उत्तराखंड में कांग्रेस की 'जीत' के बाद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के 'उस' फैसले पर उठे सवाल..

उत्तराखंड में कांग्रेस की 'जीत' के बाद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के 'उस' फैसले पर उठे सवाल..

उत्तराखंड से संबंधित राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के फैसले पर सवाल उठने लगे हैं। (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

उत्तराखंड में कांग्रेस की 'बड़ी जीत' के बीच इस मामले में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की भूमिका पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। प्रणब ने ही इस 'हिल स्टेट' में राष्ट्रपति शासन को मंजूरी दी थी।

कांग्रेस पार्टी से जुड़े सूत्रों ने कहा कि जब राष्ट्रपति मुखर्जी ने केंद्र सरकार की विवादास्पद सिफारिश पर दस्तखत किए तो यह पूरा मामला फैसले में बड़ी भूल का सबूत बनकर रह गया। हालांकि पार्टी ने इस मामले में अब तक सार्वजनिक तौर पर मुखर्जी की आलोचना नहीं की है। गौरतलब है कि वरिष्‍ठ कांग्रेसी रहे प्रणब मुखर्जी  ने सरकार में दशकों के अनुभव के बाद वर्ष 2012 में राष्ट्रपति का संवैधानिक पद संभाला है।

27 मार्च को लगाया गया था राज्य में राष्ट्रपति शासन
हरीश रावत के सदन में विश्वास मत हासिल करने के एक दिन पहले उत्तराखंड में 27 मार्च को राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। विपक्षी पार्टियो ने इसे विपक्ष की ओर से शासित राज्यों को अपने नियंत्रण में लेने का बेईमानी से भरा प्रयास करार दिया था। कांग्रेस ने इस फैसले को उत्तराखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसने इस निर्णय को अनुचित बताया था। आखिरकार हरीश रावत ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मंगलवार को कराए गए विश्‍वास मत में जीत हासिल की। प्रणब मुखर्जी के फैसले को लेकर हरीश रावत की पत्नी रेनुका रावत ने कहा, 'राष्ट्रपति को संभवत: इस मामले में और अधिक विचार-विमर्श करना था।'

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सोली सोराबजी बोले, 'राष्ट्रपति के पास थे सीमित विकल्प'
दूसरी ओर, पूर्व अटार्नी जनरल सोली सोराबजी ने NDTV से बातचीत में कहा, 'राष्ट्रपति के पास इस मामले में सीमित विकल्प थे। कुछ लोग कह सकते हैं कि राष्ट्रपति को फाइल वापस सरकार के पास भेज देनी थी, लेकिन तब क्‍या, जब सरकार इसे वापस उनके पास भेज देती? राष्ट्रपति को इस पर दस्तखत करने पड़ते।' उन्होंने कहा कि ऐसे समय जब विश्‍वास मत होने वाला था, सरकार को राष्ट्रपति शासन लगाने को लेकर जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए थी।इससे ऐसा प्रतीत हुआ कि सरकार फ्लोर टेस्ट का नतीजा पहले से जानती है। उन्‍होंने कहा कि सरकारों को सावधानी से काम करना चाहिए। पूर्व एडीशनल सॉलिसिटर जनरल राजू रामचंद्रन ने इस मसले पर कहा, 'मैं निराश हूं.. संवैधानिक रूप से सक्षम हमारे राष्ट्रपति को अपनी विवेकाधीन शक्‍तियों का इस्तेमाल करना चाहिए था।'

डॉ. कलाम को भी ऐसे अनुभव से गुजरना पड़ा था
प्रणब मुखर्जी से पहले एपीजे अब्‍दुल कलाम (अब स्‍वर्गीय) को भी बतौर राष्‍ट्रपति अपने कार्यकाल के दौरान उस समय ऐसे क्षणों को गुजरना पड़ा था जब सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2005 में बिहार सरकार की बर्खास्‍तगी के फैसले को पलट दिया था। डॉ. कलाम ने वर्ष 2013 में अपनी पुस्तक में लिखा था कि उस समय उनके मन में पद छोड़ने का विचार आया था। पूर्व राष्ट्रपति ने उस समय मनमोहन सिंह के नेतृत्‍व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार की सिफारिश पर दस्तखत किए थे।