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फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों और पीएम मोदी के सामने छुपा लिए बनारस के घाटों के जख्म

बनारस के दरकते घाटों को प्रशासन ने मैच और स्वागत के होर्डिंग से छुपाया, लोगों में घाटों की दुर्दशा को लेकर नाराजगी

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फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों और पीएम मोदी के सामने छुपा लिए बनारस के घाटों के जख्म

वाराणसी के घाटों की सीढियां टूट गई हैं.

खास बातें

  1. तुलसी घाट, प्रभु घाट, ललिता घाट की हालत जर्जर
  2. तकरीबन आधा दर्जन घाटों की सीढ़ियां दरक गईं
  3. गंगा में मिलने वाले नालों को भी ढंककर नाक बचाई
वाराणसी:

सोमवार को फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बनारस के घाटों की जीवंतता देखने आए. उनके स्वागत के लिए बनारस के घाट सजकर तैयार थे. कला और संस्कृति के साथ बनारस के घाटों के वैभव से भी वे परिचित हुए. लेकिन घाटों के कई टूटे हिस्से उनकी नजरों से छुपा लिए गए. पीएम और राष्ट्रपति की निगाह न पड़ सके इसके लिए प्रशासन ने टूटे घाटों की सीढ़ियों को मैट और स्वागत की होर्डिंग लगाकर छुपा दिया था.

बनारस के लोगों में रोष है कि इन घाटों का सुधार नहीं हो रहा है. इसे ऐसे ही नजरअंदाज़ किया जा रहा है. काशी के निवासी अवधेश दीक्षित कहते हैं " हमने ये देखा कि घाटों के चित्र को बदलकर गलत चित्र दिखाया जा रहा है. जो वास्तविक चित्र है उसे छिपाया जा रहा है. सीढ़ियां दरकी हुई हैं. उनके ऊपर उसी रंग का कार्पेट बिछा दिया गया है जिस रंग के पत्थर होने चाहिए. यह मतलब है कि जस का तस देखिए, उन चीजों को बने रहने में क्या दिक्कत है.''  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति अस्सी घाट से राजेंद्र प्रसाद घाट तक के तकरीबन 40 घाटों से गुजरे. इन घाटों पर उनके स्वागत के लिए सांस्कृतिक  कार्यक्रम तो हो रहे थे लेकिन बनारस के लोग इस बात को भी  देख रहे थे कि कैसे हकीकत को छिपाया गया है जो अस्सी घाट के बगल में तुलसी घाट की टूटी सीढ़ियां से शुरू होकर बाद के प्रभु  घाट, ललिता घाट सहित तकरीबन आधा दर्जन घाटों तक दरकती सीढ़ियों और चबूतरों के रूप में है. प्रशासन ने बड़ी खूबी से गंगा में गिर रहे नालों को भी ढंक दिया था.

 
varanasi ganga ghat

अवधेश दीक्षित कहते हैं कि " प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी आप दूसरों की आंखों से मत देखो, आपको वास्तविक चित्र देखना है तो आप खुद आवरण को हटाकर देखिए. सीढ़ियां टूटी हुई हैं, नाले जहां गिर रहे हैं वहा फ्लेक्स लगा दिए हैं, बोर्ड लगा दिए हैं. उसको हटाकर देखिए तब कहीं निराकरण हो सकता है, नहीं तो मज़ाक चलेगा.''

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दशकों से गंगा की दशा भी ठीक नहीं. नाले के पानी की अधिकता की वजह से उसमे गंदगी बहुत थी. इसे बड़ी मशक्कत से साफ़ किया गया था.  लेकिन फिर भी किनारे पर गंदगी बदस्तूर थी.

 
varanasi ganga ghat

इस यात्रा पर राजनीति भी शुरू हुई मंगलवार को कांग्रेस के लोग गंदगी जांचने निकले और आरोप लगाया कि गंगा की बदबू के लिए सेंट छिड़के गए. जिलाधिकारी योगेश्वर राम मिश्रा सेंट छिड़कने की बात से साफ़ इंकार कर रहे  हैं पर टूटी हुई सीढ़ियों पर अपनी सफाई कुछ इस तरह दे रहे हैं-  "घाटों और गंगा में जो दूषित जल मिल रहा है इसके लिए बहुत बड़ी कार्ययोजना है. सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगभग कम्लीट होने की स्थिति में है. उससे पूरी निजात मिल जाएगी. एक एनजीटी का इशू है, एक कछुआ सेंचुरी का इशू है जिसके कारण यहां पर कोई निर्माण कार्य या पुनरुद्धार का कार्य नहीं हो पता. उसे भी उच्च स्तर पर संज्ञानित किया है और हम लोग आश्वस्त हैं कि बहुत शीघ्र इसमें कोई नीतिगत निर्णय हो जाएगा."

प्रशासन ने कड़ी सुरक्षा व्यस्था की. बनारस के छुट्टा पशु और सांढों को भी हटाया गया था लेकिन एक सांढ अस्सी घाट पर सेंध लगाकर आ गया था जिसे सुरक्षाकर्मी हटाने में लगे थे. वैसे कछुआ सेंचुरी जैसी सरकार की गलत नीतियों की वजह से बनारस के घाट अंदर से खतरनाक स्तर तक खोखले हो चुके हैं. इससे यह घाट दरक रहे हैं. पर अफ़सोस कोई भी सरकार इसका पुरसाहाल नहीं ले रहा. और अगर इस समस्या से इसी तरह मुंह मोड़ा गया तो एक दिन ये घाट गंगा में समा भी सकते हैं. फिर कौन इन घाटों का वैभव देखेगा और कौन इसे दिखाने लाएगा, ये बड़ा सवाल है.



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