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यूपी में अब स्कूल टीचर की गंभीर मुद्रा के साथ 'सेल्फी अटेंडेंस' जरूरी

हर सुबह टीचर को स्कूल पहुंचकर उसके बैकग्राउंड में सेल्फी लेकर अफ़सर को पोस्ट करना होती है, देर हुई तो तनख्वाह कटी

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यूपी में अब स्कूल टीचर की गंभीर मुद्रा के साथ 'सेल्फी अटेंडेंस' जरूरी

प्रतीकात्मक फोटो.

खास बातें

  1. स्कूल नहीं जाने वाले शिक्षकों पर सरकार ने नकेल कसी
  2. नियमित स्कूल जाने वाले शिक्षक फैसले से खुश
  3. बाराबंकी जिले में 700 शिक्षकों की सेलरी कटी
लखनऊ:

उत्तर प्रदेश में प्राइमरी शिक्षकों के स्कूल न जाने की शिकायतें इतनी बढ़ गई हैं कि अब उनके लिए “सेल्फी अटेंडेंस” जरूरी की गई है. यानी हर सुबह टीचर स्कूल पहुंचकर स्कूल के बैकग्राउंड में सेल्फी लेकर अफ़सर को पोस्ट करना होती है. सुबह 8 बजे तक सेल्फी नहीं मिली तो उसका वेतन कटेगा. सिर्फ़ बाराबंकी ज़िले में अब तक 700 शिक्षकों की तनख़्वाह कट चुकी है. तमाम शिक्षकों पर इल्ज़ाम है कि वे स्कूल नहीं जाते या अपनी जगह कम पैसे पर किसी और को पढ़ाने भेज देते हैं.

सुबह-सुबह यूपी के तमाम प्राइमरी स्कूलों में अब एक नया नजारा देखने को मिलता है. हाथों में सेल्फी स्टिक लेकर टीचर 'टीचरनुमा' गंभीर पोज़ बनाकर सेल्फी खींचते हैं. कई बार वे अकेले-अकेले सेल्फी लेते हैं, तो कभी अपने साथी टीचरों के साथ. फिर उसे बीएसए के वेब पेज पर पोस्ट करते हैं. जिनकी नज़र हर सेल्फी पर होती है. बाराबंकी की सीडीओ कहती हैं कि पहले तो सिर्फ आधे टीचर ही स्कूल आते थे.

बाराबंकी की सीडीओ मेधा रूपम कहती हैं कि काफ़ी शिकायतें आ रही थीं कि टीचर लखनऊ में रहते हैं और बाराबंकी पढ़ाने के लिए नहीं आते. जब मैं यहां पर तैनात हो गई तो मैंने भी कुछ इंस्पेक्शन किए. मैंने जब भी इंस्पेक्शन किए 50 प्रतिशत टीचर नहीं आ रहे थे.


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टीचर बताते हैं कि सेल्फी के भी कुछ उसूल हैं. मुस्कुराते हुए सेल्फी नहीं ली जाती. फोटो में टीचर जैसा गंभीर चेहरा होना चाहिए. लेकिन रोज़ स्कूल आने वाले टीचर खुश हैं. उनका कहना है कि जो नहीं आते उन्हें भी उतनी ही सैलरी मिलती है जितनी आने वालों को. अब यह भेदभाव बंद होगा. असिस्टेंट टीचर दीपिका सिंह ने कहा कि कहीं-कहीं पर टीचर आते नहीं हैं, और जो टीचर आते हैं उनको उसका खामियाज़ा भुगतना पड़ता है. तो मेरे ख़याल से यह बहुत अच्छा है.

'जीवन में समय का विशेष महत्व रखो…समय से जागो…समय से पढ़ो…समय से विद्यालय आओ…एक दिन निकल गया तो जीवन का एक दिन कम पड़ गया.' बाराबंकी के बडेल प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर अब बच्चों को भी वक्त से आने का पाठ पढ़ा रहे हैं. वे खुश हैं कि इससे हेडमास्टर का काम आसान हो गया है. बडेल के प्राथमिक विद्यालय के हेडमास्टर वेद प्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि कुछ ऐसे प्राध्यापक हैं जो कहते हैं कि हमारा स्टाफ समय से नहीं आता है तो उनके लिए तो बहुत बड़ी राहत की चीज़ है कि समय से उनके शिक्षक आते हैं. और नहीं आते तो वो शिक्षक स्वयं ज़िम्मेदार होते हैं.

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दूरदराज़ के इलाकों में रहने की सुविधाएं न होने की वजह से तमाम टीचर शहरों में रहते हैं. वहां से स्कूल देर से जाते हैं. कई टीचर स्कूल नहीं जाते और अपनी जगह कम पैसे में गांव के किसी लड़के को पढ़ाने का काम दे देते हैं. कई महिला टीचर वक्त से नहीं पहुंचतीं. शिक्षक सुभाष चंद्र श्रीवास्तव ने बताया कि जनपद बाराबंकी में  बंकी, देव, नींबुरा ये ऐसे ब्लॉक हैं जहां 80 से 85 फीसदी महिलाएं कार्यरत हैं. तो उनको तो यही समस्या है कि उनको घर के दायित्वों का भी निर्वहन करना पड़ता है.

उत्तर प्रदेश में बेसिक एजुकेशन में तमाम मोर्चों पर सुधार की ज़रूरत है. इस सिलसिले में यह एक कदम हो सकता है, लेकिन आख़िरी क़दम नहीं है. ऐसे बहुत सारे सुधार एक साथ लागू करने होंगे.

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