना हिस्सा कहां और किस तरह खर्च हुआ. इस प्रमाणपत्र की जांच से बजट के दुरुपयोग की गड़बड़ी पकड़ में आ जाती है. यह सख्त निर्देश है कि बिना उपयोगिता प्रमाणपत्र जारी किए दोबारा बजट जारी नहीं हो सकता. नियम के मुताबिक विभाग संबंधित संस्थाओं से यह प्रमाणपत्र लेने के बाद उसकी क्रास चेकिंग कर महालेखाकार(ऑडिटर जनरल) को भेजते हैं. मगर जांच के दौरान पता चला कि यूपी में बिना यूसी हासिल किए ही आंख मूंदकर विभागों को बजट जारी होता रहा. 

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वर्षवार ब्यौराः 2014-15 के बीच कुल 66861.14 करोड़ धनराशि 2.25 लाख उपयोगिता प्रमाणपत्र नहीं जमा हुए, इसी तरह 2015-16 में 10223.77 करोड़ के 11335, 2016-17 में 20821.37 करोड़ के 18071 प्रमाणपत्र विभागों ने जमा ही नहीं किए. सबसे ज्यादा गड़बड़ी समाज कल्याण विभाग में देखने को मिली. समाज कल्याण विभाग ने 26 हजार 927 करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाणपत्र ही नहीं दिए. इसी तरह पंचायतीराज विभाग में  25 हजार 490.95 करोड़, शिक्षा विभाग ने 25 हजार 693.52 करोड़ का हिसाब-किताब ही नहीं दिया. 
 
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देखिए सीएजी की रिपोर्ट में 97 हजार करोड़ के बकाए उपयोगिता प्रमाणपत्रों और निहित धनराशि का ब्यौरा.



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क्या कहा सीएजी नेः सीएजी ने अगस्त में तैयार अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यूपी में धनराशि के उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा न करने का मामला कई बार शासन के सामने लाया गया, मगर कोई सुधार नहीं हुआ है. गंभीर बात रही कि  पिछली ग्रांट खर्च न करने और उसका उपयोगिता प्रमाणपत्र न देने पर भी कई विभागों को बजट जारी कर दिया गया. जबकि नियम है कि बिना उपयोगिता प्रमाणपत्र प्राप्त किए दूसरी किश्त की धनराशि नहीं दी जा  सकती. करीब दो लाख 55 हजार उपयोगिता प्रमाणपत्रों के पेंडिंग होने पर सीएजी ने फंड के दुरुपयोग की आशंका जताई है.
कैग ने यूपी सरकार से कहा है कि वह वित्त विभाग विभाग को निर्देश जारी करें कि उपयोगिता प्रमाणपत्र के लिए निश्चित डेडलाइन(समय-सीमा) तय करे. फिर उस अवधि तक हरहाल में उपयोगिता प्रमाणपत्र हासिल करे. जब तक उपयोगिता प्रमामपत्र न जारी हो, तब तक बजट की दूसरी किश्त न जारी हो. 

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