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बनारस के घाट पर सर्दियों में सिकुड़ती गंगा, कहीं ये 'विलुप्त' होने के संकेत तो नहीं

बनारस के घाटों में गर्मी के दिनों में गंगा का पानी कम होता हुआ नजर आता था, बालू के टीले दिखते थे, पर अब तो वैसी स्थिति सर्दी के मौसम में ही दिखने लगी है.

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बनारस के घाट पर सर्दियों में सिकुड़ती गंगा, कहीं ये 'विलुप्त' होने के संकेत तो नहीं

बनारस घाट पर गंगा की तस्वीर

खास बातें

  1. बनारस के घाटों से दूर जाती गंगा
  2. प्रदूषण ने गंगा की स्थित दयनीय कर दी है
  3. प्रदूषण का स्तर ऐसा ही रहा तो गंगा विलुप्त होने के कगार पर आ जाएगी
वाराणसी: बनारस के घाटों में गर्मी के दिनों में गंगा का पानी कम होता हुआ नजर आता था, बालू के टीले दिखते थे, पर अब तो वैसी स्थिति सर्दी के मौसम में ही दिखने लगी है. गंगा घाट छोड़ रही हैं.  उसमे धारा भी बहती नजर नहीं आ रही. ऐसे हालात में लोगों को गर्मी में गंगा के सूखने का खतरा नजर आ रहा है. सर्दियों के मौसम में घाट छोड़ती गंगा और चारों तरफ फैले सिल्ट को देखकर गंगा के प्रेमी, घाट के निवासी, गंगा के जानकार यही कह रहे हैं कि अगर गंगा को अविरल न किया गया तो इसके अस्तित्व पर ही खतरा है.

हर रोज गंगा स्नान से अपना दिन शुरू करने वाले राधे श्याम मिश्र, अपने साथी सत्यनारायण के साथ गंगा के किनारे आते हैं और गंगा की दुर्दशा को देख कर ऐसे ही गंगा मइया से गुहार लगाते हैं कि "हे माई सब कर भला करा, हमरे मोदी भइया के बुद्धि दा, खाली फरसा चला देहलन सीढ़िया पर बस खाली नाम हो गइल काम अभी नाही भयल इ गंगा हई. ई पनिया वहां से छूटी तभी गंगा के भला होई " लेकिन इनकी गुहार सरकार के कानो में अब तक नहीं पहुंच पाई. गंगा और ज्यादा मैली होती गई और इस साल तो वो इस सर्दी में घाट का किनारा ही  छोड़ती जा रही हैं. गंगा के घाट पर इस सर्दी की ये बड़ी घटना है, जिसे देख कर गंगा प्रेमी दुखी हैं. 

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राधे श्याम के साथी सत्य नारायण मौर्या कहते हैं कि "गंगा को देख कर तकलीफ ये है कि गंगा जाड़े में वहां तक रहती थी, लेकिन आज करीब 25 फुट पीछे हो गई हैं. अब इस पर आज भी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो ये नाला हो जायेंगी जैसे वरुणा नदी आज नाला हो गया है, उसी तरह गंगा का हो जायेगा.  हम लोग बचपन से देख रहे हैं गंगा में सुधार नहीं हुआ.  प्रधानमंत्री आये थे, वो भी बोले थे कि मां गंगा ने बुलाया है. तीन साल बीत गया लेकिन कोई सुधार हो नहीं रहा. राधे श्याम और सत्यनारायण की तरह ही घनश्याम मिश्रा भी सर्दियों में गंगा के घाट से दूर जाने पर बेहद चिंतित नजर आये. घनश्याम मिश्रा पुरोहित हैं और तुलसी घाट पर आने वाले यात्रियों स्नान करने वाले लोगों का पिछले 55 सालों से पूजा अर्चना कराते आ रहे हैं. लेकिन उन्होंने इन 55 सालों में गंगा की ऐसी दशा दिसंबर और जनवरी के महीने में नहीं देखी.
 
ganga

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गंगा की इस हालात पर बात करने पर घनश्याम मिश्रा बताते हैं कि "हमको 55 साल हो गया गंगा में बैठते हुए, मगर आज तक हमने कभी जाड़े में इतना कम पानी कभी नहीं देखा और न इतना काम बहाव देखा. गंगा की स्थिति बहुत दयनीय होती जा रही है और लगता है कुछ दिनों में गंगा विलुप्त हो जायेंगी. इसलिये गंगा को बचाने के लिए हमको सबको सरकार को लगना पड़ेगा. दरअसल, राधे श्याम ,सत्यनारायण और पुरोहित घनश्याम मिश्रा की ये चिन्ता यूं ही नहीं है. बनारस के सभी घाटों का अगर जायजा ले तो गंगा घाट की सीढ़ियों से दूर जाने की भयावह स्थिति अस्सी घाट से दिखनी शुरू हो जाती है. यहां गंगा सीढ़ियों से तकरीबन 60 फीट दूर बह रही हैं. गंगा प्रेमी ये यकीन ही नहीं कर पा रहे कि जहां कुछ दिन पहले गंगा की लहर नजर आती थी, आज उस जगह सिल्ट नजर आ रही  है. गंगा  का अस्सी से लेकर आदिकेशव घाट तक किनारों से उनका दूर होना ऐसे ही खतरे की ओर इशारा कर रहा है. मौजूदा हालात यह है कि कहीं 30 तो कहीं 60 फुट तक घाटों से गंगा दूर हो गई हैं. गंगा की धारा भी ठहर सी गई है. वाराणसी में गंगा के जलस्तर में एक साल में ढाई फीट से अधिक की कमी आ चुकी है. 

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आईआईटी बीएचयू प्रोफ़ेसर और महंत संकट मोचन विशम्भर नाथ मिश्रा इस पर चिंता व्यक्त करते हुवे कहते हैं कि "अभी जो गंगा का स्वरुप देख रहे हैं ये समर का स्वरुप देख रहे हैं समर में भी इससे ज़्यादा पानी होता था. जहां आप रेत देख रहे हैं, वहां कभी हम लोग डाईव लगाया करते थे. आप के पास इस समय सबसे ज़्यादा प्लस प्वाइंट है कि अगर गलती से ही सही आपने टिहरी बांध बना दिया है तो लीन पीरियड में उसका फायदा उठाइये कि कम से कम गंगा का फ्लो मेन्टेन हो. एक तो गंगा वैसे ही प्रदूषण से कराह रही हैं और उसमें फ्लो भी कम कर दिया तो डबल प्रॉब्लम हो जाएगी.

बनारस में गंगा की चौड़ाई कभी 800 मीटर का हुआ करती थी, जिसे तैर कर पार करना मुश्किल था. आज गंगा की चौड़ाई सिर्फ 400 मीटर रह गई है. इसके अलावा बनारस में लोग गंगा का पानी ही पीते थे, लेकिन आज प्रदूषण इतना है कि आचमन तक नहीं करते. ताजा आंकड़ों  के मुताबिक, बनारस में गंगा में जो बीओडी 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होना चाहिये, वो तुलसी घाट पर 6.8 मिलीग्राम, शिवाला घाट पर 6.4 मिलीग्राम, राजेंद्र प्रसाद घाट पर 5.2 मिलीग्राम, त्रिलोचन घाट पर 6 मिलीग्राम और वरुणा नदी के पास 52 मिलीग्राम पाया गया. इसी तरह फोकल कोलीफॉम  काउन्ट ( FCC) जो 500 से कम होना चाहिये वो तुलसी घाट पर 70000 , शिवाला घाट पर 63000 , आरपी घाट पर 41000 , त्रिलोचन घाट पर 57000 के पास पाया गया है. प्रदूषण के इस स्तर का कारण गंगा में गिरते सीधे नाले हैं. बनारस में हर रोज तकरीबन  300 MLD सीवेज डाला जाता है और ये हाल तब है, जब नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत गंगा साफ़ करने के बड़े वादे  किये गए थे.

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यही वजह है कि बड़े गुस्से में विशम्भर नाथ मिश्रा कहते हैं कि आपने "नमामि गंगा योजना को नमामि गंगे तवपाद पंकजम ....... के श्लोक मे कहा गया है कि जिसको देवता और राक्षस जो भी कहिये सब पूजते हैं तो उनके लिए आपने इतना बड़ा स्लोगन उठा लिया तो कुछ काम भी तो कर दीजिये गंगा के लिये. आपने आस्था का ब्रांडिंग किया है तो आस्था के हिसाब से काम भी तो करिये. गर्मी में भी फ्लो बना रहे., गंगा साफ़ रहे तब तो योजना सफल है, नहीं तो बकवास."  

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