यूपी सरकार से एनजीटी का सवाल, चर्म शोधन कारखानों में प्रवेश नहीं कर सकते तो उनका नियमन कैसे करेंगे?

यूपी सरकार से एनजीटी का सवाल, चर्म शोधन कारखानों में प्रवेश नहीं कर सकते तो उनका नियमन कैसे करेंगे?

प्रतीकात्मक फोटो.

खास बातें

  • उत्तरप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी कारखानों की असल संख्या नहीं जानता
  • यूपी सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से गंगा में प्रदूषण पर सवाल
  • कानपुर में 400 चर्म शोधन कारखाने प्रदूषण फैला रहे
नई दिल्ली:

राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने उत्तरप्रदेश सरकार और उसके प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से कानपुर में गंगा किनारे बने चर्म शोधन कारखानों के नियमन के मुद्दे पर सवाल पूछा है. एनजीटी ने पूछा है कि यदि इन दोनों के अधिकारी ‘‘चर्म शोधन कारखाने के परिसरों में प्रवेश भी नहीं कर सकते’’ तो उनका नियमन कैसे कर सकते हैं.

एनजीटी ने कहा कि चर्म शोधन कारखानों से निकलने वाले प्रदूषकों में भारी मात्रा में क्रोमियम होता है और वे गंगा को प्रदूषित कर रहे हैं. यहां तक कि उत्तरप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी अब तक इन शोधन कारखानों की असल संख्या के बारे में नहीं जानता था.

एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ‘‘आप (उत्तरप्रदेश और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) कहते हैं कि चर्म शोधन कारखानों का संचालन नियमित होना चाहिए. लेकिन हमें एक बात बताइए कि यदि आपके लोग उनके परिसरों में घुस भी नहीं सकते तो आप उसका नियमन कैसे करेंगे?’’ पीठ की ओर से यह टिप्पणी एक ऐसे समय पर आई है जब उत्तरप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पीठ को बताया है कि कानपुर में 400 चर्म शोधन कारखाने हैं, जो जजमाउ नाले में प्रदूषक छोड़ते हैं. गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए इनके संचालन पर नजर रखना बेहद जरूरी है.

अधिकरण ने कहा कि जजमाउ के सभी चर्म शोधन कारखाने क्रोमियम पुन: प्राप्ति संयंत्रों से लैस नहीं हैं और इनसे निकलने वाले प्रदूषकों से निपटने के लिए तत्काल प्रयास किए जाने जरूरी हैं. अधिकरण ने पहले शोधन कारखानों से कहा था कि वे नदी में प्रदूषकों के अनियंत्रित बहाव को रोकने के लिए किसी अन्य जगह स्थानांतरित होने के मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करें.

बीते 15 नवंबर को अधिकरण ने सरकार को हरिद्वार और उन्नाव के बीच गंगा के कायाकल्प पर ‘एक पैसा भी न खर्च करने’ की हिदायत देते हुए कहा था कि पूरी राष्ट्रीय परियोजना पर वे अधिकारी 20 हजार करोड़ रुपये की बड़ी राशि खर्च कर रहे हैं, जो नदी के बारे में जानते तक नहीं हैं.

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मामले की अगली सुनवाई 21 नवंबर को है. हरित पैनल ने नदी की सफाई के काम को कई खंडों में बांटा है. यह हैं- गोमुख से हरिद्वार (पहला चरण), हरिद्वार से उन्नाव (पहले चरण का खंड ‘ब’), उन्नाव से उत्तरप्रदेश सीमा, उत्तरप्रदेश सीमा से झारखंड सीमा और झारखंड सीमा से बंगाल की खाड़ी.

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)