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भारत ने नहीं, सऊदी अरब ने बदले महिलाओं के लिए हज के नियम

2014 में सऊदी सरकार ने महिलाओं के लिए जो नए नियम बनाए हैं, वे भी भेदभाव से भरे हैं.

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भारत ने नहीं, सऊदी अरब ने बदले महिलाओं के लिए हज के नियम

फाइल फोटो

लखनऊ: सरकार के इस दावे पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि हज में बिना पुरुष रिश्तेदार के जाने का नियम उसने बनाया है. जानकार कहते हैं कि सऊदी सरकार ने यह नियम 2014 में बना दिया था, भारत सरकार ने उसे 3 साल की देरी से लागू किया है. लोग यह भी सवाल कर रहे हैं कि अगर सरकार ने यह नियम बनाया है तो फिर सिर्फ 45 साल से ज्यादा उम्र की महिलाएं क्यों जा सकती हैं? पिछले करीब डढ़े हजार साल से महिलाएं हज पर अकेली नहीं जा सकती थीं, उन्हें किसी महरम यानी बेटे, पिता, भाई या शौहर के साथ जाना होता था. पीएम मोदी ने 31 दिसंबर को 'मन की बात' में कहा, 'मैं जब इसकी गहराई में गया तो हैरान रह गया. आजादी के 70 साल के बाद भी बंदिशें लगाने वाले हम लोग ही हैं. दशकों से मुस्लिम महिलाओं के साथ अन्याय हो रहा था, लेकिन कोई चर्चा ही नहीं थी. यहां तक कि कोई इस्लामिक देशों में भी कोई नियम नहीं है. लेकिन भारत में मुस्लिम महिलाओं को यह अधिकार प्राप्त नहीं था. और मुझे खुशी है कि हमारी सरकार ने इस पर ध्यान दिया.'

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लेकिन सच तो यह है कि यह रोक सऊदी सरकार ने लगाई थी. अगर भारत सरकार अकेली महिला को हज पर भेजना चाहती तो भी उसे सऊदी नियम के कारण वहां की सरकार हज का वीजा नहीं देती. हर महिला को हज पर जाने के लिए महरम मर्द के बारे में पूरी जानकारी देनी होती है, तभी सऊदी सरकार उसको वीजा देती है. हज से जुड़े सारे कानून वही बनाते हैं, क्योंकि हज उनके देश में होता है. अब सऊदी सरकार ने नया नियम बनाया है कि 45 साल से बड़ी 4 या 4 से ज्यादा महिलाएं ग्रुप में बिना मर्द के जा सकेंगी. सामाजिक कार्यकर्ता नैश हसन कहती हैं, 'जब 45 साल की महिला जा सकती है तो 35 की क्यों नहीं जा सकती? 25 की क्यों नहीं जा सकती...उसके अंदर तो और ताकत होगी. वो तो मुश्किल आने पर उसका सामना भी कर सकती है...समझदार है...एक जोश भी होता है.'

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कुरान में हज पर महरम मर्द को ले जाने की बंदिश नहीं है. कुरान में हज के ऊपर 25 आयतें हैं, लेकिन किसी में ऐसा नहीं कहा गया है. शायद ये नियम इसलिए बना हो कि पहले हज पर जाना सुरक्षित नहीं था. लोग ऊंट पर बैठकर महीनों में हज करने पहुंचते थे. कई बार रास्ते में उन्हें लूट लिया जाता था. पाल वाले जहाज से लोग जाते जो मुश्किल सफर था. भाप के जहाज से भी महीनों में पहुंचते. रास्ते में तमाम लोग बीमार हो जाते. शायद इसलिए महिला के साथ घर के किसी मर्द का होना जरूरी समझा गया हो, लेकिन आज हवाई यात्रा बहुत आसान है. महिलाएं भी अकेले सफर करती हैं.

लेकिन कुछ धर्मगुरु इसे शरियत का नियम समझते हैं. मौलाना अबुल इरफान मियां फिरंगी महली कहते हैं, 'शरियत का जो कानून है वह ऐसे मुकामात को औरत के साथ उसका महरम होना चाहिए. उसका भाई होना चाहिए, उसका शौहर होना चाहिए...उसका बेटा होना चाहिए...उसका चाचा होना चाहिए. अगर ना हो तो औरत हज को ना जाए' कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब कुंभ के मेले से लेकर वेटिकन सिटी तक हर उम्र की महिला को और अकेली महिला को जाने की इजाजत है तो फिर वह हज में अकेले क्यों नहीं जा सकती है. यही नहीं बहुत सारे लोग हज की मैनेजमेंट कमिटी में दूसरे देशों की हिस्सेदारी की भी बात कर रहे हैं. इस्लाम पर कई किताबें लिख चुके प्रोफेसर नदीम हसनैन कहते हैं, 'हज का मैनेजमेंट वैसे ही होना चाहिए, जैसे वेटिकन सिटी का है...जिसमें सारे रोमन कैथोलिक देश मिलकर मैनेज करते हैं और इटली की सरकार का उस पर कोई दबाव नहीं होता है. तमाम मुस्लिम देश भी हज के मैनेजमेंट में हिस्सेदारी चाहते हैं, लेकिन सऊदी सरकार मक्का-मदीने को अपनी निजी मिल्कियत की तरह समझकर मनमाने कानून बनाता है.'

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2014 में सऊदी सरकार ने महिलाओं के लिए जो नए नियम बनाए हैं, वे भी भेदभाव से भरे हैं. 45 साल से बड़ी महिला को भी हज में महिलाओं के ग्रुप में जाने के लिए भी अपने बेटे, पिता या शौहर से नो ऑबजेक्शन सर्टिफिकेट लेना पड़ेगा.
महिला अधिकार कार्यकर्ता नैश हसन कहती हैं, 'मैं अपनी मां को हज कराने के लिए गई मुझे अपने साथ मेरे छोटे भाई को महरम मर्द के तौर पर ले जाना पड़ा, जबकि वह मुझसे कम जानकार है, उसने मुझसे कम सफर किया है, लेकिन चूंकि वह मर्द है इसलिए मुझे मजबूरन उसे ले जाना पड़ा, जिस पर 90,000 रुपये खर्च हुए.'

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अब अगर सरकार का दावा है कि उसने महरम मर्द के साथ जाने की बंदिश हटाई है तो उसे यह जवाब भी देना ही पड़ेगा कि इस नियम में भी इतना भेदभाव क्यों है.


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