NDTV Khabar

Exclusive : मोदी सरकार का महत्वाकांक्षी चारधाम हाइवे प्रोजेक्ट न बन जाए कहीं विनाशकारी आपदा की वजह

ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी इस मामले सरकार के रवैये पर असंतोष जताया है और फिलहाल पेड़ों के कटान पर रोक लगा दी है.  

680 Shares
ईमेल करें
टिप्पणियां
Exclusive : मोदी सरकार का महत्वाकांक्षी चारधाम हाइवे प्रोजेक्ट न बन जाए कहीं विनाशकारी आपदा की वजह

चारधाम प्रोजेक्ट के रास्ते में 40 हज़ार से अधिक पेड़ काटे जा रहे हैं.

खास बातें

  1. करीब 12000 करोड़ रुपये की है यह परियोजना
  2. पीएम मोदी का है यह प्रिय प्रोजेक्ट
  3. 40000 से अधिक पेड़ काटे जा रहे हैं
नई दिल्ली: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी में चल रही सुनवाई के दौरान ये साफ हो गया कि उत्तराखंड में निर्माणाधीन चारधाम सड़क परियोजना में पर्यावरण नियमों की जमकर अनदेखी हो रही है. यह बात ग्राउंड रिपोर्ट और जानकारों की चेतावनियों में सामने आती रही हैं. हैरान करने वाली बात यह है कि केंद्रीय सड़क और परिवहन मंत्रालय ने 900 किलोमीटर लम्बे प्रोजेक्ट को 53 टुकड़ों में बांट कर दिखाया है ताकि इन्वायरमेंटल क्लीयरेंस यानी पर्यावरण संबंधी हरी झंडी न लेनी पड़े. चूंकि किसी भी 100 किलोमीटर से अधिक लम्बी सड़क के लिये पर्यावरणीय अनुमति अनिवार्य है लिहाजा एक ही प्रोजेक्ट को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर मंत्रालय इस "कानूनी अड़चन" से छुटकारा पाना चाहता है.  लेकिन एक पहाड़ी राज्य में यह महत्वाकांक्षी सड़क परियोजना शुरू से ही विवादों में है क्योंकि इसके लिये बेहद संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में न केवल 40000 से अधिक पेड़ काटे जा रहे हैं बल्कि पहाड़ों के कटान से निकलने वाले हज़ारों टन मलबे के निस्तारण का कोई प्लान भी नहीं बनाया गया है. पहाड़ को काटकर सीधे नदियों में गिराया जा रहा यह मलबा आने वाले दिनों में विनाशकारी आपदाओं की वजह बन सकता है. 

चार धाम यात्रा के 17 दिन पहले दोबारा टूटा गंगोरी पुल, गंगोत्री धाम, चीन सीमा से टूटा संपर्क

2013 की केदारनाथ आपदा इसकी गवाह रही है जिसमें बांध परियोजनाओं की गाद ने विनाशलीला में अहम योगदान दिया यह बात सरकार द्वारा गठित कई विशेषज्ञ समितियों ने भी कही है.  ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी इस मामले सरकार के रवैये पर असंतोष जताया है और फिलहाल पेड़ों के कटान पर रोक लगा दी है.  मामले की सुनवाई के लिये अगली तारीख 19 अप्रैल रखी गई है और सबकी नज़र इस बात पर है कि क्या अदालत इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी देगी?  चार धाम हाइवे परियोजना का उद्घाटन पिछले उत्तराखंड विधानसभा चुनावों से पहले खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था. इसके तहत उत्तराखंड के चारों धाम गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ के लिये 900 किलोमीटर से अधिक लम्बी सड़क बनायी जा रही है. कोई 12000 करोड़ की यह परियोजना शुरुआत से प्रधानमंत्री का प्रिय प्रोजेक्ट बताई जा रहा है और केंद्र और राज्य सरकार इसे क्रियान्वित करने में तत्पर दिख रही है.
chardham project
 ​
सरकार इस प्रोजेक्ट को पड़ोसी चीन के साथ सामरिक महत्व वाला और उत्तराखंड में पर्यटन और रोज़गार के मौके बढ़ाने वाला बता रही है. यही वजह है कि चाहे इस प्रोजेक्ट से होने वाले विस्थापितों का सवाल हो या फिर पर्यावरण से जुड़े नियमों का प्रोजेक्ट को क्रियान्वित करने वाले काफी जल्दबाज़ी में हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल अक्टूबर में केदारनाथ धाम पहुंच कर भाषण दिया और कहा कि अगले साल (2018) में कम से कम 10 लाख तीर्थयात्री केदारनाथ आयेंगे. 

Chipko Movement से सुंदर लाल बहुगुणा ने की थी क्रांति, पर्यावरण बचाने की 5 मिसाल

लेकिन अति उत्साह में सरकार यह भूल रही है कि उत्तराखंड के जिन पहाड़ों को अंधाधुंध तोड़ा जा रहा है वह अति संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र (ज़ोन 5) में हैं. यहां 100 से अधिक छोटी-बड़ी जल विद्युत परियोजनायें पहले से चल रही हैं और सैकड़ों प्रस्तावित हैं. इनके कारण भी नाज़ुक इकोज़ोन में काफी बर्बादी हो चुकी है जिसे विकास के नाम पर ढका जा रहा है. जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में बताया जा चुका है उत्तरकाशी से गंगोत्री के बीच ही तीन दर्जन से अधिक लैंड स्लाइड ज़ोन हैं जहां हर साल भूस्खलन होते हैं. बावजूद इसके इसी इलाके का दौरा करने पर पता चलता है कि सरकार 12 से 24 मीटर चौड़े हाइवे प्रोजेक्ट के लिये 5000 पेड़ों की निशानदेही कर चुकी है जिनमें कई देवदार जैसी अनमोल प्रजाति के पेड़ हैं जिनके तैयार होने में कई साल लग जाते हैं. 

टिप्पणियां

टिहरी परियोजना की वजह से बड़ा पर्यावरणीय खतरा उत्पन्न हुआ है : संसदीय समिति

वैधानिक शोध से साबित हो चुका है कि गंगोत्री ग्लेशियर हिमालय के तेज़ी से पिघलते ग्लेशियरों में है फिर भी गंगोत्री नेशनल पार्क के आसपास घने जंगलों को काफी तबाह किया जा चुका है. जिस बचे खुचे जंगल को काटा जा रहा है वह इस महत्वपूर्ण ग्लेशियर के लिये एक ढाल की तरह काम करता है. अगर गंगोत्री ग्लेशियर का वजूद नहीं रहेगा तो चारधाम प्रोजेक्ट क्या हासिल करेगा क्योंकि यही ग्लेशियर तो नदियों का प्रमुख स्रोत है. महत्वपूर्ण है कि नीति आयोग ने भी हिमालय के तेज़ी से सूख रहे जलस्रोतों पर चिन्ता जताते हुये कहा है कि 60 प्रतिशत से अधिक स्रोत खात्मे की कगार पर हैं.
वीडियो : जंगल बचाने के लिए पेड़ों पर घर

सवाल ये भी है कि सरकार इतनी बर्बादी कर जिस सड़क चौड़ीकरण के प्रोजेक्ट पर आमादा है क्या उसके लिये वैकल्पिक तरीके इस्तेमाल नहीं किये जा सकते? क्या वन सम्पदा और नदियों को बचाकर और सड़क की चौड़ाई को सीमित कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता? लेकिन तरक्की के पैमाने पर जंगलों, नदियों और ग्लेशियरों का कोई महत्व नहीं. विकास का झंडा उठाने वाले इस अनमोल ख़ज़ाने के महत्व को स्वीकार नहीं करते.


Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे...

Advertisement