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भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण की रिहाई क्या मायावती के लिये खतरा है?

चंद्रशेखर 2019 में लोकसभा चुनाव लड़ने से मना कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अच्छे से पता है कि वो चुनाव लड़ें या न लड़ें पर वो चुनाव में एक महत्वपूर्ण फ़ैक्टर ज़रूर रहेंगे. 

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भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण की रिहाई क्या मायावती के लिये खतरा है?

चंद्रशेखर आजाद रावण की रिहाई के उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई मायने हैं.

खास बातें

  1. युवाओं में लोकप्रिय हैं चंद्रशेखर
  2. हर पार्टी डाल रही है डोरे
  3. मायावती ने भीम आर्मी के बताया था आरएसएस की चाल
लखनऊ: भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद रावण  रिहा हो गए हैं और रिहाई के बाद टीवी चैनलों को दिए साक्षात्कार में खुल कर कह रहे हैं कि बीजेपी को 2019 में हराना उनका सबसे बड़ा ध्येय है पर वो अभी किसी को ये नहीं बता रहे हैं कि उनकी रणनीति क्या होगी. लेकिन एक बात तो तय हैं कि भीम आर्मी के संस्थापक और सहारनपुर हिंसा के आरोपित चंद्रशेखर उर्फ रावण से रासुका हटाने और उसे समय से पहले ही रिहा कर योगी सरकार ने अनुसूचित जातियों को साधने के लिए बड़ा दांव खेल दिया है और मायावती के सामने एक बड़ा ख़तरा भी पैदा कर दिया है. अब तक उत्तर प्रदेश में मायावती ही अनुसूचित जातियों की सबसे बड़ी नेता हैं ,भले ही मायावती को 2014 के लोकसभा में एक भी सीट न मिली हो लेकिन बीजेपी की आंधी के बावजूद सिर्फ़ उत्तर प्रदेश में उनका वोट प्रतिशत लगभग 20% रहा था लेकिन अब बसपा के बाद भीम आर्मी भी अनुसूचित जातियों की एक बड़ी संगठित इकाई बन चुकी है जहां मायावती सोशल मीडिया से दूर रहती हैं वहीं भीम आर्मी सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय है जो कि आज की पीढ़ी के युवाओं को प्रभावित करने का बड़ा ज़रिया है. बीजेपी को पता है कि एस/एसटी कानून को लेकर उनकी सरकार की बेहद किरकिरी हो चुकी है और उन्हें अगर अपना दलित वोट बैंक साथ रखना है तो अनुसूचित जातियों का भरोसा जीतना होगा और चंद्रशेखर की रिहाई भी इसी दिशा में एक बड़ा क़दम है. भीम आर्मी का गठन होने के बाद से ही बसपा प्रमुख मायावती उससे खतरा महसूस करती रहीं हैं , मायावती पहले तो भीम आर्मी को आरएसएस की ही चाल बताया था, जहां बसपा में कोई बड़ा चेहरा नहीं है वही अनिसूचित जातियों के युवाओं में चंद्रशेखर बेहद लोकप्रिय हैं और ये बात मायावती को भी अच्छे ये पता है. इसलिए मजबूरी में सही मायावती सरकार से चंद्रशेखर की रिहाई की मांग भी करती रही हैं.   

... तो इस वजह से भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण समय से पहले हुए जेल से 'आजाद'

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उधर महागठबंधन की कोशिश के बीच चंद्रशेखर को भी करीब लाने के प्रयास भी तेज हो गए थे. दलित नेता जिग्नेश मेवाणी के जरिए कांग्रेस चंद्रशेखर पर लगातार डोरे डालती रही है, दिल्ली हो या बनारस जिग्नेश मेवाणी चंद्रशेखर की रिहाई के लिए आंदोलन कर चुके हैं , सूत्रों की मानें तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव की भी पूरी कोशिश है कि 2019 में किसी भी प्रकार चंद्रशेखर को अपने साथ रखा जाए. फ़िलहाल चंद्रशेखर 2019 में लोकसभा चुनाव लड़ने से मना कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अच्छे से पता है कि वो चुनाव लड़ें या न लड़ें पर वो चुनाव में एक महत्वपूर्ण फ़ैक्टर ज़रूर रहेंगे. 

सहारनपुर जातिगत हिंसा के विरोध में भीम आर्मी का प्रदर्शन​

आपको बता दें, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में भड़की जातीय हिंसा के आरोपी भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण को उत्तर प्रदेश पुलिस ने हिमाचल प्रदेश के डलहौजी से गिरफ्तार किया था.  चंद्रशेखर आजाद पर 12 हजार रुपये का इनाम भी घोषित था. सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में हुई जातीय हिंसा के पीछे चंद्रशेखर का हाथ होने का आरोप था.


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