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'गोरखपुर में बच्चों की मौत के जिम्मेदार घूम रहे खुलेआम' -निलंबित डॉक्टर कफील ने उठाई CBI जांच की मांग

दो साल पहले गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी के कारण 60 से अधिक बच्चों की मौत के बाद उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा निलंबित कर दिये गये डॉ. कफील खान ने मंगलवार को इस मामले की जांच सीबीआई से कराए जाने की मांग की.

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'गोरखपुर में बच्चों की मौत के जिम्मेदार घूम रहे खुलेआम' -निलंबित डॉक्टर कफील ने उठाई CBI जांच की मांग

निलंबित चिकित्सक डॉ. कफील खान ने गोरखपुर में बच्चों की मौत के मामले की सीबीआई से जांच कराने की मांग की है.

नई दिल्ली:

दो साल पहले गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी के कारण 60 से अधिक बच्चों की मौत के बाद उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा निलंबित कर दिये गये डॉ. कफील खान ने मंगलवार को इस मामले की जांच सीबीआई से कराए जाने की मांग की. डॉ. कफील “सभी के लिए स्वास्थ्य” अभियान के सिलसिले में बिहार आए हुए थे. डॉ. कफील ने यहां पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा, “मैं बीआरडी में बच्चों की मौत की सीबीआई जांच कराए जाने के साथ उक्त मामले को उत्तर प्रदेश के बाहर स्थानांतरित किये जाने की मांग करता हूं.'' वह बेगूसराय में भाकपा प्रत्याशी कन्हैया कुमार के पक्ष में प्रचार करने के बाद मंगलवार को पटना आए. उन्होंने कहा कि इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार लोग खुले में घूम रहे हैं. विभागीय जांच पिछले 18 महीनों से चल रही है जबकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मार्च 2018 में आदेश दिया था कि इसे तीन महीने के भीतर पूरा किया जाए. 

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डॉ. कफील ने दावा किया, ‘‘उच्च न्यायालय ने भी कहा कि मैं किसी भी चिकित्सा लापरवाही या भ्रष्टाचार का दोषी नहीं था और न ही मैं किसी भी तरह से निविदा प्रक्रिया में शामिल था. एक आरटीआई जांच ने यह भी स्थापित किया है कि सिलेंडर की कमी 54 घंटों तक जारी रही थी और मैंने अपने बच्चों को बचाने के लिए खुद ही सिलेंडर की व्यवस्था की थी.” डॉ. कफील ने कहा “मुझे उस त्रासदी के लिए बलि का बकरा बनाया गया जो कि आपूर्तिकर्ता को बकाया भुगतान न करने के कारण ऑक्सीजन सिलेंडर की आपूर्ति में कमी के कारण हुई थी. मैं मानता हूं कि असली दोषी वे अधिकारी हैं जो बकाया भुगतान के लिए आपूर्तिकर्ताओं से पत्र की मांग कर रहे थे.'' डॉ. कफील ने केंद्र से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि जीडीपी का कम से कम तीन प्रतिशत स्वास्थ्य देखभाल पर खर्च किया जाए. उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में मौजूदा रिक्तियां लगभग 1.5 लाख होने की उम्मीद है और इसे शीघ्रता से भरने की जरूरत है.

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